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वाङ्मय हिन्दी पत्रिका



replace_date('11:40 PM');

हाइकु  

Posted by डा. फीरोज़ अहमद in

रचना गौड़ भारती

चिड़िया चुगे
भूखा बच्चा कलपे
युगान्त चले

replace_date('9:17 AM');

हाइकु  

Posted by डा. फीरोज़ अहमद in

रचना गौड़ भारती




दें आरक्षण
हो देश-विभाजन
क्या प्रशासन

replace_date('8:56 AM');

हाइकु  

Posted by डा. फीरोज़ अहमद in

रचना गौड़ भारती


बम धमाके
खून भरी सड़कें
समाधी यहां

replace_date('7:18 PM');

गजल  

Posted by डा. फीरोज़ अहमद in

रचना गौड़ भारती

जज्बात और महक जो काबू में आ जाते
इंसान भी फ़रिश्तें की गिनती में आ जाते

खत्म होगई थी रोशनाई लिखते लिखते
वरना जज्बात हमारे भी कागज पे आ जाते

पहले ही क्या कम थे यहां सागर खारे
काबू कर न पाते तो आंख में आंसू आ जाते

हर जख्म भरता नहीं बिना मरहम के
कुछ शब्द ही होते जो इसके काम आ जाते

शब्द स्पर्श से बड़े हैं हम भी ये बताते
कुछ तो शब्द कहते हम और करीब आ जाते

replace_date('2:27 PM');

मटका (पुरूष) और सुराही (स्त्री)  

Posted by डा. फीरोज़ अहमद in

रचना गौड़ भारती

कच्ची मिट्टी का घड़ा हो तुम
मैं हूं तुम्हारी सुराही
भीनी सी खुश्बू तुम में थी
सुगंधित जल मैं भर लायी
जीवन का लहू जमा हुआ- सा
चलो मिलकर इसे पिघलाएं
एक कुम्हार (परमात्मा), एक ही मिट्टी,
तुम रहे तने, मुझे झुकाया ये कैसी प्रकृति
टूटोगे तुम भी, बिखरूंगीं मैं भी
काम एक ही है प्यास बुझाना
प्यास जो बुझे तो प्यासे, खुदा से दुआ करना
मटके से मेरी गर्दन कभी न लम्बी करना
वरना ये दुनियां पकड़-पकड़ गिराएगी
पानी पीकर खाली सुराही (भोग्यक्ता)
जमीन पर लुढ़काएगी

replace_date('12:57 AM');

निरक्षर मानव  

Posted by डा. फीरोज़ अहमद in

रचना गौड़ भारती

पेड़ के ओखल में
कठफोड़वे का घर था
वन पेड़ों से बेजोड़ था
बीहड़ जंगल, लकड़ियों का खजाना जैसे
जीव जन्तुओं से नहीं इसे
खुदग़र्ज आदमियों से डर था
वहीं हाथों में कुल्हाड़ी लिए
कुछ लकड़ी चोरों का भी दल था
कठफोड़वे और लोगों को जंगल से
बराबरी का आसरा था
पहली कुल्हाड़ी की ठेस
वृक्ष व कठफोड़वे को एक साथ हिला गई
तब कठफोड़वे की निगाह अपनी प्रहारी
चोंच के प्रहार पर गई
तने को आश्वासित कर वो
उन लोगो पे जा टूटा
अपने आसरे का सिला एक
कठफोड़वे ने ऐसे दिया
अब वृक्ष की हर शाखा भी झूम उठी
तेज पवन के झौंकों से जैसे
निकली ध्वनि, शुक्रिया कह उठी
ये पेड़ एक विद्यालय के प्रांगण में था
लोग जहां के अशिक्षित पर
वृक्ष शिक्षा की तहजीब में था
परोपकारिता और शिष्टता का पाठ
एक वृक्ष व कठफोड़वा पढ़ गया
अफ़सोस इतना ही रहा कि
इंसानियत का मानव इससे
क्यों निरक्षर रह गया ।

- मूलचन्द सोनकर

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अब हम इस बात की चर्चा करेंगे कि स्त्रियाँ अपनी इस निर्मित या आरोपित छवि के बारे में क्या राय रखती हैं। इसको जानने के लिए हम उन्हीं ग्रन्थों का परीक्षण करेंगे जिनकी चर्चा हम पीछे कर आये हैं। लेख के दूसरे भाग में वि.का. राजवाडे की पुस्तक ‘भारतीय विवाह संस्था का इतिहास' के पृष्ठ १२८ से उद्धृत वाक्य को आपने देखा। इसी वाक्य के तारतम्य में ही आगे लिखा है, ‘‘यह नाटक होने के बाद रानी कहती है - महिलाओं, मुझसे कोई भी संभोग नहीं करता। अतएव यह घोड़ा मेरे पास सोता है।....घोड़ा मुझसे संभोग करता है, इसका कारण इतना ही है अन्य कोई भी मुझसे संभोग नहीं करता।....मुझसे कोई पुरुष संभोग नहीं कर रहा है इसलिए मैं घोड़े के पास जाती हूँ।'' इस पर एक तीसरी कहती है - ‘‘तू यह अपना नसीब मान कि तुझे घोड़ा तो मिल गया। तेरी माँ को तो वह भी नहीं मिला।''
ऐसा है संभोग-इच्छा के संताप में जलती एक स्त्री का उद्गार, जिसे राज-पत्नी के मुँह से कहलवाया गया है। इसी पुस्तक के पृष्ठ १२६ पर अंकित यह वाक्य स्त्रियों की कामुक मनोदशा का कितना स्पष्ट विश्लेषण करता है, ‘‘बाद में प्रगति हासिल करके जब लोगों को अग्नि तैयार करने की प्रक्रिया का ज्ञान हुआ तब वे वन्य लोग अग्नि के आस-पास रतिक्रिया करते थे। किसी भी स्त्री को किसी भी पुरुष द्वारा रतिक्रिया के लिए पकड़कर ले जाना, उस काल में धर्म माना जाता था। यदि किसी स्त्री को, कोई पुरुष पकड़कर न ले जाए, तो वह स्त्री बहुत उदास होकर रोया करती थी कि उसे कोई पकड़कर नहीं ले जाता और रति सुख नहीं देता। इस प्रकार की स्त्री को पशु आदि प्राणियों से अभिगमन करने की स्वतंत्रता थी। वन्य ऋषि-पूर्वजों में स्त्री-पुरुष में समागम की ऐसी ही पद्धति रूढ़ थी।'' यह कथन निर्विवाद रूप से स्त्रियों की उसी मानसिकता का उद्घाटन करता है कि वे संभोग के लिए न केवल प्रस्तुत रहती हैं, बल्कि उनका एकमात्र अभिप्रेत यौन-तृप्ति के लिए पुरुषों को प्रेरित करना है।
इस तरह के दृष्टांत वेद-पुराण इत्यादि में भी बहुततायत से उपलब्ध हैं। यहाँ ऋग्वेद के कुछ उदाहरण दिए जा रहे हैं -
मेरे पास आकर मुझे अच्छी तरह स्पर्श करो। ऐसा मत समझना कि मैं कम रोयें वाली संभोग योग्य नहीं हूँ(यानी बालिग नहीं हूँ)। मैं गाँधारी भेड़ की तरह लोमपूर्णा (यानी गुप्तांगों पर घने रोंगटे वाली) तथा पूर्णावयवा अर्थात्‌ पूर्ण (विकसित अधिक सटीक लगता है) अंगों वाली हूँ।(ऋ. १।१२६।७) (डॉ. तुलसीराम का लेख-बौद्ध धर्म तथा वर्ण-व्यवस्था-हँस, अगस्त २००४)
कोई भी स्त्री मेरे समान सौभाग्यशालिनी एवं उत्तम पुत्र वाली नहीं है। मेरे समान कोई भी स्त्री न तो पुरुष को अपना शरीर अर्पित करने वाली है और न संभोग के समय जाँघों को फैलाने वाली है।(ऋ. १०/८६/६) ऋग्वेद-डॉ. गंगा सहाय शर्मा, संस्कृत साहित्य प्रकाशन, नई दिल्ली, दूसरा संस्करण १९८५)
हे इन्द्र! तीखे सींगों वाला बैल जिस प्रकार गर्जना करता हुआ गायों में रमण करता है, उसी प्रकार तुम मेरे साथ रमण करो।(ऋ. १०/८६/१५) (वही)
ब्रह्म वैवर्त पुराण में मोहिनी नामक वेश्या का आख्यान है जो ब्रह्मा से संभोग की याचना करती है और ठुकराए जाने पर उन्हें धिक्कारते हुए कहती है, ‘‘उत्तम पुरुष वह है जो बिना कहे ही, नारी की इच्छा जान, उसे खींचकर संभोग कर ले। मध्यम पुरुष वह है जो नारी के कहने पर संभोग करे और जो बार-बार कामातुर नारी के उकसाने पर भी संभोग नहीं करे, वह पुरुष नहीं, नपुंसक है।(खट्टर काका, पृ. १८८, सं. छठाँ)
इतना कहने पर भी जब ब्रह्मा उत्तेजित नहीं हुए तो मोहिनी ने उन्हें अपूज्य होने का शाप दे दिया। शाप से घबराए हुए ब्रह्मा जब विष्णु भगवान से फ़रियाद करने पहुँचे तो उन्होंने डाँटते हुए नसीहत दिया, ‘‘यदि संयोगवश कोई कामातुर एकांत में आकर स्वयं उपस्थित हो जाए तो उसे कभी नहीं छोड़ना चाहिए। जो कामार्त्ता स्त्री का ऐसा अपमान करता है, वह निश्चय ही अपराधी है। (खट्टर काका, पृष्ठ १८९) लक्ष्मी भी बरस पड़ीं, ‘‘जब वेश्या ने स्वयं मुँह खोलकर संभोग की याचना की तब ब्रह्मा ने क्यों नहीं उसकी इच्छा पूरी की? यह नारी का महान्‌ अपमान हुआ।'' ऐसा कहते हुए लक्ष्मी ने भी वेश्या के शाप की पुष्टि कर दी।(वही, पृष्ठ १८९)
विष्णु के कृष्णावतार के रूप में स्त्री-भोग का अटूट रिकार्ड स्थापित करके अपनी नसीहत को पूरा करके दिखा दिया। ब्रह्म वैवर्त में राधा-कृष्ण संभोग का जो वीभत्स दृश्य है उसका वर्णन डॉ. गंगासहाय ‘प्रेमी' ने अपने लेख ‘कृष्ण और राधा' में करने के बाद अपनी प्रतिक्रिया इन शब्दों में व्यक्त किया है, ‘‘पता नहीं, राधा कृष्ण संभोग करते थे या लड़ाई लड़ते थे कि एक संभोग के बाद बेचारी राधा लहूलुहान हो जाती थी। उसके नितंब, स्तन और अधर बुरी तरह घायल हो जाते। राधा मरहम पट्टी का सामान साथ रखती होगी। राधा इतनी घायल होने पर प्रति रात कैसे संभोग कराती थी, इसे बेचारी वही जाने। (सरिता, मुक्ता रिप्रिंट भाग-२) इस प्रतिक्रिया में जो बात कहने को छूट गयी वह यह है कि इस हिंसक संभोग, जिसे बलात्कार कहना ज्यादा उचित है, से राधा प्रसन्न होती थी जिससे यही लगता है कि स्त्रियाँ बलात्कृत होना चाहती हैं।
History of prostitution in india के पृष्ठ १४७ पर पद्म पुराण के उद्धृत यह आख्यान प्रश्नगत प्रसंग में संदर्भित करने योग्य है। एक विधवा क्षत्राणी जो कि पूर्व रानी होती है, किसी वेद-पारंगत ब्राह्मण पर आसक्त होकर समर्पण करने के उद्देश्य से एकांत में उसके पास जाती है लेकिन ब्राह्मण इनकार कर देता है। इस पर विधवा यह सोचती है कि यदि वह उस ब्राह्मण के द्वारा बेहोशी का नाटक करे तो वह उसको ज+रूर अपनी बाँहों में उठा लेगा और तब वह उसे गले में हाथ डालकर और अपने अंगों को प्रदर्शित व स्पर्श कराकर उसे उत्तेजित कर देगी और अपने उद्देश्य में सफल हो जाएगी। निम्न श्लोक उसकी सोच को उद्घाटित करते हैं - सुस्निग्ध रोम रहितं पक्वाश्वत्थदलाकृति।/दर्शयिष्यामितद्स्थानम्‌ कामगेहो सुगन्धि च॥
मैं उसको पूर्ण विकसित पीपल के पत्ते की आकार की रोम रहित मृदुल और सुगंधित काम गेह(योनि) को (किसी न किसी तरह से) दिखा दूँगी क्योंकि - बाहूमूल कूचद्वंन्दू योनिस्पर्शन दर्शनात्‌।/कस्य न स्ख़लते चिन्तं रेतः स्कन्नच नो भवेत्‌॥
यह निश्चित है कि ऐसा कोई भी पुरुष नहीं है जिसका वीर्य किसी के बाहु-युगल, स्तन-द्वय और योनि को छूने और देखने से स्खलित न होता हो।
ये कुछ दृष्टांत हैं स्त्रियों के काम-सापेक्ष प्रवृत्ति की निर्द्वन्द्व स्वच्छंदता के, जो वर्तमान नारी-विमर्श के परिप्रेक्ष्य में गहन वैचारिक मंथन की मांग करते हैं।
अभी तक की चर्चा से यह निष्कर्ष स्थापित होता है कि यौन-सम्बन्धों के धरातल पर स्त्री-पुरुष समान हैसियत में नहीं खड़े हैं। कहने को स्त्री पुरुषों के वर्चस्व से अपनी देह को स्वतंत्र कराने के लिए युद्धरत हैं परन्तु अपनी देह के बहुमूल्य कोष को दोनों हाथों से उन्हीं को लुटाने के लिए व्यग्र भी है। यहाँ पर आकर मामला दो पृथक्‌ मानसिकता का बनता है जो स्वयं शासक और शासिता, स्वामी और सेविका(सेविता) में परिणित हो जाता है। यही मानसिकता का वह कारक तत्त्व है जो स्त्रियों की प्रताड़ना के लिए पुरुषों को उकसाता रहता है। अतः नारी-विमर्श के परिप्रेक्ष्य में पहले इस मानसिकता को पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता है। आज भी पुरुष किस जकड़न के साथ इसी मानसिकता को जी रहा है और स्त्री जाने-अनजाने उसकी सहयोगिनी की भूमिका निभा रही है, इसकी पुष्टि में कुछ वास्तविक घटनाएँ उद्धृत की जा रही हैं-
सर्वाधिक कन्या भ्रूण हत्याएँ वाराणसी में- (‘हिन्दुस्तान', वाराणसी, २०.४.०६)
महिला के साथ सामूहिक दुराचार, घर से ले गये थे दबंग, पीड़िता के देवर को दरोगा ने किया बंद। (दैनिक जागरण, वाराणसी, दिनांक २७.०५.२००५) जनपद गाजीपुर में घटित घटना।
थानें में तीन तलाक और पत्नी से छुटकारा। (‘हिन्दुस्तान', वाराणसी, दिनांक ०४.०५.२००५)। जनपद लखीमपुर-खीरी के गोला कोतवाली में सुलह-समझौते के समय घटित घटना।
बेटियों के दुष्कर्म करने वाले पिता को ३२ साल की सजा। (दैनिक जागरण, वाराणसी, दिनांक २१.०४.२००६)। सिंगापुर में ६४ बच्चों के पिता और दस पत्नियाँ रखने वाले इस्लामी इतिहास के एक विद्वान द्वारा अपनी कुछ पत्नियों की मदद से १८ महीने तक १२-१५ वर्ष की अपनी बेटियों के साथ बलात्कार किया जा रहा और उनमें से दो गर्भवती भी हो गई। मामले की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकील की इस दलील-’’आरोपी को विश्वास है कि यदि उसने अपनी बेटियों की यौन-इच्छा को तृप्त कर दिया तो वे विवाह से पहले अन्य व्यक्तियों के साथ यौन-सम्बन्ध नहीं बनायेंगी'', की विकृति के लिए कोई भी शब्द पर्याप्त नहीं है।
नींद में कहे गए तलाक ने खिलाया नया गुल : धार्मिक नेताओं ने दम्पत्ति को अलग रहने का आदेश दिया।(हिन्दुस्तान, वाराणसी, दिनांक २७.०३.०६)। सिलीगुड़ी में आफताब अंसारी नामक व्यक्ति ने नींद में अपनी पत्नी से तीन बार तलाक कह दिया। स्थानीय इस्लामी धर्मगुरुओं ने इसे बाक़ायदा तलाक़ मान लिया।
नजमा करेगी दूसरी शादी, कट्टरपंथियों की जिद मानी : ‘हलाला' के लिए तीन पुरुषों में एक को चुनेगी शौहर (हिन्दुस्तान, वाराणसी, दिनांक १८.०८.०६)। सिलीगुड़ी के केन्द्रपाड़ा में एक मजदूर ने शराब के नशे में अपनी पत्नी को तलाक दे दिया। गाँव की धार्मिक समिति ने उसे ‘हलाला' होने का आदेश दिया और निकाह करने के लिए तीन पुरुषों में से किसी एक के चयन का विकल्प भी दिया।
जहाँ छात्राओं पर पड़ते हैं ‘तालिबानी हंटर' : सरकारी छात्रावास में देनी होती है बेहद अंतरंग जानकारी (‘हिन्दुस्तान', वाराणसी, दिनांक २७.०३.०६) कर्नाटक के मदुरै जिले में स्थित गरीब और पिछड़े वर्ग के छात्रााओं के छात्रावास में महिला वार्डेन द्वारा छात्राओं को इस बात के लिए प्रताड़ित किया जाता है कि वे अपने मासिक धर्म की तिथि एक सार्वजनिक रजिस्टर में दर्ज करें।
कश्मीरी बालाओं के लिए कालेजों में आचार संहिता (हिन्दुस्तान, वाराणसी, दिनांक ०७.०७.०६)। कश्मीर के महिला कालेजों और बालिकाओं के स्कूलों में पढ़ने और पढ़ाने वालों के लिए आचार संहिता लागू हो गई है। क्या करना है और कैसे करना है, के साथ-साथ कब करना है, को भी लागू कर दिया गया है।
पाक सदन में बोलने नहीं दिया जाता महिला सांसदों को : प्रशिक्षण कार्यक्रम में सुनाई अपनी व्यथा कथा (हिन्दुस्तान, वाराणसी, दिनांक २३.०४.०६)।
जान के लिए प्यारा जेलखाना : पाकिस्तानी अखबारों से (हिन्दुस्तान, वाराणसी, दिनांक २३.०७.०६)। पाकिस्तान की जेलों में बलात्कार की शिकार ढाई हजार ऐसी महिलाएं बंद हैं। जो शरीयत कानून के अनुसार बलात्कार के आरोपियों के खिलाफ चश्मदीद गवाह नहीं पेश कर सकीं। उन्हें भय है कि यदि वे छोड़ दी जाती हैं तो उनके पति और भाई उनकी हत्या कर देंगे।
मजिस्टे्रट पुत्र ने यौन शोषण के बाद की ममेरी बहन की हत्या (दैनिक जागरण, वाराणसी, दिनांक १४.०५.२००६)
आदिवासी युवतियों के साथ सामूहिक दुराचार : शिकायक के बावजूद नहीं दर्ज हो पायी प्राथमिकी (दैनिक जागरण, वाराणसी, दिनांक ०९.०१.२००६)
ईसाई अभिनेत्री के मंदिर में प्रवेश से विवाद : मंदिर में केवल हिन्दू श्रद्धालुओं को ही दर्शन की अनुमति (दैनिक जागरण, वाराणसी, दिनांक ०२.०७.०६)। कन्नड़ अभिनेत्री जयमाला और मलयालम अभिनेत्री मीरा जास्मीन द्वारा मंदिर में प्रवेश पर बवाल मच गया।
नाइयों की औरतों को बरातियों के पैर न धोने पर नग्न घुमाया (दैनिक जागरण, वाराणसी, दिनांक २४.०९.२००५)। उड़ीसा के पुरी जिले के भुवनपति गाँव में तथाकथित ऊँची जाति के बारातियों की ओछी और काली करतूत।
मुस्लिम जमात ने महिला का सिर मूंडने को कहा(हिन्दुस्तान, वाराणसी, दिनांक ०२.०४.०६)। चिरूचिरापल्ली में एक पचपन वर्षीय महिला का सिर मूडने का आदेश दिया गया। उस पर आरोप लगाया गया कि उसने अपनी बेटी को वेश्यावृत्ति के लिए प्रोत्साहित किया।
रंगरेलियाँ मनाते पकड़ी गई युवती ने खुद को जलाया (हिन्दुस्तान, वाराणसी, १३.०७.२००६)। स्त्री के लिए शब्द ‘रंगरेलियाँ' और पुरुष के लिए?
शराबी पिता ने दुराचार के बाद हत्या कर बेटी को कुएँ में फेंका(हिन्दुस्तान, वाराणसी, २६.०७.२००६)
क्यों करती हैं अभिनेत्रिायाँ आत्महत्या? (हिन्दुस्तान, वाराणसी, १०.०२.०६)। क्योंकि अन्यों के साथ ही साथ उनके परिवार वाले भी उन्हें पैसा देने वाला पेड़ समझकर शोषण करते हैं।
नागरिकता नहीं तो परमिट ही मिल जाए (दैनिक जागरण, वाराणसी, दिनांक २३.०२.०५)। स्त्रियों के हक के लिए इस्लामी कट्टरवाद से लड़ने वाली विश्व प्रसिद्ध लेखिका तस्लीमा नसरीन की भारत सरकार से गुहार। अनगिनत बंगलादेशियों के अवैध घुसपैठ को वोटर-लिस्ट के माध्यम से वैध करने वाला पराक्रमी देश इस असहाय स्त्री की वैध माँग पर उससे अधिक असहाय।
बलात्कार को लेकर गंभीर नहीं है पुलिस : आई.जी., बलात्कार की बढ़ती घटनाओं से मानवाधिकार आयोग चिन्तित (हिन्दुस्तान, वाराणसी, ०७.०६.०५)।
बरनाला का विधायक पुत्र बलात्कार के आरोप में बंदी (हिन्दुस्तान, वाराणसी, दिनांक १३.०८.२००६)।
उक्त सभी घटनाएँ ऐसी हैं जिनमें पुरुष ही मुख्य कर्ता है लेकिन इनमें कहीं न कहीं से स्त्रियों की भागीदारी को भी रेखांकित किया जा सकता है। अब उन स्थितियों और घटनाओं को इंगित किया जा रहा है जो इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि स्त्रियाँ ही पुरुषों की इस मनोदशा की पोषक और वाहक होती हैं क्योंकि जिस पुत्रा-रत्न को प्राप्त करके इनके पाँव जमीन पर नहीं पड़ते वही तो भविष्य का पुरुष होता है। कन्या-भ्रूण की हत्या को आदि युग से प्रचलित कन्या-वध की प्रथा के वर्तमान रूप में देखा जा सकता है। कन्या-हत्या निश्चित रूप से मातृ-सत्तात्मक समाज की देन है जिसकी झलक राहुल जी की पुस्तक ‘वोल्गा से गंगा' की पहली कहानी ‘निशा' में मिलती है जिसमें जब निशा यह देखती है कि उसके वर्चस्व को उसकी अपनी ही बेटी लेखा से खतरा उत्पन्न हो गया है तो वह उसकी हत्या का प्रयास करती है और दोनों ही मर जाती हैं। उनकी मृत्यु के बाद परिवार की सबसे बलिष्ठ स्त्री रोचना का निशा-परिवार की स्वामिनी बनने का सीधा संकेत तो यही है कि परिवार के सभी पुरुषों पर एक ही स्त्री का एकाधिकार। इसने स्त्रियों के मध्य आपसी वैमनस्य और शत्रुता तो पैदा ही किया होगा, इस एकाधिकार के विरुद्ध गुप्त संभोग हेतु वेदों में वर्णित जार-प्रथा का प्रचलन भी किया होगा। काशीनाथ विश्वनाथ राजवाडे ने अपनी पुस्तक ‘भारतीय विवाह संस्था का इतिहास' में इस आधार पर कि गांधारी के सौ पुत्र और मात्रएक ही कन्या थी, कन्या-हत्या का प्रचलन स्थापित किया है। (पृष्ठ ७०)।
स्त्रियों का स्त्रियों के प्रति इस मारक द्वेष की मानसिकता की चरम परिणति उसकी पुत्र-प्राप्ति की अदम्य और दम्भपूर्ण लालसा में देखा जा सकता है जो पुरुष-सत्ता का मातृ-सत्ता पर बिना प्रयास के विजय सरीखा है। इस मानसिकता की पुष्टि दैनिक जागरण, वाराणसी के दिनांक १३.०९.०६ में छपे दो समाचारों से बिना किसी संशय के होती है। पहले समाचार का शीर्षक है ‘महिलाएँ कल रखेंगी जीवित्पुत्रिका व्रत' इसकी शुरुआत इस प्रकार है-’स्त्री के जीवन में पति और पुत्र ही उसका प्रत्यक्ष आभूषण है। इनकी रक्षा हेतु अनेक व्रत-उपवास का विधान शास्त्राों में बताया गया है।....यह व्रत स्त्रियाँ अपने पुत्रों की जीवन-रक्षा के उद्देश्य से करती हैं। इसी तिथि को प्रकाशित दूसरे समाचार का शीर्षक है, ‘‘जहाँ अवांछित लड़कियों को कहा जाता है ‘काफी' और ‘अनचाही' - पंजाब और हरियाणा राज्य जहाँ बड़े पैमाने पर कन्या भ्रूण-हत्या के कारण लिंगानुपात खतरनाक रूप से असंतुलित हो गया है, से संबंधित इस समाचार का सार यह है कि परिवार में अवांछित होने के कारण इन लड़कियों के ‘काफी', ‘अनचाही', ‘भरपाई', ‘भतेरी' जैसे अटपटे नाम रख दिए जाते हैं। इसकी थोड़ी-सी बानगी देखिए - ‘एक ओर जहाँ काफी का भाई अपनी माँ की आँखों का तारा है, तो काफी आँख की किरकिरी।...उसकी माँ दयावती कहती है कि ...चूँकि हम लड़की को कुदरत की ओर से सजा ही मानते हैं, इसलिए उसका नाम भरपाई रख दिया गया है। यानी अपराध की भरपाई।
स्पष्ट है सजा कोई भी नहीं भुगतना चाहेगा और अनचाही सजा तो क़तई नहीं। एक समाचार शीर्षक की बानगी और देखिए, ‘‘पुत्र की कामना के साथ हजारों ने लगाई लोलार्क कुंड में डुबकी' (‘हिन्दुस्तान', वाराणसी, दिनांक ३०.०८.०६)। अभी-अभी हरितालिका तीज का पर्व सम्पन्न हुआ। (अगस्त २००६)। यह पर्व स्त्रियाँ अपने पति की रक्षा और अखंड सौभाग्यवती रहने के लिए निर्जला व्रत रहकर मनाती हैं। इसी श्रेणी का एक पर्व करवा चौथ भी है। ‘हिन्दुस्तान', वाराणसी के दिनांक २५.०८.२००६ के परिशिष्ट ‘सुबह-ए-बनारस' में ‘ताकि सुहाग सलामत रहे' शीर्षक से प्रकाशित सियाराम यादव का यह पैरा उद्धृत है, ‘‘पश्चिमी समाज की महिलाओं को आश्चर्य होता है कि भारत (एक हद तक पूरब) की महिलाएँ पति में इनकी आस्था कैसे रखती हैं? उनके प्रति इतना विश्वास उनमें क्यों होता है कि वे उनकी पूजा तक करती हैं। वे पति को परमेश्वर मानती हैं। यहाँ तक स्पष्ट कर देना जरूरी है कि भारत में विवाह जन्म-जन्म का पवित्र रिश्ता होता है जबकि पश्चिम में यह एक समझौता। जाहिर है जो जन्म-जन्म का रिश्ता है वह स्थित दीर्घजीवी बल्कि अमर होता है। वह अनेक जन्मों तक चलता रहता है। इसलिए उसके प्रति गहरी आस्था विश्वास होना स्वाभाविक है और इसलिए पति परमेश्वर भी हो जाता है। हालांकि रिश्ता दो तरफा है, इसलिए पत्नी का भी इतना ही महत्त्व होना चाहिए, जितना पति का होता है, यानी पति अगर परमेश्वर है तो पत्नी को भी देवी होना चाहिए। यूँ तो भारतीय नारी को देवि का दर्जा प्राप्त है लेकिन यह सैद्धान्तिक ही है, व्यावहारिक जगत्‌ में ऐसा नहीं है। फिर भी भारतीय समाज में दाम्पत्य की गहरी नींव का श्रेय महिलाओं को ही जाता है।'' यादव जी का लेख उन तमाम वैचारिक झोल का सम्पुट है जो इस प्रकार के परम्परावादी लेखों की विशेषता होती है लेकिन यहाँ इस पर चर्चा नहीं करनी है। उनके द्वारा अंतिम वाक्य में सत्य को स्वीकार कर लिया गया है। अब स्त्रियों को ही सोचना है कि वे कब तक अपनी अस्मिता को मारकर दाम्पत्य जीवन की गहरी नींव की ईंट बनी रहेंगी।
इस प्रकार हम देखते हैं कि धर्म, ईश्वर, देवता, परम्परा आदि सभी कुछ स्त्री के विरोध मंय संगुफित है और पुरुष इनका एकमात्र घोषित प्रतिनिधि है जो इन्हीं के माध्यम से स्त्री की प्रताड़ना का संहिताकरण करता है और फिर उन संहिताओं की विधि-विधान से पूजा करने के लिए स्त्रियों का मानसिक अनुकूलन भी करता है। जब कोई स्त्री पुत्र को जन्म देने के बाद अपने चारों तरफ एक दंभभरी मुस्कान फेंकती है, या एक पत्नी या माँ के रूप में पति और पुत्र के आवरण में लिपटे पुरुष नामधारी जीव की रक्षा और दीर्घायु के लिए कष्टकारी अनुष्ठान करती है, अथवा पुत्र की तुलना में पुत्री की उपेक्षा करती है, पुत्र या परिवार के अन्य सदस्यों की प्रताड़ना का अनुमोदन करती है तो निश्चित मानिए, वह भविष्य के किसी बलात्कारी के स्वागत में तोरण द्वार सजा रही होती है। वह एक कहावत है न ‘charity begins at home' तो स्त्रियों का ही यह दायित्व है कि पुत्र पैदा करके उनके अंदर यह संस्कार भी डालें कि वह स्त्रियों का सम्मान करना सीखें। स्त्री को किसी हिंसक पशु से कोई खतरा नहीं है। उसके लिए पुरुष ही एक मात्र हिंसक पशु है। वह घर-आँगन से लेकर हर गली-कूचे में इन्हीं का शिकार होती रहती है। यदि कोई स्त्री अपने बलात्कारी पुत्र या पति की सुरक्षा और दीर्घायु के लिए व्रत उपवास रखती है, यदि वह इन तथाकथित धर्म-ग्रन्थों अथवा उन पर स्थापित इतर शक्तियों की पूजा करती है, जो उसको मनुष्य का दर्जा ही नहीं देते तो क्या यह स्त्री-विमर्श की राह में सबसे बड़ा रोड़ा नहीं है? क्या स्त्री पुरुष-वर्चस्व के इन प्रतीक चिद्दों को ध्वस्त करने के लिए तैयार है? क्या वह इसके लिए वह अपनी मानसिकता में बदलाव करने का साहस कर सकेगी?
मैं पूरे दावे के साथ कह सकता हूँ कि उक्त या ऐसे किसी भी प्रश्न का उत्तर नकारात्मक ही होगा क्योंकि वर्ण-व्यवस्था सामाजिक पहचान की दंभी सोच का परिचायक भी है और स्त्रियाँ अपनी वास्तविक हैसियत से अनभिज्ञ अपनी जातीय श्रेष्ठता के विज्ञापन-प्रदर्शन में पुरुषों की अपेक्षा कहीं अधिक क्रूर होती हैं। अपने से निम्न जाति के स्त्री-पुरुषों के साथ उसका व्यवहार घृणास्पद और शत्रुवत्‌ ही होता है और यदि कोई व्यक्ति दलित हो तो कहना की क्या? वह तो पैदाइशी घृणा का पात्र है। किसी दलित स्त्री का बलात्कार हो जाए तो कितनी सवर्ण स्त्रियाँ उद्वेलित होती हैं? कोई सामाजिक कार्यकत्री हो तो शायद औपचारिकता निभा दे अन्यथा एक के भी कान पर कोई जूँ नहीं रेंगती। यही कारण है कि आये दिन थोक के भाव से दलित और आदिवासी युवतियाँ सामूहिक बलात्कार का शिकार होती हैं परन्तु किसी का कुछ नहीं बिगड़ता। मैं इस लेख का समापन दैनिक जागरण, वाराणसी के दिनांक १४.०९.२००६ के अंक में ‘बालिका संग दुराचार पीड़ितों को ही जेल' शीर्षक से छपे समाचार से करना चाहूँगा। मामला जनपद आजमगढ़ के जहानागंज थाना क्षेत्र के भोपतपुर गाँव का है। गाँव की एक तेरह वर्षीय दलित बालिका के साथ गाँव का ही एक दबंग युवक बलात्कार कर देता है। घर वाले जब शिकायत लेकर बलात्कारी के घर जाते हैं तो मार-मारकर लहूलुहान कर दिए जाते हैं। थाने पर गुहार लगाते हैं तो मार-पीट के आरोप में जेल पाते हैं। संयोगवश इस वर्ष जीवित्पुत्रिका के व्रत की तिथि भी यही है। बलात्कारी की माँ उसकी रक्षा और दीर्घायु के लिए व्रत रख रही होगी। यह हिन्दी दिवस की भी तिथि है। पूरी सरकार और बुद्धिजीवियों की फ़ौज हिन्दी की अस्मिता बचाने में व्यस्त रहेगी। कितनी बिंदियों के चीथड़े किए गए किसी से क्या मतलब?
स्त्री-विमर्श बौद्धिक-विलास के रंग-मंच पर खेला जाने वाला नाटक नहीं है। यह सक्रिय आन्दोलन का विषय है। अभी भी अधिसंख्य स्त्रियाँ इससे उसी तरह अनभिज्ञ हैं जैसे अपने अस्तित्व से। स्त्री के अस्तित्व की वास्तविक पहचान और मिथक-भंजन इसकी पहली और अंतिम अनिवार्य शर्त है। बीच का सब कुछ अपने आप ढह जाएगा। स्त्री को शिक्षित और नए संस्कार में दीक्षित करने की आवश्यकता है यदि चाहते हैं कि इसका अगला संस्करण समतावादी सोच की धरातल पर मजबूती से खड़ा हो सके।

- मूलचन्द सोनकर


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अब आइये, विषय की ओर लौटते हैं। जिस ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः' का डंका पीटकर हिन्दू धर्म और संस्कृति पर गर्व करने वाले घोषणा करते हैं कि हमारे धर्म-शास्त्रों में स्त्री को देवी का रूप मानकर उसकी पूजा करने का प्रावधान है, वह इसी मनुस्मृति के तीसरे अध्याय के छप्पनवें श्लोक की पहली पंक्ति हैं। किसी ने भी यह सोचने की जरूरत नहीं समझा कि जिस मनु स्मृति ने स्त्रियों की अस्मिता को लांछित करने में कोई कोर-कसर बाक़ी न रखा हो उसमें यह श्लोक आया ही क्यों? लेकिन करें क्या, इस श्लोकार्द्ध का अर्थ ऊपर से देखने में इतना सीधा और सरल है कि इसको किसी के मन में कोई संशय ही नहीं पैदा होता। इसके अतिरिक्त यह कारण भी हो सकता है कि अधिकांश लोगों को यह पता ही न हो कि यह किस ग्रन्थ में है वास्तविक अर्थ तक कैसे पहुँचेगे। इस श्लोक को यदि श्लोक संख्या ५४ और ५५ के साथ पढ़ा जाये तो स्पष्ट होगा कि ‘पूजा' का आशय विवाह में दिया जाने वाला स्त्री धन है और मनु ने इससे दहेज प्रथा की शुरुआत की थी। स्त्री-विमर्श के पैरोकारों को चाहिये कि वे इस दुष्टाचार का पर्दाफ़ाश करें।
मनुस्मृति ने स्त्रियों की अस्मिता और स्वाभिमान पर कितने तरीक़े से हमला किया है, उसकी बानगी देखिये-शूद्र की शूद्रा ही पत्नी होती है। वैश्य को वैश्य और शूद्र दोनों वर्ण की कन्यायों से, क्षत्रिय को क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र तीनों वर्ण की कन्याओं से तथा ब्राह्मण को चारों वर्णों की कन्याओं से विवाह करने का अधिकार है। (३.१३)
लेकिन इसके तुरन्त बाद वाला श्लोक आदेश देता है-ब्राह्मण और क्षत्रिाय को स्वर्णा स्त्री न मिलने पर भी शूद्रा को स्त्री बनाने का किसी भी इतिहास में आदेश नहीं पाया जाता। (३.१४)
इसके आगे के श्लोकों में भी शूद्र वर्ण की स्त्री के लिये तमाम घिनौनी बातें कही गई हैं लेकिन निम्न श्लोक में तो सारी सीमाओं को तोड़कर रख दिया- जो शूद्रा के अधर रस का पान करता है उसके निःश्वास से अपने प्राण-वायु को दूषित करता है और जो उनमें सन्तान उत्पन्न करता है उसके निस्तार का कोई उपाय नहीं है। (३.१९)
किन्तु जैसे ही याद आया कि इससे स्त्रियों को अबाध भोगने के अधिकार से सवर्ण पुरुष वंचित हो जायेंगे तो कह दिय-स्त्रियों का मुख सदा शुद्ध होता है....(५.१३०)
अब स्त्रियों पर कुछ सामान्य टिप्पणियाँ भी देखिये-
मदिरा पीना, दुष्टों की संगति, पति का वियोग, इधर-उधर घूमना, कुसमय में सोना और दूसरों के घरों में रहना ये छः स्त्रियों के दोष है। (२.१३)
स्त्रियाँ रूप की परीक्षा नहीं करतीं, न तो अवस्था का ध्यान रखती हैं, सुन्दर हो या कुरूप हों, पुरुष होने से ही वे उसके साथ संभोग करती हैं। (९.१४)
पुंश्चल (पराये पुरुष से भोग की इच्छा) दोष से, चंचलता से और स्वभाव से ही स्नेह न होने के कारण घर में यत्नपूर्वक रखने पर भी स्त्रियाँ पति के विरुद्ध काम करती हैं। (९.१५)
ब्रह्मा जी ने स्वभाव से ही स्त्रियों का ऐसा स्वभाव बनाया है, इसलिये पुरुष को हमेशा स्त्रियों की रक्षा करनी चाहिए। (९.१६)
मनु जी ने सृष्ट्यादि में शय्या, आसन, आभूषण, काम, क्रोध, कुटिलता, द्रोह और दुराचार स्त्रियों के लिए ही कल्पना की थी। (९.१७)
ऐसे न जाने कितने श्लोक पूरी मनु स्मृति में फैले पड़े हैं। जो लोग यह तर्क देते है कि मनुस्मृति की प्रासंगिकता नहीं रह गई है, वे स्वयं के अन्दर झांककर अपनी मानसिकता की निष्पक्ष पड़ताल करके पूरी ईमानदारी से कुछ बोलें अथवा राजस्थान उच्च न्यायालय के परिसर में मनु की मूर्ति की स्थापना या कल्याण सिंह द्वारा अयोध्या में मनु पार्क के निर्माण के प्रस्ताव (मुझे पता नहीं है कि पार्क बना अथवा नहीं) या भंवरी बाई पर माननीय न्यायाधीश की टिप्पणी अथवा अरविन्द जैन द्वारा इंगित तमाम मामलों के पीछे छिपी मानसिकता का औचित्य प्रस्तुत करें। अभी तो मात्र इतना ही कहा जा सकता है कि स्त्री मर जाती है, स्त्री पैदा होती है लेकिन उसके दुर्गति की शाश्वतता बनी रहती है। इंतजार है नई स्त्री के पैदा होने की जो विद्रोह कर सके। ब्रह्मा, विष्णु और शिव हिन्दू धर्म में ईश्वर की तीन सर्वोच्च प्रतीक हैं। ब्रह्मा उत्पत्ति, विष्णु पालन और शिव संहार के देवता माने गये हैं। इस रूप में ये एक-दूसरे के पूरक दिखते हैं लेकिन वैष्णवों के मध्य हुए संघर्षों से यह सिद्ध होता है कि प्रारम्भ के किसी काल-खंड में शिव और विष्णु एक-दूसरे के विरोधी विचारधारा के पोषक और संवाहक थे। पालक होते हुए भी तथाकथित अधर्मियों का विनाश करने के लिए विष्णु ही बार-बार अवतार लेते हैं। सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती इनकी पत्नियों के नाम हैं। आइये देखें कि यौन-विज्ञान के महारथियों ने इनका किस प्रकार चित्रण किया है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव का सरस्वती, लक्ष्मी और पर्वती के साथ पत्नी के अतिरिक्त अन्य सम्बन्ध का उल्लेख इस लेख के दूसरे खंड में किया जा चुका है। आगे बढ़ने से पूर्व स्त्रियों के प्रति इस वीभत्स काम-कुंठा की अभद्र मानसिकता की एक बानगी देखिये जो ‘खट्टर काका' के अन्तिम पृष्ठ पर अथर्ववेद के हवाले से उद्धृत किया गया है-यावर्दैीनं पारस्वतं हास्तिनं गार्दभं च यत्‌/यावदश्वस्य वाजिनस्तावत्‌ से वर्धतां पसः। (अथर्व ६/७२/३)
अर्थात्‌ ‘‘कामदंड बढ़कर वैसा स्थूल हो जाय जैसा हाथी, घोड़े या गधे का...।''
इस लम्पट और उद्दंड कामुकता के वेग का प्रभाव ऐसा पड़ा यहाँ के यौनाचार्यों पर कि देवी तक की वंदना करते समय उनके कामांगों का स्मरण करना नहीं भूलते। उदाहरण-वामकुचनिहित वीणाम/वरदां संगीत मातृकां वंदे।
बायें स्तन पर वीणा टिकाये हुए संगीत की देवी की वंदना करते है। (खट्टर काका, पृष्ठ १६६)
स्मरेत्‌ प्रथम पुष्पणीम्‌/रुधिर बिंदु नीलम्बराम्‌/घनस्तन भरोन्नताम्‌/त्रिपुर सुन्दरी माश्रये (खट्टर काका, पृष्ठ १६५)
‘प्रथम पुष्पिता होने के कारण जिनका वस्त्र रक्तरंजित हो गया है, वैसी पीनोन्नतस्तनी त्रिापुर सुन्दरी का आश्रय मैं ग्रहण करता हूँ।
कालतंत्र में काली का ध्यान-घोरदंष्ट्रा करालास्या पीनोन्नतपयोधरा/महाकालेन च समं विपरीतरतातुरा। (वही, पृष्ठ १६६)
कच कुचचिबुकाग्रे पाणिषु व्यापितेषु/प्रथम जलाधि-पुत्री-संगमेऽनंग धाग्नि/ग्रथित निविडनीवी ग्रन्थिनिर्मोंचनार्थं चतुरधिक कराशः पातु न श्चक्रमाणि। (वही, पृष्ठ १६७)
लक्ष्मी के साथ चतुर्भुज भगवान्‌ का प्रथम संगम हो रहा है। उनके चारों हाथ फंसे हुए हैं। दो लक्ष्मी के स्तनों में, एक केश में, एक ठोढ़ी में। अब नीवी (साड़ी की गाँठ खोलें तो कैसे? इस काम के लिये एडीशनल हैंड (अतिरिक्त हाथ) चाहने वाले विष्णु भगवान्‌ हम लोगों की रक्षा करें-पद्मायाः स्तनहेमसद्मनि मणिश्रेणी समाकर्षके/किंचित कंचुक-संधि-सन्निधिगते शौरेः करे तस्करे/सद्यो जागृहि जागृहीति बलयध्यानै र्ध्रुवं गर्जता/कामेन प्रतिबोधिताः प्रहरिकाः रोमांकुरः पान्तु नः।अर्थात्‌ लक्ष्मी की कंचुकी में भगवान का हाथ घुस रहा है। यह देखकर कामदेव अपने प्रहरियों को जगा रहे हैं- उठो, उठो घर में चोर घुस रहा है। प्रहरी गण जागकर खड़े हो गये हैं। वे ही खड़े रोमांकुर हम लोगों की रक्षा करें। पार्वती की वंदना-गिरिजायाः स्तनौ वंदे भवभूति सिताननौ, तपस्वी कां गतोऽवस्थामिति स्मेराननाविव,....अंकनिलीनगजानन शंकाकुल बाहुलेयहृतवसनौ/समिस्तहरकरकलितौ हिमगिरितनयास्तनौ जयतः।(वही, पृष्ठ १६८)तो यह कामांध मस्तिष्क की वीभत्स परिणति जो देवी-देवताओं तक को नहीं छोड़ती लेकिन प्रचार किया जाता है कि देश की महान्‌ संस्कृति स्त्रियों को पूज्य घोषित करती है
वैसे ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः' के द्वारा स्मृतिकार कहीं से भी यह नहीं कहना चाहता कि स्त्री पूज्यनीय है। यदि बहुप्रचारित (यद्यपि दुष्प्रचारित कहना ज्यादा सटीक है) अर्थ ही लिया जाए तो भी यह सिद्ध नहीं होता कि स्त्रियों के बारे में इससे भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व रेखांकित होता है। यह श्लोक हाईपोथीसिस की बात करता है किसी प्रकार का आदेश नहीं देता। ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी ने इस श्लोक का अनुवाद इस प्रकार किया है, ‘‘जिस कुल में स्त्रियाँ पूजित (सम्मानित) होती हैं, उस कुल से देवता प्रसन्न होते हैं।'' इस अनुवाद से भी यही सिद्ध होता है कि यह एक अन्योन्याश्रित स्थिति है अर्थात्‌ स्त्रियों को पूज्य घोषित करने का कोई बाध्यकारी आदेश नहीं दिया। मनु ने, जैसा कि उन्हें प्रताड़ित अपमानित करने के लिए आदेशित किया है। यही कारण है कि स्त्रियों के बारे में पुरुषों में अच्छी धारणा अंकुरित ही नहीं हो पायी। अपने इस कथन की पुष्टि में प्रेमचंद, तुलसीदास और कबीरदास का उदाहरण देकर करना चाहूँगा।
ऋग्वेद के मंत्र १०।८५।३७ हो या मनु स्मृति के नवें अध्याय के श्लोक ३३ से लेकर ५२ तक स्त्रियों को पुरुषों की खेती कहा गया है। इस्लाम भी कुरान की आयत १.२.१२३ के द्वारा इसी प्रकार की व्यवस्था करता है। प्रेमचंद ने अपनी कहानी ‘बालक' में इस मानसिकता का बखूबी पोषण किया है। इस कहानी का नायक निरक्षक ब्राह्मण गंगू है। गोमती पढ़ी-लिखी विधवा है। कई साल पहले विधवाश्रम में आयी थी। तीन बार आश्रम के कर्मचारियों ने उसका विवाह करा दिया, पर हर बार महीने-पन्द्रह दिन के बाद भाग आती थी और आश्रम से निकाल दी गई थी। इसी गोमती से गंगू प्रेम-विवाह करता है। गोमती पहले से ही गर्भवती होती है। गंगू के पास से भाग जाती है। लखनऊ में बालक को जन्म देती है। पता लगने पर गंगू उसे बालक समेत वापस लाता है। यहाँ गंगू के उद्गार देखिए, ‘‘मैंने तुमसे इसलिए विवाह नहीं किया कि तुम देवी हो; बल्कि इसलिए कि मैं तुम्हें चाहता था और सोचता था कि तुम भी मुझे चाहती हो। यह बच्चा मेरा बच्चा है। मैंने एक बोया हुआ खेत लिया, तो क्या उसकी फसल को इसलिए छोड़ दूँगा, कि उसे किसी दूसरे ने बोया था?'' जो प्रेमचंद ने नहीं लिखा वह यह है कि ‘इतना सुनते ही उस खेती ने तड़ से अपने स्वामी के पैरों पर अपना सर रख दिया और बालक जनने पर फूली न समाई।' पता नहीं बालिका होने पर गंगू का आदर्श कहाँ टिकता?
ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी (सुं.कां. ६२-३) का उद्घोष करने वाले तुलसीदास ने भी स्त्री-निंदा में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ा। ‘सरिता' फरवरी १९५६(सरिता मुक्ता रिप्रिंट भाग-१) के अंक में ‘रामचरितमानस में नारी' शीर्षक से प्रकाशित लेख में इसका विस्तृत ब्यौरा दिया गया है। ऐसा करने में उन्होंने भी मनु की शूद्र स्त्री को अलग खाने में रखा है। संदर्भित लेख से ही कुछ उद्धरणों को देकर इसे स्पष्ट किया जा रहा है- करै विचार कुबुद्धि कुजाती। होई अकाजु कवनि विधि राती।/देखि लागि मधु कुटिल किराती। जिमि गंव तकै लेऊँ केहि भाँति॥/भरत मातु पहि गइ बिलखानी। का अनमनि हसि कह हँसि रानी॥/उतरू देहि नहिं लेइ उसासू। नारि चरित करि ढारइ आँसू।
खोटी बुद्धि वाली और खोटी-नीच जाति वाली मंथरा विचार करने लगी कि रात ही रात में यह काम कैसे बिगाड़ा जाए? जिस तरह कुटिल भीलनी शहद के छत्ते को लगा देखकर अपना मौका ताकती है कि इसको किस तरह लूँ। वह बिलखती हुई भरत की माता कैकेई के पास गई। उसको देखकर कैकेई ने कहा कि आज तू उदास क्यों है? मंथरा कुछ जवाब नहीं देती और लंबी साँस खींचती है और स्त्री चरित्रकरके आँखों से पानी टपकाती है।
मंथरा कैकेई के लिए ही मरती रहती है लेकिन तुलसीदास ने कैकेई के ही मुँह से उसके लिए यह कहलवाया - काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि। तिय विसेखि मुनि चेरि कहि भरत मातु मुसकानि।
काने, लंगड़े, लूले - ये बड़े कुटिल और कुचाली होते हैं और उनमें भी स्त्री और विशेष रूप से दासी-ऐसा कहके भरत मातु मुसकाई।
इतने विशेषणों से उसे तब अलंकृत किया गया जबकि स्वयं सरस्वती ने उसकी मति फेरी थी, अर्थात्‌ सरस्वती भी स्त्री होने के कारण लपेटे में। सीता और पार्वती को भी क्रमशः राम और शिव की किंकरी ही घोषित कराया है। तुलसीदास ने और वह भी उनकी माता के ही मुँह से। सीता की माँ सीता की विदाई के समय राम से कहती है - तुलसी सुसील सनेहु लखि निज किंकरी कर मानिबी।
इसके सुशील स्वभाव और स्नेह को देखकर इसे अपनी दासी मानियेगा। बिल्कुल यही बात पार्वती की माँ भी बेटी को विदा करते समय शिव से कहती है - नाथ उमा मम प्रान सम गृह किंकरी करेहु/छमेहु सकल अपराध अब होइ प्रसन्न बरु देहु।
हे नाथ, यह उमा मुझे मेरे प्राणों के समान है। अब इसे अपने घर की दासी बनाइये और इसके सब अपराधों को क्षमा करते रहिएगा। अब प्रसन्न होकर मुझे यही वर दीजिए-करेहु सदा संकर पद पूजा। नारि धरम पति देव न दूजा॥
पार्वती को उपदेश देते हुए कहती हैं कि हे पुत्री, तू सदा शिव के चरणों की पूजा करना, नारियों का यही धर्म है। उनके लिए पति ही देवता है और कोई देवता नहीं है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि जब ईश्वर या उसके अवतार द्वारा स्वयं ही पत्नी को अपने चरण में जगह दी जाती है तो पुरुष क्यों नहीं करेगा अथवा उसे क्यों नहीं करना चाहिए?
गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित रामचरित मानस के एक सौ छठवें संस्करण में निम्न दृष्टांत उद्धृत किए जा रहे हैं - माता पिता पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखत नारी॥/होई विकल सक मनहि न रोकी। जिमि रबि मनि द्रव रबिहि विलोकी॥ (पृष्ठ ६२६)
स्त्री मनोहर पुरुष को देखकर चाहे वह भाई, पिता, पुत्र ही हो, विकल हो जाती है और मन को नहीं रोक सकती। जैसे सूर्यकांत मणि ‘सूर्य' को देखकर द्रवित हो जाती है।
सती अनसूया द्वारा सीता को उपदेश देते समय उनके मुँह से स्त्रियों के बारे में जो कहलवाया गया है, वह पृष्ठ संख्या ६०९ और ६१० पर अंकित है। देखिए - धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥/वृद्ध रोग सब जड़ धन हीना।/ अंध बधिर क्रोधी अति दीना॥/ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना।/नारि पाव जमपुर दुखनाना॥/एकइ धर्म एक व्रत नेमा।/कायॅ वचन मन पति पद प्रेमा॥
धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री - इन चारों की विपत्ति के समय ही परीक्षा होती है। वृद्ध, रोगी, मूर्ख, निर्धन, अंधा, बहरा, क्रोधी और अत्यन्त ही दीन-ऐसे भी पति का अपमान करने से स्त्री यमपुर में भाँति-भाँति के दुख पाती है। शरीर, वचन और मन से पति के चरणों में प्रेम करना स्त्री के लिए, बस एक ही धर्म है, एक ही व्रत है और एक ही नियम है-जग पतिव्रता चारि विधि अहहीं। वेद पुरान संत सब कहहीं॥/उत्तम के अस बस मन माहीं। सपनेहु आन पुरुष जग नाहीं॥
जगत्‌ में चार प्रकार की पतिव्रताएँ हैं। वेद पुराण और संत सब ऐसा कहते हैं कि उत्तम श्रेणी की पतिव्रता के मन में ऐसा भाव बसा रहता है कि जगत्‌ में(मेरे पति को छोड़कर) दूसरा पुरुष स्वप्न में भी नहीं है-मध्यम परपति देखइ कैसे। भ्राता पिता पुत्र निज जैसे॥/धर्म विचारी समुझि कुल रहईं।/सा निकिष्ट त्रिय श्रुति अस कहईं॥
मध्यम श्रेणी की पतिव्रता पराये पति को कैसे देखती है, जैसे वह अपना सगा भाई, पिता या पुत्र हो(अर्थात्‌ समान अवस्था वाले वह भाई के रूप में देखती है, बड़े को पिता के रूप में और छोटे को पुत्र के रूप में देखती है।) जो धर्म के विचार कर और अपने कुल की मर्यादा समझकर बची रहती है वह निकृष्ट स्त्री है, ऐसा वेद कहते हैं- बिन अवसर भय तें रह जोई। जानेहु अधम नारि जग सोई॥/पति बंचक परपति रति करई। रौरव नरक कल्प सत परई॥
जो स्त्री मौका न मिलने से या भयावश पतिव्रता बनी रहती है, जगत्‌ में उसे अधम स्त्री जानना। पति को धोखा देने वाली जो स्त्री पराये पति से रति करती है, वह तो सौ कल्प तक रौरव नरक में पड़ी रहती है-छन सुख लागि जनम सत कोटी। दुख न समुझ तेहि सम को खोटी॥/बिनु श्रम नारि परम गति लहई। पतिब्रत धर्म छाड़ि छल गहई॥
क्षणभर के सुख के लिए जो सौ करोड़ (असंख्य) जन्मों के दुख को नहीं समझती, उसके समान दुष्टा कौन होगी। जो स्त्री छल छोड़कर पतिव्रत धर्म को ग्रहण करती है, वह बिना ही परिश्रम परम गति को प्राप्त करती है - पति पतिकूल जनम जहँ जाई। बिधवा होइ पाइ तरुनाई॥
किन्तु जो पति के प्रतिकूल चलती है, वह जहाँ भी जाकर जन्म लेती है, वहीं जवानी पाकर (भरी जवानी में) विधवा हो जाती है - सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ।/जसु गावति श्रुति चारि अजहुँ तुलसिका हरिंहि प्रिय॥
स्त्री जन्म से ही अपवित्र है, किन्तु पति की सेवा करके यह अनायास ही शुभगति प्राप्त कर लेती है। (पतिव्रत धर्म के कारण) आज भी ‘तुलसी जी' भगवान को प्रिय है और चारों वेद उनका यश गाते हैं।
तुलसीदास जी को पुरुषों में कोई दोष नहीं दिखाई देता तो इसके पीछे पुरुष की वही स्त्री विरोधी मानसिकता है जिसे बड़े करीने से धर्मशास्त्र की सान पर परवान चढ़ाकर विकसित किया गया है और जो आज भी क़ायम है।
कबीर तुलसी के समकालीन माने जाते हैं : परन्तु दोनों का रचना-संसार समान नहीं है। आज कबीर को सामाजिक क्रांति के अग्रदूत, शोषितों, पीड़ितों के प्रबल पक्षकार के रूप में देखा जाता है लेकिन स्त्रियों की निंदा करने में वह भी किसी से पीछे नहीं है। डॉ. युगेश्वर द्वारा सम्पादित और हिन्दी प्रचारक संस्थान वाराणसी द्वारा प्रकाशित ‘कबीर समग्र' के प्रथम संस्करण १९९४ से कुछ साखियाँ यहाँ उद्धृत की जा रही हैं :-
कामणि काली नागणीं तीन्यूँ लोक मंझारि।
राम सनेही ऊबरे, विषई खाये झारि॥
(पृष्ठ २८४)
एक कनक अरु कॉमिनी, विष फल कीएउ पाइ।
देखै ही थै विष चढै+, खॉयै सूँ मरि जाइ॥
(पृष्ठ २८६)
नारी कुंड नरक का, बिरला थंभै बाग।
कोई साधू जन ऊबरै, सब जग मूँवा लाग॥
(पृष्ठ २८६)
जोरू जूठणि जगत की, भले बुरे का बीच।
उत्थम ते अलग रहैं, निकट रहें तें नीच॥
(पृष्ठ २८६)
सुंदरि थै सूली भली, बिरला बंचै कोय।
लोह निहाला अगनि मैं, जलि बलि कोइला होय॥
(पृष्ठ २८६)


इक नारी इक नागिनी, अपना जाया खाय।
कबहूँ सरपटि नीकसे, उपजै नाग बलाय॥
(पृष्ठ ४३७)
सर्व सोनाकी सुन्दरी, आवै बास सुबास।
जो जननी ह्नै आपनी, तौहु न बैठे पास॥
(पृष्ठ ४३७)
गाय भैंस घोड़ी गधी, नारी नाम है तास।
जा मंदिर में ये बसें, तहाँ न कीजै बास॥
(पृष्ठ ४३८)
छोटी मोटी कामिनी, सब ही विष की बेल।
बैरी सारे दाब दै, यह मारै हँसि खेल॥
(पृष्ठ ४४०)
नागिन के तो दोय फन, नारी के फन बीस।
जाको डस्यो न फिरि जिये, मरि है बिस्वा बीस॥
(पृष्ठ ४४०)
इस प्रकार हम देखते हैं कि स्त्री निंदा में कोई किसी से कम नहीं है। क्या नारी विमर्श के पैरोकार प्रेमचंद, तुलसी, कबीर का पुनर्मूल्यांकन करेंगे? क्या स्त्रियाँ रामचरित मानस को अपनी आस्था के आसन से नीचे उतारकर उसे ख़ारिज करेंगी? नारी-विमर्श के पैरोकारों से इस प्रश्नों का भी उत्तर माँगना चाहिए।
अभी तक की चर्चा में आपने देखा कि किस प्रकार से आर्ष समाज से लेकर अर्वाचीन समाज तक स्त्रियों की छवि को एक विशेष खाँचे में फिट किया गया। मातृ-सत्तात्मक समाज रहा हो या पितृ-सत्तात्मक स्त्री को देह की भाषा में ही व्यक्त करने और होने का खेल चलता रहा। इस खेल में स्त्री भी बराबर की हिस्सेदार रही। उसने इस आरोपण को सच की तरह अंगीकृत कर लिया कि वह एक देह है और इस देह की एक मात्र आवश्यकता है यौन-तृप्ति। यह मानते हुए भी कि यौन-सम्बन्ध द्विपक्षीय अवधारणा है जिसके प्रति पुरुष भी उतना ही लालायित रहता है। विकास के किसी भी मोड़ पर पुरुषों की काम-प्रवृत्ति का उस तरह से मनोविश्लेषण नहीं किया गया जैसा कि स्त्रियों का। इसका परिणाम यह हुआ कि सारी वर्जनाएँ स्त्रियों पर ही थोप दी गईं और पुरुषों को स्वच्छंद छोड़ दिया गया और वे स्त्रियों के साथ निर्द्वन्द्व होकर मनमानी करते रहे। स्त्रियाँ भोग्या बनने और वर्जनाओं के उल्लंघन के नाम पर लांछित होने को अभिशप्त होती रहीं। यही उनकी नियति बन गयी और उन्हीं के मुँह से इसे स्वीकार भी कराया गया। यह पुरुष-सत्तात्मक समाज के नीति-नियामकों की जीत और स्त्रियों की सबसे बड़ी हार थी, जिस पर ईश्वर की सहमति का ठप्पा भी लगवा लिया गया।

- मूलचन्द सोनकर

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हमारे शास्त्र कन्या-संभोग और बलात्कार के लिये भी प्रेरित करते हैं। मनुस्मृति के अध्याय ९ के श्लोक ९४ में आठ वर्ष की कन्या के साथ चौबीस वर्ष के पुरुष के विवाह का प्रावधान है। ‘भारतीय विवाह का इतिहास'(वि.का. राजवाडे) के पृष्ठ ९१ पर उद्धृत वाक्य ‘‘चौबीस वर्ष का पुरुष, आठ वर्ष की लड़की से विवाह करे, इस अर्थ में स्मृति प्रसिद्ध है। विवाह की रात्रिा में समागम किया जाय, इस प्रकार के भी स्मृति वचन हैं। अतः आठ वर्ष की लड़कियाँ समागमेय हैं, यह मानने की रूढ़ि इस देश में थी, इसमें शक नहीं।'' इसी पुस्तक के पृष्ठ ८६-८७ तथा ९० के नीचे से चार पंक्तियों को पढ़ा जाय तो ज्ञात होता है कि कन्या के जन्म से लेकर छः वर्ष तक दो-दो वर्ष की अवधि के लिये उस पर किसी न किसी देवता का अधिकार होता था। अतः उसके विवाह की आयु का निर्धारण आठ वर्ष किया गया। क्या इससे यह संदेश नहीं जाता कि कन्या जन्म से ही समागमेय समझी जाती थी क्योंकि छः वर्ष बाद उस पर से देवताओं का अधिकार समाप्त हो जाता था। यम संहिता और पराशर स्मृति दोनों ही रजस्वला होने से पूर्व कन्या के विवाह की आज्ञा देते हैं (खट्टर काका पृष्ठ १०१) निम्न श्लोक देखें-प्राप्ते तु द्वादशे वर्षे यः कन्यां न प्रयच्छति/मासि मासि रजस्तयाः पिब्रन्ति पितरोऽनिशम्‌। (यम संहिता)
यदि कन्या का विवाह नहीं होता और यह बारह वर्ष की होकर रजस्वला हो जाती है तो उसके पितरों को हर माह रज पीना पड़ेगा-रोमकाले तु संप्राप्ते सोमो सुंजीथ कन्यकाम/रजः काले तुः गंधर्वो वद्दिस्तु कुचदर्शने।
रोम देखकर सोम देवता, पुष्प देखकर गंधर्व देवता और कुच देखकर अग्नि देवता कन्या का भोग लगाने पहुँच जायेंगे।
जिस धर्म के देवता इतने बलात्कारी, उस धर्म के अनुयायी तो उनका अनुसरण करेंगे ही। कुंती के साथ सूर्य के समागम का विवरण राजवाडे के शब्दों में इस प्रकार है,-’वनपर्व' के ३०७वें अध्याय में सूर्य कहता है- ‘‘हे कुंती, कन्या शब्द की उत्पत्ति, कम्‌ धातु से हुई और इसका अर्थ है- चाहे जिस पुरुष की इच्छा कर सकने वाली। कन्या स्वतंत्र है, स्त्रियों और पुरुषों में किसी प्रकार का परदा या मर्यादा न होना- यही लोगों की स्वाभाविक स्थिति है, विवाहादि संस्कार सब कृत्रिम हैं, अतः तुम मेरे साथ समागम करो, समागम करने के बाद तुम पुनरपि कुमारी ही, अर्थात्‌ अक्षत योनि ही रहोगी।'' (वही, पृष्ठ ८९-९०) और देवराज इन्द्र द्वार बलात्कार के किस्से तो थोक के भाव मौजूद है।
यह रहा, तथाकथित पूज्य वेदों, पुराणों, महाभारत इत्यादि का स्त्रियों के प्रति रवैये की छोटी-सी बानगी। संस्कृत वाङ्मय के ग्रन्थ अथवा साहित्यिक रचनायें अथवा उनसे प्रेरित श्रृंगारिक कवियों की श्रृंगारिक भाषायी रचनाओं से लेकर आधुनिकता का लिबास ओढ़े चोली के पीछे क्या है.... ‘अथवा' मैं चीज बड़ी हूँ मस्त-मस्त..... तक के उद्घोष में स्त्री-पुरुष बराबर के साझीदार हैं। इन कृतियों में से होकर एक भी रास्ता ऐसा नहीं जाता जिस पर चलकर स्त्री सकुशल निकल जाये, फिर भी वह इनके प्रति सशंकित नहीं है तो इस पर गहन, गम्भीर विमर्श होना चाहिये। सबसे बड़ी विडम्बना तो स्त्रियों का कृष्ण के प्रति अनुराग है जबकि स्त्रियों के साथ कृष्ण-लीला इनके चरित्र का सबसे कमजोर पहलू है। ब्रह्म वैवर्त में कृष्ण का राधा या अन्य गोपियों के साथ संभोग का जैसा वर्णन है, उसको पढ़कर उनके आचरण को अध्यात्म की भट्ठी में चाहे जितना तपाया जाये, उसे नैतिकता के मापदण्ड पर खरा नहीं ठहराया जा सकता।
मनु स्मृति संभवतः ऐसा अकेला ग्रन्थ है जिनसे भारतीय मेधा को न केवल सबसे अधिक आकर्षित किया अपितु व्यवहार-जगत्‌ में उसकी मानसिकता को ठोस एवं स्थूल स्वरूप भी प्रदान किया। भारतीय मेधा अर्थात्‌ भारतीय राज्य-सत्ता और उसके द्वारा पोषित सामंती प्रवृत्तियों का गंठजोड़, जिसके हाथ में मनु ने मनुस्मृति के रूप में, ‘करणीय और अकरणीय' का औचित्य-विहीन संहिताकरण करके एक क्रूर और अमानवीय हथियार पकड़ा दिया और उसे धर्म-सम्मत मनमानी करने का निर्णायक अवसर प्रदान कर दिया। सामाजिक परिप्रेक्ष्य में मनुस्मृति का सबसे घातक दुष्परिणाम यह हुआ कि इसने पहले से ही क्षीण होती जा रही संतुलन-शक्तियों का समूल विनाश कर दिया। शूद्र (वर्तमान दलित) और स्त्री के लिये दंड-विधान के रूप में ऐसे-ऐसे प्रावधान किये गये कि इनका जीवन नारकीय हो गया।
विषय-वस्तु के बेहतर प्रतिपादन के लिये थोड़ा विषयान्तर समीचीन दिखता है। मनु-स्मृति में हमें तीन बातें स्पष्ट दिखाई देती हैं। पहला, वर्ण-व्यवस्था का पूर्ण विकसित और अपरिवर्तनीय स्वरूप (मनु १०.४) दूसरा, राक्षस या असुर जाति का विलोपीकरण और तीसरा देवताओं के अनैतिक आचरण को विस्थापित करके उनकी कल्याणकारी इतर शक्तियों के रूप में स्थापना। वर्ण-व्यवस्था का सिद्धान्त आर्यों की देन है जो ऋग्वेद के पुरुष सूक्त से प्रारम्भ होता है और सभी अनुवर्ती ग्रन्थों में जगह पाता है। स्त्रियों की भाँति राक्षसों की भी उत्पत्ति वर्ण-व्यवस्था से नहीं होती। सुर और असुर के मध्य लड़े गये तमाम युद्धों का वर्णन वैदिक साहित्य में भरे पड़े हैं। रामायण काल तक राक्षस मिलते हैं, महाभारत काल में विलुप्त हो जाते हैं। महाभारत काल में कृष्ण के रूप में ईश्वर अवतार लेते हैं। गीता में अपने अवतार का कारण अधर्म का नाश करके धर्म की स्थापना करना बताते हैं। प्रत्यक्ष विनाश वे अपने मामा कंस का करते है। महाभारत युद्ध की विनाश-लीला के नायक होते हुए भी इस युद्ध में उनकी भूमिका राम की तरह नहीं है। कृष्ण का मामा होने के कारण कंस को राक्षस कहा जाय तो सबसे बड़ी अड़चन यह आयेगी कि कृष्ण को भी राक्षस कहना पड़ेगा लेकिन थोड़ा-सा ध्यान दें तो इस गुत्थी को सुलझाना बहुत आसान है। राम और रावण के बीच लड़ा गया युद्ध निश्चित रूप से आर्यों के बीच लड़ा गया अन्तिम महायुद्ध था जिसमें आर्यों की सबसे बड़ी कूटनीतिक विजय यह थी कि आर्य राम की सेना अनार्य योद्धाओं की थी और रावण की पारिवारिक कलह चरम पर थी। इसका प्रत्यक्ष लाभ राम को यह मिला कि उन्हें घर का भेदी ही मिल गया और लंका ढह गयी। आर्य संस्कृति की विजय हुई लेकिन वर्चस्व स्थापित नहीं हो सका होगा। क्योंकि विभीषण चाहे जितना बड़ा राम भक्त राह हो, तो अनार्य ही न और फिर रावण की पटरानी मंदोदरी ही उसकी पटरानी बनी। क्या विभीषण कभी उससे आँख मिला पाया होगा? क्या कभी मंदोदरी यह भुला सकी होगी कि वह जिस कायर की पत्नी है उसी के विश्वासघात ने उसके प्रतापी पति की हत्या करवाई थी।
इस कड़ी को कृष्ण द्वारा कंस के संहार से जोड़कर देखें तो स्थिति यह बनती है कि अनार्यों की बची-खुची शक्ति के सम्पूर्ण विनाश के लिये इस बार घर से ही नायक को उठाया गया। यह इस बात से सिद्ध है कि कृष्ण के नायकत्व या संयोजकत्व में जितने भी युद्ध लड़े गये सभी पारिवारिक थे। अतः यह कहा जा सकता है कि अनार्य आपस में लड़कर विनाश को प्राप्त हुए और वर्ण से बाहर की दलित जातियाँ उन्हीं की ध्वंसावशेष हैं। इस सम्पूर्ण विजय के बाद आचरण हीन देवता स्वयं को कल्याणकारी इतर शक्ति के रूप में स्थापित कराने में सफल हो गये तो क्या आश्चर्य।
मनु स्मृति शांति काल की रचना प्रतीत होती है जिसमें शासन-व्यवस्था के संचालन और समाज को नियंत्रित करने का प्रावधान है। स्पष्ट है कि इसका डंडा वर्णेतर जातियों पर पड़ना था और पड़ा भी। दलित और स्त्री उन सभी सुविधाओं और अवसरों से वंचित कर दिये गये जो उनके बौद्धिक-क्षमता के विकास में सहायक थे। इस प्रकार मनु स्मृति से भी यह सिद्ध होता है कि दलित और स्त्री वर्ण-व्यवस्था के बाहर का समुदाय है।
- मूलचन्द सोनकर
स्त्री और पुरुष के बीच सम्बन्ध का यही कटु यथार्थ है कि स्त्री पुरुष को उत्पन्न करती है परन्तु पुरुष उसका अमर्यादित शोषण करता है और ऐसा करने के लिये वह सामाजिक, नैतिक और धार्मिक रूप से अधिकृत है। इतना ही नहीं, पुरुष द्वारा स्त्री को भोग्य के रूप में मान्यता ‘उत्पादन द्वारा उत्पादक' के भक्षण का एक मात्र उदाहरण है। स्त्री के प्रति पुरुष की इस मानसिकता का विकास संभवतः सृष्टि-रचना के आदि सिद्धान्त में निहित है जहाँ सृष्टिकर्ता स्त्री नहीं पुरुष है। हिन्दू माइथालोजी में पशु-पक्षी इत्यादि के स्रोत का तो पता नहीं, मनुष्य की उत्पत्ति भी योनि से न होकर ब्रह्मा के शरीर के विभिन्न हिस्से से हुई और वह भी मनुष्य के रूप में नहीं बल्कि वर्ण के रूप में। ऋग्‌वेद के पुरुष सूक्त से लेकर सभी अनुवर्ती गन्थों में उत्पत्ति का यही वर्ण-व्यवस्थायीय प्रावधान मिलता है और इसके लिये रचित मंत्र और श्लोकों का जो टोन है उनसे यही ध्वनित होता है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के रूप में केवल पुरुषों की ही उत्पत्ति हुई स्त्रियों की नहीं और अब, जबकि यह सिद्ध हो चुका है कि दलित शूद्र के अंग नहीं है क्योंकि शूद्र अस्पृश्य नहीं थे, तो इसमें कोई विवाद नहीं होना चाहिये कि स्त्री की भाँति दलित भी वर्ण-व्यवस्थायीय उत्पत्ति नहीं हैं। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि भारतीय समाज-व्यवस्था में स्त्री और दलित दोनों ही बाहरी व अपरिचित तत्त्व हैं। इसलिये भारतीय समाज का रवैया यदि इनके प्रति शत्रुवत्‌ है तो आश्चर्य नहीं करना चाहिये।
उपरोक्त कथन के विरोध में यह तर्क दिया जा सकता है कि समय के साथ न जाने कितने विरोधाभाषों का समरस विलीनीकरण अथवा सहमतिपूर्ण सामंजस्य हो जाता है और मनुष्य अपनी विकास-यात्रा के जिस पड़ाव पर पहुँच चुका है। उस परिप्रेक्ष्य में यह एक मूर्खतापूर्ण सोच है। यह तर्क दिखने में चाहे जितना दमदार हो लेकिन वास्तव में इसमें कोई दम नहीं है क्योंकि धार्मिक मान्यताओं के प्रति भारतीय समाज ही नहीं समग्र मानव समाज इतना जड़ है कि वह आदि युगीन मानव की भाँति ही सोचता है और उसी समय में जीता है। उसके लिये आज भी ईश्वरीय सत्ता ही वास्तविक सत्ता है और बिना उसकी मर्जी के कुछ भी घटित होना संभव नहीं है। उसकी दिनचर्या का निर्धारण और नियंत्राण हजारों हजार मील दूर स्थित कोई ग्रह करता है; यह बात अलग है कि वह ग्रह स्वयं अपनी गोद में किसी जीव का पालन करने में समर्थ नहीं है। स्त्री-पुरुष के सहज संयोग को सन्तानोत्पत्ति का कारण न मानकर इसे ईश्वर की देन कहने वालों की आज भी कोई कमी नहीं है और इसमें प्रजनन करवाने वाली डॉक्टर भी शामिल है जो इसकी वैज्ञानिक वास्तविकताओं से पूरी तरह भिज्ञ होती है किन्तु यही लोग बिना वैवाहिक सम्बन्ध के उत्पन्न सन्तान को ईश्वर की देन मानने से न केवल इनकार करते हैं अपितु माँ को कुलटा भी घोषित कर देते हैं। चन्द्र एवं सूर्यग्रहण आज भी इनके लिये कोई वैज्ञानिक परिघटना न होकर राहु और केतु कारस्तानी है। ऐसा नहीं है कि हिन्दू धर्म के अनुयायी ही ऐसा करते हैं। किसी भी धर्म के अनुयायिओं के आचरण के बारे में इस प्रकार के दृष्टान्त उद्धृत किये जा सकते हैं। चूँकि धर्म एवं वर्ण-व्यवस्था की मानसिक ग्रन्थि से भारतीय समाज आज भी निकलना नहीं चाहता। अतः दलितों और स्त्रियों के प्रति उसके व्यवहार के बारे में मेरे कथन के विरोध में व्यक्त तर्क स्वतः ही दम तोड़ देता है। इस लेख का विषय स्त्री-विमर्श से सम्बन्धित होने के कारण इसी परिप्रेक्ष्य में इस चर्चा को आगे विस्तार दिया जा रहा है।
अध्यात्म के स्तर पर धर्म का चाहे जो तात्पर्य हो लेकिन व्यवहार के स्तर पर उसका वही आशय है जो कानून का है। दोनों का उद्देश्य समाज को नियंत्रित करना है। इसके लिए ‘क्या करना चाहिये' और ‘क्या नहीं करना चाहिये' का संहिताकरण और उल्लंघन करने पर दंडित करने का प्रावधान दोनों जगह किया गया है लेकिन दोनों में एक अन्तर है। कानून लोकतांत्रिक व्यवस्था की देन है और सबको समान दृष्टि से देखने की वकालत करता है और धर्म राजतंत्र द्वारा पोषित ब्राह्मणवादी व्यवस्था है जो वर्ग-हित की वकालत करता है। इसमें मनुष्य के साथ समानता के आधार पर नहीं बल्कि उसके वर्णगत्‌ हैसियत के आधार पर व्यवहार करने का प्रावधान है, जिसे ईश्वर अथवा मनुष्येतर शक्तियों द्वारा अनुमोदित घोषित करवाकर इसे अनुल्लंघनीय बना दिया गया । इस उपाय के द्वारा राजा के हाथों से नियंत्रण की शक्ति स्वतः छिन गयी और वह ईश्वर के नाम पर दंड देने के बहाने एक से एक अनैतिक काम करने लगा। इन अनैतिक कार्र्यों के पाप-बोध से मुक्ति दिलाने के उद्देश्य से राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि और ब्राह्मण को उसकी इच्छाओं का व्याख्याकार उद्घोषित किया गया। अब राजा बनने की एक मात्र योग्यता पूर्ववर्ती राजा का ज्येष्ठ पुत्र रह गयी और राजा बनने का एकमात्र कार्य ब्राह्मणों की आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए उनकी अनुगामिता और इसी विषाक्त मानसिकता की भूमि पर धर्म का बीजारोपण होता है जो बात तो करता है मानव के समग्र कल्याण की, आत्मिक चेतना के विकास की और प्रावधान ऐसा करता है कि अधिसंख्य मानव-समुदाय न केवल हाशिये पर पहुँच गया बल्कि दलित और स्त्री तो मनुष्य होने से वंचित हो गये।
समाज को व्यवस्थित नियंत्रित और अनुशासित करने के लिये करणीय और अकरणीय का प्रावधान, जो वास्तविक व्यवहार में कानून ही था, धार्मिक घाल-मेल के रूप में अवतरित हो गया और भारतीय समाज इसी परिवेश में पलने लगा। धार्मिक व्यवस्था के नाम पर इसमें दलितों और स्त्रियों के लिये ऐसे-ऐसे घृणित प्रावधान किये गये कि किसी भी सभ्य समाज का सिर शर्म से झुक जाये मगर धर्म की मानसिक ग्रन्थि ने समाज को मानवीय संवेदना और समानता के स्तर पर कभी भी सभ्य नहीं होने दिया क्योंकि इसने वर्ण-व्यवस्था को शाश्वत और अक्षुण्ण बनाये रखने के लक्ष्य का कभी परित्याग ही नहीं किया। लोकतंत्रीय व्यवस्था ने यद्यपि समानता, बन्धुता और स्वतंत्रता के नैसर्गिक सिद्धान्त को अपनाकर सबको आगे बढ़ने का तो अवसर प्रदान किया लेकिन साधन-संसाधन पर व्यक्तिगत्‌ नियंत्रण से कोई छेड़-छाड़ नहीं की और न सरकार ने कभी विपन्न समुदाय के लिए इतनी व्यवस्था की वे साधन-हीन होते हुए भी अपनी क्षमता का पूर्ण विकास कर सकें। तथाकथित आरक्षण व्यवस्था जो मात्र सरकारी क्षेत्र तक ही सीमित रही और सदा से इन सशक्त सामंती प्रवृत्ति के लोगों की आँखों की किरकिरी बनी हुई है, आज तक अपना लक्ष्य नहीं प्राप्त कर सकी है और अब इसे अपनी मौत करने के लिये छोड़ दिया गया है। इसके बल पर जो थोड़े से लोग किसी प्रकार आगे बढ़ गये हैं उन्हीं को देखकर यह धारणा बन गई है कि इनका वांछित विकास हो चुका है। अब जो कुछ करना हो अपने बलबूते पर ही करें। यहाँ पर यह कहना असंगत न होगा कि अभी तक कोई ऐसा सर्वेक्षण नहीं किया गया कि आरक्षित समुदाय को जो कुछ भी प्राप्त हुआ वह किसके हिस्से का था? मुझे लगता है कि आजादी मिलने के साथ पढ़े-लिखे मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान चला गया। आजाद भारत का मुसलमान शैक्षिक रूप से पिछड़ जाने के कारण अपने पूर्ववर्तियों द्वारा रिक्त स्थान तक नहीं पहुँच सका। फलतः वे आरक्षित समुदाय के हिस्से में आ गया। सवर्णों को मिलने वाले हलवा-पूड़ी में कोई कटौती हुई कि नहीं, इस पर चर्चा करने की बजाय आरक्षण के विरोध में उनके सुर से सुर मिलाने वाले लोग समाज के प्रति नैतिक निष्ठा और उत्तरदायित्व का निर्वहन नहीं कर रहे हैं। लेकिन इस मुद्दे पर सबसे गम्भीर चिन्तन मुसलमान बुद्धिजीवियों को ही करना है जिनका जन-सामान्य फतवाओं की राजनीति में ही उलझा रहता है। इस विश्लेषण से हम पाते है कि मुसलमान भी उसी पायदान पर खड़े हैं जिस पर दलित और स्त्री हैं। अन्य अल्पसंख्यकों के परिप्रेक्ष्य में इस विचार को विस्तारित करने का पूरा स्कोप है।
अभी तक के विश्लेषण से दो तथ्य स्पष्ट रूप से प्रतिपादित होते हैं। पहला, जो समुदाय वर्ण-व्यवस्था की उत्पत्ति नहीं हैं उनके प्रति हिन्दू धर्म की अवधारणायें, मान्यतायें तथा प्रावधान अत्यन्त कठोर, अश्लील और घृणास्पद हैं। आज इसे शायद ही कोई माने लेकिन यह स्वर्णों के अवचेतन में दबी हुई वह कुंठा है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थानान्तरित होते हुए दैनंदिक दिनचर्या का सहज स्वाभाविक अंग बनकर व्यवहार में झलकती तो रहती हैं मगर उन्हें दिखाई नहीं देतीं। दूसरा, आरक्षण के रूप में विशेष सुविधा देने के बावजूद राज्य द्वारा साधन-संसाधन की समुचित व्यवस्था न किये जाने के कारण विपन्न समुदाय का वांछित विकास संभव नहीं हो सका; परिणामस्वरूप आज भी सत्ता पर वहीं सामन्त-समूह या उनकी पालित संतानों ही ठसक के साथ काबिज हैं। ये धार्मिक पूर्वाग्रहों से इस बुरी तरह से ग्रस्त हैं कि जो जहाँ है वहीं लोकतांत्रिक कानूनों की धज्जियाँ उड़ाकर दलित और स्त्री का अपमान करने की सुखानुभूति कर रहा है।
अरविन्द जैन ने अपने लेख ‘यौन हिंसा और न्याय की भाषा' (अतीत होती सदी और स्त्री का भविष्यः खंड-१, ‘हंस' जनवरी-फरवरी २०००) में उच्चतम न्यायालय सहित विभिन्न न्यायालयों द्वारा यौन हिंसा और बलात्कार के निर्णीत मामलों का जो लोमहर्षक लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है उसे पढ़ने के बाद शायद ही कोई ऐसा होगा जो मेरे प्रतिपादित कथन से सहमत न हो। अपर्णा भट्ट द्वारा सम्पादित पुस्तक court on rape trials की भूमिका में चार वर्ष की बच्ची के साथ घटित बलात्कार के मामले में सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की जो टिप्पणी उद्धृत की गई हैं, वह यह है, ‘If a 25 year old man lay on top of a four year old girl, the girl would get crushed and die. कहने की आवश्यकता नहीं है कि अपील जिसे लेखिका ने स्वयं दायर किया था, ख़ारिज कर दी गयी। जन-मानस में स्त्रियों की छवि ‘जवान हो या नन्हीं-सी गुड़िया, कुछ भी हो औरत जहर की है पुड़िया' अथवा ‘तिरिया चरित न जाने कोय खसम मार के सत्ती होय' की बनी है तो इसमें स्त्रियों के प्रति दबी हुई स्वाभाविक घृणा के अतिरिक्त और क्या है? इसी प्रकार अपनी पुस्तक dalits and law में लेखक द्वय गिरीश अग्रवाल और कालिन गॉन साल्वेस द्वारा इस तथ्य की विस्तृत पड़ताल की गई है कि किस प्रकार दलितों की सुरक्षा के लिये बनाये गये कानूनों की हर स्तर पर धज्जियाँ उड़ाकर उनका प्रायोजिक उत्पीड़न किया जाता है। राजस्थान उच्च न्यायालय के प्रांगण में मनु की काल्पनिक मूर्ति स्थापित करने का यदि यह संदेश जाये कि उच्च जाति का पुरुष नीच जाति की स्त्री से संभोग नहीं कर सकता तो क्या आश्चर्य (भंवरी बाई बलात्कार कांड)। कल्याण सिंह ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में अयोध्या में मनु की मूर्ति स्थापित करवाने का प्रस्ताव किया था। (राष्ट्रीय सहारा, लखनऊ २८.३.९९) इस प्रस्ताव का क्या हुआ, यह जानने से ज्यादा इस निहितार्थ को जानना महत्त्वपूर्ण है कि यह एक शूद्र मुख्यमंत्री का मनु-प्रेम है जो वर्णीय-भ्रातृत्व-प्रेम का आदर्श उदारहण है। आज जिस तेजी और सहजता से शूद्रों की अन्तर्वर्णीय ग्राह्यता बढ़ी है लेकिन दलित और स्त्री इसी प्रकार से हेय व उपेक्षित हैं, उससे वर्ण-व्यवस्था से बाह्यीकरण के सिद्धान्त की संदेह-रहित पुष्टि होती है।
स्त्री-विमर्श का सबसे अहम्‌ मद्दा देह का है। स्त्री लेखन से प्रायः यही संदेश मिलता है कि अपनी देह की स्वतंत्रता और उस पर स्वयं का अधिकार ही इसका एक मात्रध्येय और लक्ष्य है, लेकिन अपने अध्ययन और चिन्तन के द्वारा मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि स्त्री मात्र’योनि' है जिसकी काम-पिपासा शाश्वत्‌ अतृप्त रहती है और जो सदैव ‘लिंग-भक्षण' के लिये लालायित रहती है। इसी आधार पर ‘स्त्री-योनि' को नरक-द्वार और ‘नरक-कुंड' तक कहा गया है। इसकी यह छवि सोद्देश्य बनाई गयी है अथवा यह उसके स्वभाव की वास्तविकता है, स्त्री-विमर्श के क्षेत्र में या तो छूटा हुआ है या समुचित स्पेस नहीं पा सका हैः यद्यपि इसके लिये भरपूर स्कोप है। लेकिन इससे भी ज्यादा आश्चर्यजनक यह है कि जिन ग्रन्थों, दृष्टान्तों और आख्यानों ने उनकी देह को योनि में संकुचित कर दिया उन्हीं के प्रति वे पूज्य भाव
बनाये रखती है। इससे यही लगता है कि इस स्थिति से वे सहमत भी हैं। यहाँ कुछ ऐसे दृष्टांत उद्धृत किये जा रहे हैं जो यह दर्शाते हैं कि स्त्रियाँ स्वयं यह घोषणा करती हैं कि वे मात्र योनि हैं और काम-पिपासा को तृप्त करना उनका एकमात्र लक्ष्य है।
सुधीर पचौरी ने अपने लेख ‘स्त्रीत्ववाद में मर्दों की जगह' (‘हंस', स्त्री विशेषांक, जनवरी-फरवरी २०००) की शुरुआत निम्न संवाद को संदर्भित करते हुए किया है-
फ्रायड ने पूछा है कि औरत चाहती क्या है?...
बौदलेयर ने जवाब दिया है कि वह फ़क होना चाहती है...
इस संवाद को पढ़कर फ़क होने वाली कोई बात नहीं है। पचौरी ने पता नहीं क्यों फ्रायड..... को उद्धृत किया। ऐसे आख्यानात्मक दृष्टांत तो यहाँ भरे हैं। विश्वनाथ काशीनाथ राजवाडे की पुस्तक ‘भारतीय विवाह संस्था का इतिहास' के पृष्ठ १२८ पर उद्धृत यह वाक्य ‘मैं तुम्हारे पास गर्भधारणार्थ आयी हूँ, तुम भी मेरे पास बीज डालने के लिये आओ...। स्त्रियों को लिंग जान से भी प्यारा होता है। क्योंकि वह योनि को कुचलता है...।' उक्त संवाद से कहीं अधिक स्पष्ट और अर्थपूर्ण है। यह स्पष्ट संकेत करता है कि स्त्री का पूरा अस्तित्व ही योनि में सिमट गया है। यह मात्रएक उदाहरण है। इस पुस्तक में स्वच्छन्द यौन-संसर्ग के अनेक दृष्टांत दिये गये है। जो उक्त कथन की पुष्टि करते हैं: साथ ही आर्ष ग्रन्थों के प्रति प्रचलित पूज्य भावना को पुनर्रेखांकित करने की भी मांग करते हैं।
वेद, पुराण, स्मृति, महाभारत आदि ग्रन्थ हमारी सभ्यता और संस्कृति की धरोहर हैं और इनका इसी दृष्टिकोण से अध्ययन किया जाय तो हमारे इतिहास की न जाने कितनी विश्रृंखलित कड़ियों को जोड़ने में मदद मिल सकती है लेकिन विडम्बना यह है कि इनको धर्म-ग्रन्थ मानकर पूज्य घोषित कर दिया गया है जबकि स्त्री-विमर्श के दृष्टिकोण से तो इनके विशेष अध्ययन की आवश्यकता है क्योंकि इन्हीं के अन्दर उस रहस्य की चाभी छुपी है जो यह बताती है कि किस प्रकार मातृ-सत्तात्मक युग की शक्तिशाली स्त्रियों को पहले देह में और फिर योनि में संकुचित करके उसे औपनिवेशक सम्पत्ति घोषित कर दिया गया। यदि प्रथम लिखित शब्द से ही सभ्यता की शुरुआत मानें तो कह सकते हैं कि यही स्त्री के स्त्रीतत्व का बलिदान दिवस था जिसे लगातार सुनियोजित षड़यंत्र करके न केवल पुख्+ता किया गया बल्कि इसके लिये उनका मानसिक अनुकूलन भी किया गया जो आज भी जारी है। यही कारण है कि नारी-विमर्श और नारी-सशक्तिकरण का चाहे जितना डंका पीटा जाये, सिवाय चन्द नारी-वादिनियों के यह किसी को सुनाई नहीं देता। इस भाग में वेद, पुराण और महाभारत से उदाहरण देकर यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया है कि आज के परिप्रेक्ष्य में किस प्रकार इन ग्रन्थों में स्त्रियों की अस्मिता के साथ खिलवाड़ किया गया है। वेदों में वर्णित कुछ कामुक दृष्टांत हरिमोहन झा की पुस्तक ‘खट्टर काका' से साभार लेकर यहाँ पर उद्धृत किए जा रहे हैं - मर्य इव युवतिभिः समर्षति सोमः/कलशे शतयाम्ना पथा (ऋ. ९/८६/१६)
कलश में अनेक धारों से रस का फुहारा छूट रहा है। जैसे, युवतियों में... (पृष्ठ १९४)
को वा शयुत्र विधवेव देवरं मर्यं न योषा वृणुते (ऋ. ७/४०/२)
‘‘जैसे विधवा स्त्री शयनकाल में अपने देवर को बुला लेती है, उसी प्रकार मैं भी यज्ञ में आपको सादर बुला रही हूँ। (पृष्ठ १९५)
यत्र द्वाविव जघनाधिषवरण्या/उलूखल सुतानामवेद्विन्दुजल्गुलः (ऋ. १/२८/२)
‘‘जैसे कोई विवृत-जघना युवती अपनी दोनों जंघाओं को फैलाये हुई हो और उसमें..(पृष्ठ १९३)
अभित्वा योषणो दश, जारं न कन्यानूषत/मृज्यसे सोम सातये (ऋ. ९/५६/३)
‘‘कामातुरा कन्या अपने जार (यार ) को बुलाने के लिये इसी प्रकार अंगुलियों से इशारा करती हैं। (पृष्ठ १९३ )
वृषभो न तिग्मश्रृंगोऽन्तर्यूथेषु रोरुवत्‌! (ऋ. १०/८६/१५)
अर्थात्‌ ‘जिस प्रकार टेढ़ी सींग वाला साँड़ मस्त होकर डकरता हुआ रमण करता है, उसी प्रकार तुम भी मुझसे करो। (पृष्ठ १९६)
डॉ. तुलसीराम ने अपने लेख ‘बौद्ध धर्म तथा वर्ण व्यवस्था' (‘हंस', अगस्त २००४) में ऋग्वेद के प्रथम मंडल के छठवें मंत्र का अनुवाद इस तरह किया है, ‘‘यह संभोग्य युवती (यानी जिसके गुप्तांग पर बाल उग आए हों) अच्छी तरह आलिंगन (बद्ध) होकर सूतवत्सा नकुली (यानी एक रथ हाँकने वाले की बेटी, जिसका नाम नकुली था) की तरह लम्बे समय तक रमण करती है। वह बहु-वीर्य सम्पन्न युवती मुझे अनेक बार भोग प्रदान करती हैं।'' इसी लेख में यह भी कहा गया है कि ऋग्वेद के अंग्रेजी अनुवाद राल्फ टी ग्रीफिथ को दसवें मंडल के ८६ वें सूक्त के मंत्र १६ और १७ इतने वीभत्स लगे कि उन्होंने इनका अनुवाद ही नहीं किया।
ऋग्वेद के दसवें मंडल के दसवें सूक्त में सहोदर भाई-बहन यम और यमी का संवाद है जिसमें यमी यम से संभोग याचना करती है। इसी मंडल के ६१ वें सूक्त के पाँचवें-सातवें तथा अथर्ववेद (९/१०/१२) में प्रजापति का अपनी पुत्री के साथ संभोग वर्णन है। यम और यमी के प्रकरण का विवरण अथर्ववेद के अठारहवें कांड में भी मिलता है। (भारतीय विवाह संस्था का इतिहास - वि.का. राजवाडे, पृष्ठ ९७) इसी पुस्तक के पृष्ठ ७८-७९ पर पिता-पुत्री के सम्बन्धों पर चर्चा करते हुए वशिष्ठ प्रजापति की कन्या शतरूपा, मनु की कन्या इला, जन्हू की कन्या जान्हवी (गंगा) सूर्य की पुत्राी उषा अथवा सरण्यू का अपने-अपने पिता के साथ पत्नी भाव से समागन होना बताया गया है। ‘स्त्री-पुरुष समागम सम्बन्धी कई अति प्राचीन आर्ष प्रथाएँ नामक यह अध्याय सगे-सम्बन्धियों के मध्य संभोग-चर्चा पर आधारित है। इस प्रकार के सम्बन्धों की चर्चा महाभारत के ‘शांतिपूर्व' के २०७ वें अध्याय के श्लोक संख्या ३८ से ४८ तक में भीष्म द्वारा की गई है। राजवाडे ने अपनी उक्त संदर्भित पुस्तक के पृष्ठ ११५-११६ पर (श्लोक का क्रम ३७ से ३९ अंकित है।) इन श्लोकों का अर्थ निम्नवत्‌ किया है- कृतयुग (संभवतः सतयुग) में स्त्री-पुरुषों के बीच, जब मन हुआ तब, समागम हो जाता था। माँ, पिता, भाई, बहन का भेद नहीं था। वह यूथावस्था थी। (श्लोक सं. ३८) त्रेता युग में स्त्री-पुरुषों द्वारा एक-दूसरे को स्पर्श करने पर समाज उन्हें उस समय के लिए संभोग करने की अनुमति देता था। यह पसन्द-नापसन्द या प्रिय-अप्रिय का चुनाव करने की व्यवस्था थी। (श्लोक सं. ३९) द्वापर युग में मैथुन धर्म शुरू हुआ। इस पद्धति के अनुसार, स्त्री-पुरुष अपनी टोली में जोड़ियों में रहने लगे, किन्तु अभी भी इन जोड़ियों को स्थिर अवस्था प्राप्त नहीं हुई थी और कलियुग में द्वंद्वावस्था की परिणति हुई, अर्थात्‌ जिसे हम विवाह संस्था कहते हैं उसका उदय हुआ। (श्लोक सं. ४०)
‘खट्टर काका' के पृष्ठ ६४ पर भविष्य पुराण के प्रतिसर्ग खंड के हवाले से उद्धृत निम्न श्लोक की मानें तो ईश्वरीय सत्ता के तीनों शीर्ष प्रतीक भी इस स्वच्छन्द सम्बन्ध से मुक्त नहीं हैं-स्वकीयां च सुतां ब्रह्मा विष्णुदेवः स्वमातरम्‌/भगनीं भगवान्‌ शंभुः गृहीत्वा श्रेष्ठतामगात्‌!
स्त्री के मुँह से ही स्त्रियों की बुराई सिद्ध करने के आख्यान मिलते हैं। स्त्रियों का यह चरित्र- चित्राण उनकी विश्व-विख्यात ईर्ष्या-भावना की छवि को उद्घाटित करता है। इस प्रकार का एक दृष्टांत महाभारत से यहाँ पर उद्धृत है। आगे, सम्बन्धित खंड में रामरचितमानस से भी ऐसा ही दृष्टांत उद्धृत किया गया है। महाभारत के अनुशासन पर्व के अन्तर्गत ‘दानधर्म' पर्व में पंचचूड़ा, अप्सरा और नारद के मध्य एक लम्बा संवाद है, जिसमें पंचचूड़ा स्त्रियों के दोष गिनती है। इसमें से कुछ श्लोकार्थ यहाँ दिये जा रहे हैं-नारद जी! कुलीन, रूपवती और सनाथ युवतियाँ भी मर्यादा के भीतर नहीं रहतीं। यह स्त्रियों का दोष है॥११॥ प्रभो! हम स्त्रियों में यह सबसे बड़ा पातक है कि हम पापी पुरुषों को भी लाज छोड़कर स्वीकार कर लेती हैं॥१४॥ इनके लिये कोई भी पुरुष ऐसा नहीं है, जो अगम्य हो। इनका किसी अवस्था-विशेष पर भी निश्चय नहीं रहता। कोई रूपवान हो या कुरूप; पुरुष है- इतना ही समझकर स्त्रियाँ उसका उपभोग करती हैं॥१७॥ जो बहुत सम्मानित और पति की प्यारी स्त्रियाँ हैं; जिनकी सदा अच्छी तरह रखवाली की जाती है, वे भी घर में आने-जाने वाले कुबड़ों, अन्धों, गूँगों और बौनों के साथ भी फँस जाती है॥२०॥ महामुनि देवर्षे! जो पंगु हैं अथवा जो अत्यन्त घृणित मनुष्य (पुरुष) हैं, उनमें भी स्त्रियों की आसक्ति हो जाती है। इस संसार में कोई भी पुरुष स्त्रियों के लिये अगम्य नहीं हैं॥२१॥ ब्रह्मन! यदि स्त्रियों को पुरुष की प्राप्ति किसी प्रकार भी सम्भव न हो और पति भी दूर गये हों तो वे आपस में ही कृत्रिम उपायों से ही मैथुन में प्रवृत्त हो जाती हैं॥२२॥ देवर्षे! सम्पूर्ण रमणियों के सम्बन्ध में दूसरी भी रहस्य की बात यह है कि मनोरम पुरुष को देखते ही स्त्री की योनि गीली हो जाती है॥२६॥ यमराज, वायु, मृत्यू, पाताल, बड़वानल, छुरे की धार, विष, सर्प और अग्नि - ये सब विनाश हेतु एक तरफ और स्त्रियाँ अकेली एक तरफ बराबर हैं॥२९॥ नारद! जहाँ से पाँचों महाभूत उत्पन्न हुए हैं, जहाँ से विधाता ने सम्पूर्ण लोकों की सृष्टि की है तथा जहाँ से पुरुषों और स्त्रियों का निर्माण हुआ है, वही से स्त्रियों में ये दोष भी रचे गये हैं (अर्थात्‌ ये स्त्रियों के स्वाभाविक दोष हैं।)॥३०॥
इस आख्यान से दो बातें स्पष्ट सिद्ध होती है। पहली एक ही स्रोत से रची गई चीजों में विधाता ने मात्र स्त्रियों के लिये ही दोषों की रचना करके पक्षपात किया और दूसरी यह कि स्वयं विधाता ही पुरुष-वर्चस्व का पोषक है। अब सवाल यह है कि ऐसे विधाता के विरुद्ध एक जुट होकर विद्रोह करने के लिये सामान्य स्त्रियों को प्रेरित करने के लिये नारीवादिनियों के पास कौन-सी योजना है?
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स्त्री मुक्ति का प्रश्न  

Posted by डा. फीरोज़ अहमद in

- कमल किशोर श्रमिक
नारी विमर्श पर कलम चलाने वाले हर पुरुष लेखक को पुरुष होने का एक जोखिम तो लेना ही होता है। उसे अन्तर्विरोधों के तहत प्रायः यह सुनना पड़ता है कि वह पुरुष होने के कारण नारी की परिस्थितियों एवं स्वभाव की जटिलताओं को नहीं समझ सकता। भले ही वह लेखक नारी विमर्श के मुद्दे पर मील का पत्थर प्रमाणित होने वाला इंग्लैण्ड का प्रसिद्ध नारीवादी लेखक जान स्टूअर्ट मिल ही क्यों न हो। मिल १८वीं शताब्दी के दौर में स्त्री पुरुष समानाधिकारों का पक्षधर था। वह इस अवधारणा से भी सहमत नहीं था कि प्रकृति की ओर से एक पुरुष स्त्री से अधिक शक्तिशाली या अधिक बुद्धिमान होता है। अपनी शिक्षिका से प्रभावित लेखक अपनी अवधारणाओं में कहीं भी पुरुष सोच का पक्षधर नहीं है। हाँ, वह समाज संचालन की दृष्टि से स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में फ़र्क करते हुए स्त्री पुरुष दोनों के लिए एक सीमा रेखा के नियंत्राण में रहने पर बल देता है। मगर प्रसिद्ध नारीवादी फ्रांसीसी लेखिका सीमोन द बोउआर ने मिल की पुरुष होने के कारण एवं अपनी यौनमुक्ति की सीमाहीन अवधारणा के कारण मिल को अपनी आलोचना का पात्र बनाया है। हाँ, सीमोन ने अपने दोस्त सात्रा की आलोचना नहीं की। क्योंकि दोनों ही विवाह संस्था के विरोधी एवं व्यक्तिगत्‌ स्तर पर यौन मुक्त जीवन जीने के पक्षधर थे। सात्रा और सीमोन ने विवाह नहीं किया और जीवन भर शारीरिक संबंध रखते हुए दोस्तों की भाँति रहते रहे। उनके बीच एक अलिखित समझौता था कि वे कभी एक दूसरे के अन्यों से यौनिक संबंधों के बारे में कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगे। उन्होंने इस समझौते का निर्वाह भी किया परन्तु व्यवहार में होता यह रहा कि सीमोन की महिला मित्रों के साथ जहाँ सात्रा अपने शारीरिक संबंध बना लेता था वहीं सात्रा के पुरुष मित्रों के साथ सीमोन अपने संबंध बना लेती थी। इस मुद्दे पर सीमोन की आत्मकथा में लिखा है कि इन संबंधों के कारण कभी-कभी वे भारी तनाव का अनुभव करते थे। अपनी व्यक्तिगत्‌ चेतना के कारण उन्होंने अंतिम समय तक अपने समझौते का निर्वाह तो किया, मगर नारी स्वतंत्रता के पूर्ण पक्षधर कार्लमार्क्स और जेनी मार्क्स की भाँति कभी स्वतंत्र, शांतिपूर्ण एवं स्नेहपूर्ण दाम्पत्य जीवन नहीं जी पाये। दो शब्दों में कहा जा सकता है कि शांतिपूर्ण समाज संचालन की दृष्टि से सात्रा और सीमोन के जीवन को आदर्श नहीं माना जा सकता। अमेरिका, यूरोप, फ्रांस एवं एशियाई देशों खासतौर से भारत के कुछ प्रतिशत लोगों का यौन मुक्त (फ्री सेक्स) जीवन का खोखलापन आज उजागर हो चुका है। पुरुषों की अपेक्षा ऐसा जीवन जीने वाली महिलायें ३७ प्रतिशत अभी भी बहुत कम हैं मगर जो भी है। वे परित्यक्ता जीवन जीती हुई यौनिक बीमारियों के कारण जहाँ डॉक्टरों के क्लीनिकों के चक्कर लगाती देखी जाती हैं और अपने अंदर एक खोखलापन महसूस करती हैं।
मानव सभ्यता के सांस्कृतिक इतिहास को देखने से पता चलता है कि आदिम कबीलाई युग तक मातृ प्रधान समाज रहा है। जहाँ एक स्त्री पुरुष की जननी होने के कारण कबीले की मुखिया होती थी। प्राकृतिक निर्भरता एवं सामाजिक विकास न होने के कारण उस समय सामाजिक सरोकारों का कोई विस्तार नहीं हुआ था और नहीं यौनिक संबंधों के बारे में किन्हीं विशेष विषयों का सूत्रापात हुआ था। यहाँ तक आपसी संबंधों में रिश्तों का निर्माण भी नहीं हुआ था, तथा नर और मादा के आधार पर आपस में यौनिक संबंध कायम थे। निस्संदेह आदिम समाज में आधुनिक समाज के वरअस्क जो विकास के नाम पर मनुष्यता द्रोही अपसंस्कृति निर्मित हो गई है। कुछ अच्छाइयाँ अवश्य थी, मगर हम आदिम सभ्यता की ओर पीछे नहीं लौट सकते। जान स्टूअर्ट मिल के अनुसार विकसित होते समाज के किसी कालखण्ड में स्त्री स्वयं पुरुष के प्यार में उसकी गुलाम बनती चली गई। किन्हीं विशेष परिस्थितियों में आंशिक रूप से यह बात भले सत्य हो गई हो, सामाजिक विकास के नियमों के आधार पर यह विश्लेषण सही नहीं है। क्योंकि प्रेम के द्वारा स्वीकार की गई दासता लम्बे समय तक नहीं चल सकती है। हाँ, कार्लमार्क्स की यह ऐतिहासिक अवधारणा कि व्यक्तिगत्‌ सम्पत्ति के चलन के कारण एक पुरुष वर्ग विशेष ने उत्पादन के साधनों पर कब्जा कर लिया होगा और वस्तुओं के बंटवारे में जानदार स्त्री को भी वस्तु के रूप में बदल दिया गया होगा। कामों का बंटवारा और स्त्री की प्रसव कालीन दुर्बलता भी इसका कारक बनी होगी। बहरहाल यह सब आसानी से घटित नहीं हुआ है। मानव सभ्यता को इस स्थिति में पहुँचने के लिए करोड़ों वर्षों का समय खर्च करना पड़ा है। चूँकि मानव सभ्यता का इतिहास वर्गों के संघर्ष का इतिहास रहा है, अतः इतिहास के किसी कालखण्ड में अगर स्त्रियों ने अपने संघर्ष के द्वारा कुछ सामाजिक अधिकार प्राप्त कर लिए हों तो हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए। यूँ भारतीय संस्कृति के इतिहास की गुफाओं में दाखिल होते समय हम धर्म को अनदेखा नहीं कर सकते और भारतीय धर्मों की नियमावली ने कभी भी स्त्रियों को पुरुषों के बराबर अधिकार प्रदान नहीं किये हैं।
वर्गों, धर्मों, वर्णों, जातियों, उपजातियों में बंटे भारतीय समाज में स्त्री जाति कभी देह(मादा), कभी वस्तु, कभी दासी के रूप में चिद्दित की गयी है। कौन वह जानता है कि वैदिक काल से लगा सामन्ती व्यवस्था तक दलितों और स्त्रियों को पठन-पाठन से लगाकर अनेकानेक सामाजिक अधिकारों से वंचित किया गया। पितृ प्रधान कन्यादान की भारतीय संस्कृति में वह पुरुष वर्ग की भोग्या बनी रही। उसकी मानसिक शारीरिक सभी क्षमताओं का पुरुष वर्ग द्वारा शोषण किया गया। यूँ अपोजिट सेक्स होने के यही कारण हैं कि उच्च वर्ग की रखैल स्त्री निम्न वर्ग के लोगों को अप्राप्य भी रही हैं और शायद यही कारण है कि पुरुष साहित्यकारों द्वारा लिखे साहित्य में भी स्त्री केन्द्रिय भूमिका का निर्वाह करती रही। मगर यहाँ भी उसकी तुलना कभी समंदर(पुरुष) में समाहित होती वहीं से कभी भौरों (पुरुषों) को रसप्लावित करती कली से, कभी वृक्ष (पुरुष) से लिपटी हुई लता से की गई है। संस्कृत साहित्य के महाकवि माघ और कालिदास से लगाकर हिन्दी के महाकवियों सूर, तुलसी, बिहारी आदि के काव्य में उक्त तथ्यों को आसानी से दृष्टिगत्‌ किया जा सकता है। भारतीय गणराज्यों की सामाजिक व्यवस्था में कला की अधिष्ठात्री(देवी) नर्तकी नगरवधू का वह सम्मान जिसकी पालकी में कंधा लगाने के लिए होड़ करते हुए सामन्त पुत्रों(राजकुमारों) की तलवारें टकराने के लिए म्यान से बाहर आ जाती थीं, कितना खोखला था। इसे यशपाल के प्रसिद्ध उपन्यास ‘दिव्या' से आसानी से समझा जा सकता है। प्रश्न उठता है कि क्या इन उच्च वर्गीय नगर वधुओं की तुलना आधुनिक विश्व सुंदरियों से नहीं की जा सकती? आखिर इनकी सामाजिक अस्मिता क्या थी? कहने का तात्पर्य मात्रइतना है कि भारतीय इतिहास के हर कालखण्ड में स्त्री पुरुषों की दासी बनी रही।
शायद यही कारण है कि भारतीय इतिहास एक पुरुष प्रधान इतिहास है। कुछ अपवादों की बात अगर छोड़ दें तो कला, विज्ञान, इतिहास, भूगोल, धर्मदर्शन आदि विषयों की कोई भी प्रतिभावान स्त्री लेखिका हमें हजारों वर्ष तक भारतीय इतिहास के पृष्ठों पर दिखाई नहीं देती। आखिर इसका कारण क्या है? कारण है समान अवसरों का प्राप्त न होना। जिस देश में महिलाओं को पढ़ने का भी अधिकार प्राप्त नहीं था, उस देश में किसी स्त्री से लेखिका बनने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। हिन्दी की प्रसिद्ध कवयित्री मीराबाई को अपनी काव्य क्षमताओं के प्रदर्शन के लिए कितना जोखिम उठाना पड़ा है, इसे कौन नहीं जानता। प्रसिद्ध लेखिका वर्जीनिया वुल्फ का यह कथन कितना सटीक है कि अगर प्रसिद्ध नाटककार सेक्सपियर की कोई बहन होती और उसकी भी मानसिक क्षमतायें सेक्सपियर के बराबर होती तो भी क्या वह एक प्रसिद्ध नाटककार बन सकती थी? इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि सेक्सपियर के काल में उसके देश में स्त्रियों की सामाजिक अस्मिता क्या थी? यहाँ सीमोन द बोउआर के इस कथन का स्वागत किया ही जाना चाहिए कि स्त्री पैदा नहीं होती बना दी जाती है। यहाँ इस बात का उल्लेख करना भी आप्रासंगिक नहीं होगा कि इतिहास के हर काल खण्ड में कुछ पुरुष ऐसे अवश्य रहें होंगे जिन्होंने स्त्रियों की सोचनीय व्यवस्था के बारे में औचित्यपूर्ण ढंग से सोचा होगा। कई बार शोषक वर्ग के लोग भी अपनी वैक्तिक चेतना के आधार पर शोषित वर्ग की पक्षधरता ग्रहण करते दृष्टिगत्‌ होते हैं। वाल्टेयर एक पादरी का पुत्र था। जिसने पादरी एवं चर्च की कठोर आलोचना की थी। मार्क्स मध्यमवर्गीय पिता का पुत्र था, जो जीवन भर मजदूर वर्ग के लिए संघर्ष करता रहा। भारतीय इतिहास में राजा राममोहन राय के पूर्व किसी स्त्री ने सती प्रथा के विरुद्ध आवाज नहीं उठाई थी। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि दलित लेखकों या नारीवादी लेखिकाओं का यह तर्क अधिक विवेकपूर्ण नहीं है कि स्त्री समस्याओं को मात्र स्त्री ही लिख सकती है या दलित समस्याओं को केवल दलित लेखक ही समझ सकते हैं। सच तो यह है कि कई बार उत्पीड़ित वर्ग के लोग अपने महाप्रभुओं के सोच में इतना ढल जाते हैं कि अपने उत्पीड़न के विरुद्ध सोचने की चेतना खो बैठते हैं। इतिहास में पन्ना धाय का या आज भी गांवों में सवर्ण युवकों को देख दलित वृद्धों को चारपाई से उठकर खड़े हो जाने को इसी उदाहरण के रूप में चिद्दित किया जा सकता है। उक्त अवधारणा द्वंद्ववादी दृष्टि से गलत नहीं है। वर्तमान समय जिसे कथित भूमण्डलीकरण का युग कहा जा सकता है में साम्राज्यवादी संस्कृति भी स्त्री को मुक्ति प्रदान करने का दावा कर रही है। पुरुषों की भाँति स्त्रियों की आबादी का एक हिस्सा इस अवधारण का शिकार है। वह अपनी वर्गीय समृद्धता को अपनी मुक्ति मान बैठा है। आज बाज+ार की संस्कृति जिसका एक मात्रउद्देश्य समृद्ध वर्ग को अधिक से अधिक समृद्ध बनाना है। केवल सर्वहारा संगठनों में ही बिखराव नहीं पैदा कर रहा है बल्कि दलितों और स्त्रियों के संगठनों को भी विभाजित करने का प्रयास कर रहा है। आज अमेरिका यूरोप से लगाकर भारत तक में ऐसे नारी संगठन या लेखिकायें मौजूद हैं जो साहित्य में भी आधुनिक या उत्तर आधुनिक विश्लेषण के नाम पर स्त्री के वर्गीय सोच को केवल विकृत ही नहीं कर रही हैं बल्कि पुरुष वर्ग को वर्ग शत्रु के रूप में चिद्दित कर रही हैं और प्रतिशोध की भावना से पुरुषजनित दुर्गुणों को भी अपनाने की वकालत कर रही है। यह भी सत्य है कि स्त्री पर योनिसचिता की भावना पुरुषों की वनिस्पत अधिक लादी गई है, मगर चरित्राहीन व्यक्ति को भी देश का समाज पसंद नहीं करता। यह भी उचित है कि हर स्त्री को अपने देह के मालिकाने का हक मिलना ही चाहिए, मगर बॉडी लैंग्वेज के नाम पर देह मुक्ति से यौनमुक्ति(फ्री सेक्स) तक का सफर सामाजिक संबंधों या रिश्तों को खोखला बना सकता है। तनाव, कुण्ठा, हिंसा से लगाकर यौनिक बीमारियाँ या एड्स पैदा कर सकता है। यहाँ प्रसिद्ध छायावादी कवयित्राी महादेवी वर्मा की नारी विमर्श पर केन्द्रित पुस्तक ‘श्रृंखला की कड़ियाँ' का जिक्र करना चाहता हूँ। इस पुस्तक में महादेवी ने जहाँ पुरुषों के बराबर स्त्रियों के लिए सभी सामाजिक, राजनैतिक अधिकारों के औचित्य को तर्कपूर्ण ढंग से व्यवस्थित किया है वहीं स्त्री को पुरुषों के अवगुणों से बचने की सलाह भी दी है। महादेवी का कहना है कि स्त्री जाति को अपने स्त्री योचित गुणों पर गर्व करना चाहिए और मुक्तता अर्थात्‌ चरित्रहीनता का अनुकरण नहीं करना चाहिए। यौन मुक्तता का नारा देने वाली लेखिकाओं से मैं कहना चाहता हूँ कि इस तरह आप विकृत मानसिकता वाले पुरुष वर्ग से सहयोग करने जा रही हैं। साम्राज्यवादी आर्थिक उदारीकरण की बाजारवादी संस्कृति यही तो चाहती है। वह स्त्री देह को अपने उत्पाद बेचने के लिए विज्ञापन की भाँति इस्तेमाल करती है। मैं स्त्री देह को प्राइवेट फर्म बना दिया जाए इस पक्ष में कतई नहीं हूँ, मगर स्त्री हो या पुरुष उसे यौन संबंधों के पूर्ण स्वतंत्रता यानी स्वच्छंदता दिये जाने का समर्थक भी नहीं हूँ। आज महानगरों की पंच सितारा संस्कृति में ऐसे पुरुष भी पाए जाते हैं जो पुरुष वैश्या की भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं। चंद समृद्ध वर्ग की महिलायें जो आर्थिक रूप से
आत्मनिर्भर भी हैं, इन्हें अपने साथ यौनिक संबंधों के लिए ले जाती है। क्या मात्रस्त्री होने के कारण इन महिलाओं के क्रियाकलापों को सामाजिक दृष्टि से सराहा जा सकता है? सामाजिक जीवन को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए कुछ मर्यादित सीमा रेखा होनी ही चाहिए और स्त्री पुरुष दोनों के लिए समान होनी चाहिए।
सही स्त्री स्वतंत्रता या पुरुष स्वतंत्रता दोनों एक दूसरे पर आधारित हैं। क्योंकि स्त्री पुरुष दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। इनकी समस्या का समाधान भी बिना व्यवस्था परिवर्तन के संभव नहीं है। आज सामन्ती संस्कृति की मार से पीड़ित ग्रामीण क्षेत्र की स्त्रियों को मुक्ति की सर्वाधिक आवश्यकता है। क्योंकि ग्रामीण क्षेत्र की अशिक्षित महिलायें मानसिक रूप से इतना दबा दी गई है कि इनके अंदर अपने दुख का अहसास तो है मगर दुखों से मुक्ति की चेतना का अभाव है। यह सब अपने दुखों को पूर्व जन्म के कर्मों का फल समझती हैं। इसका निराकरण शिक्षा के द्वारा संभव है। मगर अर्थ प्रधान बाजारवादी संस्कृति में जहाँ अशिक्षित जन मुक्ति की चेतना से वंचित रह जाते हैं वहीं शिक्षित लोग बाजारवादी सांस्कृतिक भटकाव के शिकार बन जाते हैं। मीडिया भी धनपशुओं की होती है। अतः वह भी अपने वर्ग की चाकरी में लगी रहती है। प्रश्न उठता है कि ऐसी स्थिति में क्या किया जाए? कैसे स्त्री की चेतना को जगाया जाए कि वह अपने वर्ग के पक्षधर पुरुष के साथ कदम ब कदम आगे बढ़ते हुए सम्पूर्ण वर्गीय मुक्ति के प्रयासों में लग सके। इसके लिए जहाँ हमें मीडिया का विकल्प तलाशना चाहिए वहीं चेतनाशील स्त्री पुरुषों को ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में काम करना चाहिए। क्योंकि इन्हें मुक्ति की अधिक आवश्यकता है और यह सब बाजारवादी सांस्कृतिक भ्रमों से मुक्त भी हैं।

डॉ० जगत सिंह बिष्ट
समकालीन हिंदी कहानी साहित्य में शैलेश मटियानी एक महत्त्वपूर्ण नाम है। हिंदी कहानी साहित्य के कथा सम्राट प्रेमचंद के बाद सर्वाधिक कहानी रचनाएँ शैलेश ने ही दी है। इनके समय-समय पर करीब ३० कहानी-संग्रह प्रकाशित हुए थे। अब शैलेश मटियानी की संपूर्ण कहानियाँ, उनके पुत्र राकेश मटियानी के संपादकत्व में प्रकल्प प्रकाशन, इलाहाबाद से पाँच खंडों में प्रकाशित हो चुकी है जिसमें शैलेश मटियानी की करीब २५० कहानियाँ संगृहीत है। शैलेश मटियानी का कहानी साहित्य व्यापक जीवन संदर्भों का वाहक है क्योंकि इनके कहानी साहित्य के वृत के अंतर्गत विविध क्षेत्रों, वर्गों और संप्रदायों संबद्ध जीवन संदर्भों का चित्रण हुआ है किंतु इनके कहानी साहित्य में भारतीय समाज के दबे, कुचले, शोषित, उपेक्षित और हाशिए के निम्न वर्गीय जीवन संदर्भों का सर्वाधिक निरूपण हुआ है। वस्तुतः शैलेश मटियानी के कहानी साहित्य में चित्रित यह निम्न वर्ग कुमाऊँ के अंचल से लेकर छोटे-बड़े नगरों एवं महानगरों से संबद्ध है। किंतु इनकी कहानियों में चित्रित उपेक्षित, पीड़ित, शोषित और दबा-कुचला वर्ग चाहे जिस क्षेत्र, वर्ग, संप्रदाय से संबद्ध है अपने प्रकृत रूप में दिखाई देता है। इसका कारण शैलेश मटियानी की अत्यंत संवेदनशील, उस अंतर्दृष्टि को माना जा सकता है जिसने उन्हें अपनी भोगी एवं देखी चीजों को यथार्थ रूप में पकड़ पाने की अद्भुत क्षमता दी है। यही कारण है कि शैलेश मटियानी कुमाऊँ अंचल से संबद्ध कहानीकार होते हुए भी जब वे प्यास, अहिंसा, बिद्दू अंकल, भय जैसी नगरीय जीवन से संबद्ध कहानियाँ लिखते हैं तो वे भी कुमाऊँ अंचल से संबद्ध कपिला, नाबालिग, ब्राह्मण, खरबूजा, अर्द्धांगिनी जैसी कहानियों की भाँति अत्यंत गहरे प्रकृत रूप में दिखाई देती है। इन कहानियों में किसी भी प्रकार का बनावटीपन एवं कृत्रिमता नहीं दीखती। कहना यह है कि हिंदी कहानी साहित्य में प्रेमचंद के बाद ऐसा कोई कहानीकार नहीं दिखाई देता जिसमें शैलेश मटियानी के समान विविध वर्गों, स्थानों और धर्मों से संबद्ध जीवन को, उसके वास्तविक रूप में प्रस्तुत करने की दक्षता हो। शैलेश विविध परिवेश के भीतर से अपनी कहानियों के कथ्य का चयन करते हैं उसके अनुरूप पात्रों के चयन से लेकर उनके मासिक स्तरों का मार्मिक उद्घाटन करते हैं। उससे वे आसपास को ठीक-ठाक जाँचने-परखने की अद्भुत अंतर्दृष्टि का परिचय देते हैं।शैलेश मटियानी ने दलित जीवन संदर्भों पर पर्याप्त कहानियाँ लिखी हैं उन कहानियों में अहिंसा, जुलूस, हारा हुआ, संगीत भरी संध्या, माँ तुम आओ, अलाप, लाटी, भँवरे की जात, आंधी से आंधी तक, परिवर्तन, आक्रोश, भय, आवरण, दो दुखों का एक सुख, चुनाव, प्रेतमुक्ति, चिट्ठी के चार अक्षर, वृत्ति, सतजुगिया, गोपुली गफूरन, गृहस्थी, इब्बू मलंग, प्यास, शरण्य की ओर आदि कहानियाँ प्रमुख रूप से उल्लेखनीय हैं। इन कहानियों में दलित वर्ग से संबंधित चरित्र मुख्यतः तीन रूपों में चित्रित हुए हैं। पहला-वह जो भारतीय समाज व्यवस्था की अमानवीयता से लाचार होकर समझौता करता दिखाई देता है। दूसरा-वह जो समाज व्यवस्था के प्रति आक्रोश तो व्यक्त करता है किंतु उसका आक्रोश इतना दबा होता है कि अंततः टूटकर समझौते की विवशता को झेलता है। तीसरा-वह जो अपनी मान-मर्यादा एवं हितों के लिए समाज व्यवस्था से सीधे टकराता है। अतः कहने में संकोच नहीं है कि शैलेश मटियानी के कहानी साहित्य में चित्रित दलित सरोकार अपने यथार्थ रूप में व्यक्त हुए हैं जिसमें समकालीन भारतीय समाज में आए बदलाव के स्पष्ट स्वर हैं।इनकी अहिंसा कहानी का चरित्र जगेशर दलित वर्ग से संबद्ध है वह शासकीय व्यवस्था से सर्वाधिक संत्रास्त है। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद अपनी पत्नी के उपचार के लिए धन एकत्रिात करता है किंतु सरकारी अस्पतालों के कार्यरत कर्मचारियों एवं डॉक्टरों की अमानवीयता एवं भ्रष्ट आचरण के कारण वह ऑपरेशन से पूर्व ही दम तोड़ती चित्रित हुई है। वस्तुतः इस कहानी में जहाँ एक ओर दलित वर्ग की भारतीय समाज में प्रस्थिति का यथार्थ व्यक्त हुआ है वहीं इस कहानी का दलित चरित्र दलित चेतना से युक्त चित्रित हुआ है इसीलिए वह विद्रोह की आग में झुलसता तो दिखाई देता ही है इसके अतिरिक्त वह प्रतिशोध से भरकर डॉक्टर की हत्या करता भी चित्रित हुआ है। इनकी जुलूस कहानी में भी चित्रित दलित चरित्र वर्तमान भारत की घिनौनी राजनीति से यंत्रणा पाते चित्रित हुए हैं। इस कहानी की दलित नारी चरित्र बुधा राम की विधवा माँ सर्वाधिक कष्ट पाती है क्योंकि राजनीति प्रेरित पुलिस तंत्र के द्वारा महालक्ष्मी के दिन जुवारियों की जो धरपकड़ होती है उसमें उसका बेटा भी पुलिस द्वारा गिरफ्तार होता है। कहानीकार ने उसे अनेक प्रकार की आशंकाओं से ग्रस्त होते चित्रित किया है ''कहीं इसकी सरकारी दफ्तर की चपरासगीरी भी न चली जाए? कहाँ अगले ही महिने गौना सिर पर और कहाँ थुक्का फजीहत आ गयी।''१ इनकी हारा हुआ कहानी में भी गैरदलितों की दलितों के प्रति आम धारणा का यथार्थ व्यक्त हुआ है। किंतु इस कहानी में आम धारणा के विपरीत परिणाम निकलते दिखाई देते हैं। इस कहानी का दलित चरित्र दुखहरन मोची अत्यंत असहाय होते हुए भी गैरदलित चरित्र गंडामल पहलवान के द्वारा विधवा पुत्री कैलासों के प्रति बुरी नजर डालने पर, जिस प्रकार का कथन करता है उससे उसकी दलित चेतना व्यक्त होती है, ''कह देना अपने बाप गंडामल पहलवान से, आगे से मेरे घर की तरफ मुँह किया, तो उसकी बेहया आँखों को कटन्नी से बाहर खींचकर बाहर निकाल दूँगा और जबान में ठोक दूँगा जूते की नाल! पता चल जाएगा हराम जादे को कि किसी की बेटी को बुरी नजर से देखना क्या होता है।''२ वस्तुतः इस कहानी में कहानीकार ने एक कमजोर, विवश और लाचार दलित के द्वारा फेंकी गई चुनौती से शक्तिशाली गैरदलित के टूटते मनोबल को दर्शाकर महान आदर्श के साथ-साथ सामाजिक परिर्वन का संकेत भी प्रस्तुत किया है।शैलेश मटियानी की 'संगीत भरी संध्या' कहानी दलित विमर्श से भरी पड़ी है। इस कहानी में दलित चरित्र परंपरावादी और प्रगतिशील दोनों प्रकार के हैं। इस कहानी के रमदिया और गुणवंती दलित चरित्रा परंपरावादी है जो अपने परंपरागत पेशे (नाच-गाना) के प्रति समर्पित दिखाई देते हैं इसीलिए तो इस कहानी का दलित चरित्र रमदिया अपने पेशे से उदासीन भाई सुंदरिया को फटकारता चित्रित हुआ है, ''कमअकल साले, जरा अपनी औकात पर रह। जाने कहाँ से स्साला किसी झुटके का पैदा हो गया है। खानदानी होता, तो जरा तबले-सारंगी-हारमोनियम में सुर लगाता। ले मेरा यार कुल्ली-कबड़ियों के जैसे नीच काम करेगा...अरे स्साल, बोझ ढोना, मजदूरी करना क्या कोई हम लोगों का पेशा है?''३ इसके विपरीत मोहिनी और सुंदरिया अपने पेशे के प्रति नफरत करते चित्रित हुए हैं। दलित नारी चरित्रा मोहिनी तो अपने पति को परंपरा प्राप्त पेशे से चिपके रहने के लिए फटकारती चित्रित हुई है, ''सुंदरिया बेचारे पर क्या बिगड़ रहे हो, भरतार? मैं तो कहती हूँ कि मेरे सुंदरिया भाई जैसे सारे कबीलों में पैदा हो जाएँ, तो जरा हम रंडियों के सुख के दिन देखने को मिलें। यह स्साला अठन्नी-दुअन्नी के भाव से अपने अंग हिलाने का पलीत करम तो छूटे... सुंदरिया का सुर तबले-सारंगी में नहीं लगता है, इसीलिए इस छोरे को छाती से लगाकर रख रही हूँ कि किसी अच्छी जाति-औकात का होगा, तो इस पलीत पेशे को त्यागकर, कहीं इज्जत की रोटी कमा खायेगा।''४ इस कहानी की मोहिनी एवं सुंदरिया दलित चरित्रों की दलित चेतना अकारण नहीं है बल्कि गैरदलितों से मिलने वाली उपेक्षा एवं अमानवीय व्यवहार से मुक्ति की छटपटाहट है। इनकी 'माँ तुम, आओ' कहानी में भी पर्याप्त दलित संदर्भ है। इस कहानी में गैरदलितों की अमानवीयता और दलित वर्ग से संबद्ध चरित्रों को दलित होने के बोध के स्तरों से गुजरते चित्रित किया गया है। इस कहानी के दलित वर्ग से संबद्ध बच्चू बाल चरित्र और बड़ी माँ नारी चरित्र को गैर दलित चरित्र माधो काका दलित होने के त्रासद बोध के धरातल पर ले जाता चित्रित हुआ है। इसके अतिरिक्त, इस कहानी के दलित चरित्रा दलित होने के स्तरों से गुजरते हुए अपार यंत्रणा पाते दीखते हैं इसीलिए तो इस कहानी का बाल चरित्र बच्चू गैरदलित चरित्रा ठाकुर माधो काका की उपेक्षा से दलित होने के आत्मबोध एवं यंत्रणा को व्यक्त करता दिखाई देता है, ''अच्छा बड़ी माँ, एक बात बताओ। माधो काका हरिजन का बच्चा कहते हैं, तो मुझे बहुत बुरा लगता है - लेकिन तुम डूम भी कहती हो तो इतना अच्छा क्यों?''५ इसके अलावा, इस कहानी का गैरदलित चरित्र, दलित बाल चरित्र के पिता पुन्नी ठाकुर की आर्थिक विवशता का फायदा उठाकर, अपनी वचन बद्धता के कारण दलित परिवार के भीतर संघर्ष उत्पन्न करता है किंतु दलित बाल चरित्रों की सोच-समझ के कारण परिवार टूटने से बच जाता है। शैलेश की अलाप कहानी में दलित चरित्र डिगर राम के जीवन की विविध प्रकार के आलाप का कथन हुआ है। एक ऐसा आलाप जिससे आर्थिक रूप से लाचार एक दलित के यथार्थ जीवन की मार्मिक अभिव्यंजना हुई है। इनकी लाटी कहानी में गैरदलितों के द्वारा आर्थिक रूप से विवश दलित नारी चरित्र उत्तमा लाटी के प्रति घोर उपेक्षा का निरूपण हुआ है। अपने प्रेमी डिगरुवा की मृत्यु से अत्यंत आहत होकर विलाप करने पर गैरदलित चरित्र, उसके प्रति सहानुभूति के बजाय संवेदनहीनता का परिचय देते दीखते हैं, ''अब संगमरमर की मूरत जैसी खामोश क्यों बैठी है, ससुरी! बोल? अरे राँड! कुछ तो बोल कि अपने खसम के मरने पर तू क्यों ढाई मील तक मुर्दे के पीछे चुडैल जैसी चली आई और क्यों तूने नौटंकी जैसी भीड़ इकट्ठी कर ली।''६ वस्तुतः लाटी कहानी में दलित नारी चरित्रा के प्रति, इस प्रकार का कथन कहीं न कहीं भारतीय समाज की संवेदन शून्यता ही व्यक्त करता है जिससे दलित वर्ग ने घोर उपेक्षा पाई है। शैलेश की परिवर्तन कहानी दलित संदर्भों की दृष्टि से प्रभावशाली है। क्योंकि इस कहानी में दलित जीवन से संबद्ध वे सारे प्रसंग हैं जिससे दलित विमर्श किया जा सकता है। देवराम और जसुली परिवर्तन कहानी के दलित चरित्रा हैं ये दलित चरित्र गैरदलितों की उपेक्षा एवं अमानवीयता से एक साथ संत्रस्त और आक्रोशित हैं। कहना यह है कि इस कहानी में वर्षों से पीड़ित दलित वर्ग में गैरदलितों के आतंक से मुक्ति की छटपटाहट दिखाई देती है इसीलिए तो इस कहानी का दलित चरित्र देवराम अपनी बिरादरी के सामाजिक उत्थान के लिए चिंताशील दिखाई देता है ''लगभग चालीस-पैंतालीस वर्षों से इसी डुमौड़िया विमलकोट की धरती से लगा हुआ देवराम कभी-कभी बहुत दुखी और कुंठित हो उठता है कि ठाकुरों और ब्राह्मणों की तुलना में बहुत ही कठोर परिश्रम करने पर भी, उसकी जाति बिरादरी के लोगों को न तो आर्थिक सुविधाएँ हो पाती हैं और न सामाजिक क्षेत्र में ही उन लोगों को आदर मिल पाता है।''७ कुल मिलाकर यह कहानी दलित चेतना की वाहक है जिसमें समकालीन भारतीय समाज में व्यक्ति स्वतंत्रता की अनुगूँज है जो शैलेश के समकालीन बोध को प्रदर्शित करती है। इनकी भँवरे की जात और गृहस्थी कहानी एक जैसी हैं। इन दोनों कहानियों में कुमाऊँ अंचल की नाच-गाकर आजीविका चलाने वाली मिरासी दलित जाति से संबद्ध नारी जीवन का मार्मिक चित्रण हुआ है। इन दोनों कहानियों में चित्रित दलित नारी चरित्र मुख्य रूप से आर्थिक कठिनाइयों से संत्रस्त चित्रित हुई हैं और इस कहानी की नारी चरित्र गैरदलितों से भी कम नहीं छली जाती है। फिर भी ये कहानियाँ अलग-अलग प्रभाव छोड़ती दिखाई देती हैं। यद्यपि इन दोनों कहानियों की नवयुवती दलित चरित्र आर्थिक कठिनाइयों से उबरने के लिए नए मूल्यों को तलाशती दिखाई देती है किंतु इस तलाश में भँवरे की जात कहानी की दलित चरित्रा कुंतुली स्वयं तलाश बन जाती है क्योंकि सामान्यतः एक दलित नवयुवती का गैर दलित विवाहिता पुरुष के साथ प्रेम प्रसंग का जो हश्र होता है, अंततः वही उसके साथ भी होता है। किंतु प्रेम प्रसंगों में विफलता के बावजूद वह कहानी के अंत में महान्‌ आदर्श स्थापित करती दिखाई देती है वह जब अपनी पुत्री के गैरदलित पिता के पास अपने हक़ के लिए जाती है तो वह उसकी पत्नी से प्रभावित होकर, अपना दावा छोड़ती चित्रित हुई है, ''मैं तो नाच-गाकर भी जिन्दगी ठेल लूँगी लेकिन तुम कहाँ तक मायके में पड़ी रहोगी। मैंने अपना दावा छोड़ा।''८ इनकी आक्रोश कहानी में भी दलित पड़ोसी के बच्चों के घर में आने-जाने के कारण एक गैर दलित परिवार के भीतर तनाव उत्पन्न होता चित्रित हुआ है क्योंकि गैर दलित परिवार के मुखिया के मन में संदेह है कि ''आजकल के लौंडे-लौंडियाओं को अंतर्जातीय शादी-ब्याह करते देर क्या लगती है, भला।''९ किंतु जब वह अपने बच्चों को बुलाने पड़ोसी दलित परिवार के घर जाता है तो पड़ोसी कायस्थ परिवार की विधवा नारी चरित्र तारादेवी का देखकर अपना क्रोध भूल जाता है और उसके मन में तारा देवी के प्रति जबरदस्त आकर्षण उत्पन्न होता दिखाई देता है। इतना ही नहीं दलितों की घोर उपेक्षा करने वाला गैर दलित चरित्र कांता बाबू घर लौटते समय न केवल दलित नारी तारादेवी को अपने घर आने का आमंत्रण देता बल्कि दलितों के प्रति अपनी जिस धारणा को व्यक्त करता है, उससे उसकी दलितों के प्रति दोहरी मानसिकता ही व्यक्त होती है, ''अच्छा, अब आप कब आयेंगी, हमारे यहाँ? देखिए, हम लोगों से संकोच न रखिएगा। खासतौर पर मैं तो आज के जमाने में कायस्थ - ब्राह्मणों में आदमी में बाँटकर सोचना हीनता समझता हूँ। आप जब भी अकेली होती हैं, चली आया करें। मैं तो काम के दिनो में सवेरे और शाम को घर पर ही हुआ करता हूँ।''१० वस्तुतः आक्रोश कहानी में शैलेश ने गैरदलित पुरुषों की विडम्बनापूर्ण नियति का उद्घाटन किया है जिससे दलित वर्ग की नारियाँ वर्षों से छली आ रही हैं।दलित संदर्भों पर आधारित शैलेश मटियानी की गोपुली गफूरन कहानी सर्वाधिक प्रभावशाली है। वह अद्वितीय सौंदर्य के कारण गैर दलित चरित्रों के हास-परिहास और काम चेष्टाओं का कारण बनती चित्रित हुई है। इस कहानी के गैर दलित चरित्र खीम सिंह, प्रोफेसर तिवारी, भोपाल शा, अदलूमियाँ और किरपाल गुरु सबके-सब, उसके प्रति आकर्षित होते चित्रित हुए हैं। उसके शरीर के स्पर्श सुख के लिए ही, उसे सहयोग देते दिखाई देते हैं, ''भोपाल शा की दुकान से गोपुली के मालिक देबराम ने गल्ले की उधारी बाँध रखी थी। किरपाल दत्त पुरोहित अपने जजमानों को ताँबे के कलशे देबराम के ही यहाँ से खरीदने की सलाह देते थे। खीम सिंह होटल वाला गोपुली को गरम-गरम शिकार-भुटुवा हाफ चार्ज लेकर खिलाया करता है। अक्सर ही इन लोगों के आमने-सामने आना पड़ता है और दो-चार ठिठोलियाँ भी सहनी पड़ती है।''११ किंतु पति की मृत्यु के बाद सभी गैरदलित चरित्र गोपुली गफूरन के घोर आर्थिक संकट के क्षणों में साथ न देकर अवसरवादिता का परिचय देते हैं, ''गोपुली गफूरन हो गयी कि बालकों के भूखे मरने की नौबत आ गयी और भोपाल शा ने उधार देना बंद कर दिया था।...खीम सिंह की नियत नहीं बदली थी, मगर गोश्त की तश्तरियों से बालकों का पालन-पोषण नहीं हो सकता था। किरपाल गुरु मदद करने को तैयार थे, मगर गोपुली को ताँबे के कलशों पर फूल निकालने की कला नहीं आती थी। बिरादरी के लोगों ने ऐसी पीठ फेरी, आसरा देने की जगह ताने देने लगे।''१२ कहना यह है कि इस कहानी की दलित चरित्र गोपुली के दलित और उसमें भी दलित नारी होने की दोहरी मार झेलती चित्रित हुई है। अंततः वह आर्थिक कठिनाइयों से उबरने के लिए अपने धर्म से भिन्न धर्म से संबद्ध अहमद अली से विवाह तो करती है किंतु वहाँ वह अनेक बंदिशों से घिरती अपरिमित कष्ट पाती दिखाई देती है। इसीलिए तो वह कहती है ''अपने मजे की बात तुम्हीं लोग जानो री! मुझे तो जो कुछ मजा आना था, पिछले साल तक आ चुका।.... अब सिर्फ सजा बाकी रह गयी है।''१३ शैलेश मटियानी की आवरण कहानी की दलित नारी चरित्र रेवती भी गैरदलितों के छल-प्रपंचों का दंश झेलती चित्रित हुई है। वह बाल विधवा है। उसे गाँव का ही गैरदलित चरित्र बहला-फुसलाकर काम वासनाओं का शिकार बनाता है और दलित विधवा के गर्भवती होने पर, उसे अपनाने के बजाए, उसके लिए अनेक प्रकार के संकट उपस्थित करता है। इसके अलावा, उसकी पत्नी दलित नारी चरित्र के प्रति जिस प्रकार का कथन करती है उससे भारतीय समाज में गैर दलितों की दलितों के प्रति अमानवीय धारणा व्यक्त हो जाती है, ''साफ पानी में थूकने से कुछ नहीं होता, मगर कीचड़ में पेशाब करने से भी बुरा होता है राँड मेरी लाड़ली सौत बनके, जैसे मेरे खसम के नाम की सरकारी मुहर लगाकर लाई हो। अरे, बिना मालिक के खेत में बीज किसका पड़ा, किसका नहीं!''१४ इतना ही नहीं, इस कहानी में दलित नारी चरित्र रेवती ठाकुर हरपाल से छली जाने पर, उसे काश्तकारी से बेदखली की पीड़ा से भी गुजरना पड़ता है। पंचायत बिठाई जाती है किंतु पंच भी ठाकुर हरपाल के पक्ष में निर्णय देते हैं। इस कहानी की दलित नारी चरित्र रेवती तमाम प्रकार के लांछनों और अमानवीयता के बावजूद टूटती नहीं बल्कि पंचों के निर्णय के प्रति विद्रोह करती, अपने स्वाभिमान का परिचय देती है ''पंच महाराज लोगों, हंसों की पाँत गू खा गई, मगर कौवे की जात अपना धरम नहीं छोड़ेगी। जिस दगा बाज नामरद ने थूककर चाट लिया, उसकी जमीन में पाँव रखने तो मर जाना अच्छा है।''१५ इस कहानी में दलित चेतना के स्वर भी व्यक्त हुए हैं। इसीलिए तो ठाकुर हरपाल के द्वारा दलित रेवती को काश्तकारी से बेदखल किए जाने पर, उसके दलित बिरादर विरोध करते चित्रिात हुए हैं, ''अब कोई विलायती वालों का राज नहीं है। जिस जमीन को रेवती बोती-काटती आ रही है, उसे हरपाल नहीं छीन सकता।''१६ यद्यपि इस कहानी का गैर दलित चरित्र हरपाल सब कुछ अपने पक्ष में कर लेता है तथापि वह अपराध बोध से भी कम ग्रसित नहीं दिखाई देता है ''मगर, बिना देवराम के ही, कुछ कहे उन्हें अनुभव हुआ कि अट्टहास से वो अपने नंगे होते को सिर्फ उतना ही ढँक पा रहे हैं, जितना देवराम अपनी सिमटी हुई लंगोटी से अपनी देह को ढँक पा रहा है।''१७शैलेश मटियानी की हत्यारे कहानी में पर्याप्त दलित संदर्भ है। इस कहानी में दलित चेतना मुखरित तो हुई ही है इसके अतिरिक्त दलितों की भावनाओं को भड़काकर राजनीति करने वाले नेताओं की कुत्सित चेष्टाएँ भी अनावृत्त हुई हैं। इस कहानी के शिवचरण केवट और हरफूल चंद दलित चरित्र अपनी दलित बिरादरी के प्रति पर्याप्त चिंताशील हैं। ये दोनों चरित्र केवटपुरा हरिजन समाज जैसे दलित संगठनों के द्वारा दलित बिरादरी को सामाजिक चेतना की प्रदीप्त प्रेरणा देते चित्रित हुए हैं। दलित चरित्रा हरफूल चंद अपनी बिरादरी को क्रांति का आवाहन करता चित्रित हुआ है, ''तो मैं आप लोगों से क्या कह रहा था कि हम हरिजन भाइयों पर जोर-जुल्मों की हुकूमत चलाने के वे नादिरशाही जमाने गुजर चुके, जो हमारे बाप-दादाओं के पीठों पर अपने जालिम निशान छोड़ गए हैं।...अब वक्त आ गया है कि हम हरिजन दुनिया में अपने नामोनिशान छोड़ जाएँगे।''१८ इस कहानी का गैर दलित नेता संकटमोचन सिंह दलितों के साथ मिलकर राजनीति करता चित्रित हुआ है। वह दलित शिवचरण केवट को भड़काकर अपनी सीट सुरक्षित करता दिखाई पड़ता है। किंतु उसकी अवसरवादिता तब सामने आती है, जब दलितों के अवैध कब्जों को नगरपालिका के औजारों से लैश दस्ते के आने पर वह घटना स्थल से नदारत होता है इसीलिए दलित चरित्र शिवचरण केवट उसकी धोखाधड़ी का उद्घाटन करता कहता है, ''ई ससुर ठाकुर संकटमोचन और ताऊ हरफूल चंद दोनों नदारत हैं। दोनों धोखे बाज हैं।''१९ फलतः वह अकेले जूझता अंततः अपने प्राणों से हाथ धो बैठता है, इसीलिए तो उसकी पत्नी रामरती, अपने पति की मौत का जिम्मेदार गैर दलित नेता संकटमोचन सिंह और हरफूल चंद को मानती है, ''हमारे इनके तो सरकार नहीं मारी है, ई राक्षस ससुर ठाकुर संकटमोचन सिंह और तुम्हारे बुढ़ऊ हरफूल चौधरी मरवाय दिए हैं।''२० चिट्ठी के चार अक्षर कहानी की दलित नारी चरित्रा दुर्गा की त्रासदी का मार्मिक चित्रण हुआ है। घर की विवशताओं के कारण, उसे गायों को चराने के लिए वन जाना पड़ता है किंतु उसे वन में ब्राह्मणों एवं ठाकुरों के छोंकरों की छेड़-छाड़ का सामना करना पड़ता है। उसे गैर दलित नव युवक परताप ठाकुर का संरक्षण तो मिलता है किंतु यह संरक्षण, उसके लिए कलंक का कारण बनता है। दोनों के बीच अपार प्रेम होने के बावजूद जातीयता की दीवार, दुर्गा के लिए अपार यंत्रणा का कारण बनता है। फलतः दलित नव युवती दुर्गा के साथ वही होता है जैसा भारतीय समाज में, अपने गैर दलित प्रेमी को अपना सर्वस्य समर्पित करने वाली आम दलित नव युवतियों के साथ होता है। किंतु इस कहानी की दलित चरित्र दुर्गा पर्याप्त प्रगतिशील, साहसी और उदात्त विचार संपन्न चित्रित हुई है इसीलिए तो वह हारती नहीं है। अंततः संघर्ष करती है और अपने प्रेमी की विवशता तथा अपनी नियति से विवश होकर, उसे क्षमा कर उदात्त प्रेम की अभिव्यंजना करती है। इसके अलावा, इस कहानी का गैर दलित ठाकुर परताप भी एक प्रगतिशील चरित्र के रूप में दिखाई देता है। तमाम प्रकार की सामाजिक बाधाओं के बावजूद, वह अपनी प्रेयसी को न अपना पाने के अपराध बोध से संत्रस्त दिखाई देता है और सेना में भर्ती हो जाने के बाद सामाजिक बंदिशों के बावजूद भी अपनी दलित प्रेमिका के प्रति समर्पित चित्रित हुआ है, ''सच प्यारी, तेरे साथ विश्वासघात करने का दुख जैसा मुझे सताता रहा है मेरी ही आत्मा जानती है। मगर अब जब मैं घर लौटूँगा, तो तुझे खुले आम अपनी घरवाली के तौर पर कबूलूँगा।''२१ दलित चेतना की दृष्टि से शैलेश मटियानी की सतजुगिया सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कहानी है। इस कहानी में वर्षों से उपेक्षित एवं शोषित दलित वर्ग की नई पीढ़ी में भारतीय अमानवीय समाज व्यवस्था के प्रति खुला विरोध व्यक्त हुआ है। इस कहानी में दलित वर्ग से संबद्ध चरित्रा दो पीढ़ियों से संबद्ध है। पुरानी पीढ़ी से संबद्ध चरित्र परंपरा से चिपके और नई पीढ़ी के चरित्र परंपरा के प्रति पर्याप्त विद्रोही हैं। इस कहानी का हरराम पुरानी पीढ़ी और परराम नई पीढ़ी से संबद्ध दलित चरित्र हैं। कहानी का पुरानी पीढ़ी से संबद्ध चरित्र हरराम पुरानी मानसिकता को दर्शाते हुए गैर दलित केशवानंद की मरी हुई भैंस को खींचने के पक्ष में हैं किंतु उसका बेटा परराम भैंस को खींचने के लिए साफ मना करता चित्रित हुआ है। फलतः उन दोनों बाप-बेटे के बीच द्वंद्व की स्थिति उत्पन्न होती दिखाई देती है। परंपरा के प्रति आग्रही हरराम अपने बेटे के द्वारा भैंस खींचने की मनाही को ब्रह्मदोह२२ मानता है। जबकि उसके बेटे परराम का स्पष्ट मत है, ''सभी इस बात से सहमत थे कि जब अपना खून-पसीना निचोड़कर पेट पालते हैं, तो कम से कम इतनी तो आजादी तो होनी चाहिए कि जो काम रुचे करें। भैंसखोर मानकर, देह छूते ही सवर्ण उन्हें दुराते थे। इससे इन सभी को ठेस पहुँचती थी, जिनके हर राम जैसे रूढ़ संस्कार नहीं थे।''२३ वस्तुतः इस कहानी में जहाँ एक ओर दलित वर्ग के दो पीढ़ियों के बीच संघर्ष को वाणी तो मिली ही है वहीं कहानीकार की समकालीन बोध दृष्टि भी व्यक्त हुई है। जिससे दलित जीवन संदर्भों के नए युग की अनुगूँज सुनाई देती है। इन्होंने शरण्य की ओर जैसी कहानी भी लिखी हैं जिसकी दलित नारी चरित्र सुख - सुविधाओं की चाह में इधर से उधर भटकती चित्रित हुई है किंतु गैर दलित पुरुषों की अमानवीयता से संत्रस्त होकर अंततः अपने पुराने पति के पास लौटती दिखाई देती है। वस्तुतः इस कहानी में सुख-सुविधाओं के लिए घर-परिवार को छोड़कर दलित नारी की भटकन कुछ और नहीं बल्कि नए मूल्यों की तलाश है किंतु दलित नारी नए मूल्यों के तलाश में असफल होती चित्रिात हुई है। इन कहानियों के अतिरिक्त शैलेश ने वृत्ति, प्यास, इब्बू मलंग, दो दुखों का एक सुख जैसी कहानियाँ भी लिखी हैं जिनमें दलित चरित्र अपने प्रकृत रूप में दीखते हैं। इन कहानियों में शैलेश मटियानी ने समकालीन राजनीति, प्रशासन तंत्र, सामाजिक उपेक्षा एवं आर्थिक दुर्दशा से संत्रस्त दलित जीवन संदर्भों का मार्मिक और यथार्थ चित्रण किया है।वस्तुतः शैलेश मटियानी का कहानी साहित्य मूलतः भारतीय समाज के पिछड़े, वंचितों और आर्थिक रूप से विपन्न निम्न वर्गीय जीवन से संबद्ध रहा है। इसके अतिरिक्त, इनके कहानी साहित्य में भारतीय समाज के हासिए में रहे वर्षों से उपेक्षित एवं शोषित दलित जीवन संदर्भों का भी पर्याप्त चित्रण हुआ है। इस संबंध में श्री प्रकाश मनु का कथन उचित जान पड़ता है, ''दलितों और नीचले वर्ग के लोगों से प्यार करने वाला उनसे बड़ा और कोई लेखक हमारे बीच हुआ ही नहीं। मटियानी का पूरा कथा साहित्य इस बात की गवाही देता है। ...यहाँ प्रेमचंद के बाद शैलेश मटियानी ही सबसे बड़े जनपक्षधर कथाकार साबित होते हैं।''२४ इनके कहानी साहित्य में चित्रित दलित वर्ग कुमाऊँ अंचल से लेकर छोटे-बड़े नगरों एवं महानगरों से संबद्ध रहा है। उनकी कहानियों में दलित वर्ग कई रूपों में चित्रित हुआ है। इनकी कहानियों में जहाँ एक ओर आर्थिक विपन्नता एवं गैर दलितों से संत्रस्त दलितों का चित्रण हुआ है वही भारतीय समाज व्यवस्था के प्रति विरोध करते दलित भी दिखाई देते हैं। शैलेश की कहानियों में दलित नारी सर्वाधिक संत्रस्त दीखती है। इनकी कहानियों में जहाँ एक ओर कथा सम्राट प्रेमचंद की घासवाली कहानी की मुलिया और ठाकुर का कुआँ की गंगी जैसी प्रबुद्ध दलित नारी चरित्र हैं वहीं गैर दलितों की काम पिपासा से दंशित एवं कलंक का बोझ ढोती दलित नारी चरित्र भी है। जो तमाम प्रकार की सामाजिक उपेक्षा एवं आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद भी खुशी-खुशी संघर्ष करती चित्रित हुई है। इस दृष्टि से शैलेश की भँवरे की जात, चिट्ठी के चार अक्षर, शरण्य की ओर, और आवरण, कहानियाँ उलेख्य हैं। इसके अलावा शैलेश के कहानी साहित्य में प्रेमचंद की सद्गति कहानी के गोंड जैसे दलित चरित्र भी हैं जो गैर दलितों की अमानवीयता एवं समाज व्यवस्था के संवेदन शून्यता के प्रति गहरा विरोध व्यक्त करते हैं। उनमें परिवर्तन कहानी का देबराम, सतजुगिया का परराम, हत्यारे का शिवचरण केवट आदि महत्त्वपूर्ण है। इनकी कहानियों में चित्रित कतिपय दलित नारी चरित्र तमाम कठिनाइयों के बावजूद महान्‌ आदर्श प्रस्तुत करती दीखती हैं। इनके कहानी साहित्य में प्रायः चित्रित दलित वर्ग से संबद्ध चरित्र तमाम प्रकार की कठिनाइयों के बावजूद भी मानवीय गुणों से युक्त है। इस संबंध में श्री हृदयेश का कथन उद्धृत है - ''यों उनके कथा-संसार में ...तुच्छ पेशों को चिपटाए गरीब एवं लाचार पात्र हैं, किंतु वे मानवीय गुणों के मामले में गरीब और तुच्छ नहीं हैं।''२५ इसके अलावा शैलेश मटियानी की कहानियों में कतिपय नई पीढ़ी से संबद्ध गैरदलित पुरुष चरित्र दलित वर्ग से संबंध नारियों से संबंध स्थापित करते चित्रित हुए हैं जिससे निश्चित ही समकालीन मूल्य परिवर्तन का संकेत मिलता है। इनके कहानी साहित्य के संबंध में प्रसिद्ध कथाकार पंकज बिष्ट का कथन उचित ही है, ''उनका रचना संसार ऐसे पात्रों से भरा है जो शोषित, पीड़ित और समाज के हाशिए में डाल दिए गए लोग हैं।''२६सन्दर्भ सूची१. शैलेश मटियानी, अहिंसा तथा अन्य कहानियाँ ; साहित्य भंडार ५०, चाहचंद, इलाहाबाद, १९९२, पृ० ११०२. शैलेश मटियानी, हारा हुआ ; आशु प्रकाशन, इलाहाबाद, १९८५, पृ० १२७३. (सं०) राकेश मटियानी, शैलेश मटियानी संपूर्ण कहानियाँ - ४ ; प्रकल्प प्रकाशन, इलाहाबाद, २००४, पृ० २६८४. वही, पृ० २६८५. वही, पृ० २८२६. (सं०) राकेश मटियानी, शैलेश मटियानी की संपूर्ण कहानियाँ - २ ; प्रकल्प प्रकाशन, इलाहाबाद, २००४, पृ० ३४७. शैलेश मटियानी, तीसरा सुख ; प्रतिभा प्रकाशन, इलाहाबाद, १९९२, पृ० ५७८. शैलेश मटियानी की संपूर्ण कहानियाँ - २ ; पृ० १०१९. वही, पृ० १६४१०. वही, पृ० १६८११. शैलेश मटियानी, पापमुक्ति तथा अन्य कहानियाँ ; आशु प्रकाशन, इलाहाबाद, १९९४, पृ० ४९१२. वही, पृ० ५५१३. वही, पृ० ५९१४. (सं०) राकेश मटियानी, शैलेश मटियानी की संपूर्ण कहानियाँ - 1 ; प्रकल्प प्रकाशन, इलाहाबाद, २००४, पृ० ३४८१५. वही, पृ० ३५२१६. वही, पृ० ३५११७. वही, पृ० ३५४१८. (सं०) राकेश मटियानी, शैलेश मटियानी की संपूर्ण कहानियाँ - ३ ; प्रकल्प प्रकाशन, इलाहाबाद, २००४, पृ० १६८१९. वही, पृ० १७९२०. वही, पृ० १८०२१. वही, पृ० १८८२२. वही, पृ० ४५१२३. वही, पृ० ४५५२४. आजकल ; अक्टूबर, २००१२५. पहाड़ ; २००१, पृ० १९१२६. आजकल ; अक्टूबर २००१

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सारिका और धर्म युग पत्रिका  

Posted by डा. फीरोज़ अहमद

आदाब
मैं अलीगढ़ से वाड्रमय पत्रिका निकालता हूं.अगला अंक राही मासूम रजा परकेन्दित होगा.क्या किसी पुस्तकालय से सारिका और धर्म युग पत्रिका का संकलन मिल सकता है .कृप्या अवगत कराये.मेहरबानी होगी. धन्यवाद-
-www.vangmay.com
http://vangmaypatrika.blogspot.com http://dalitank.blogspot.com
http://kabirank.blogspot.com
http://muslimkahanikar.blogspot.com
www.radiosabrang.com
Dr. Firoz Ahmad
Editor- Vangmaya Patrika
B-4, Liberty Homes, Abdullah College Road
Civil Lines, Aligarh, 202002
India ph.no.91 941 227 7331

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विमर्श  

Posted by डा. फीरोज़ अहमद in

फ़ीरोज

हिन्दी साहित्य के वर्तमान परिदृश्य में उपन्यास, कहानी और कविता ही मुख्यधारा में है। इधर जब से दलित विमर्श का हंगामा है तो ‘आत्म चरित' की चर्चा भी छुट-पुट रूप में हो रही है, परन्तु साहित्य की दूसरी विधाओं की चर्चा न के बराबर है। गौरतलब यह है कि साहित्य के प्रभाव की दृष्टि से जो भूमिका मुख्यधारा की विधाओं की है, दूसरी विधाएं उसमें पीछे नहीं। प्रमाण के रूप में हम आत्मकथा की बढ़ी मांग को देख सकते हैं। दलित विमर्श में इसकी बढ़ी हुई अहमियत इस बात को साबित करती है कि दूसरी सभी विधाओं की भी भूमिका वही है जो आत्मकथा की। बस प्रतीक्षा है तो विमर्श और आन्दोलन की। इत्तेफाक से स्त्रीविमर्श के पुराधाओं का ध्यान मुख्य धारा की विधाओं की तरफ से इधर-उधर हुआ ही नहीं।
साक्षात्कार भी उन्हीं गैर अहम्‌ मान ली गयी साहित्यिक विधाओं में ऐसी विधा है जो कि बहुआयामी है। सूचना क्रान्ति ने इसके क्षेत्र को व्यापक और प्रभावशाली बनाया है। समाचार और सूचना प्रेषण के प्रामाणिक स्वरूप के रूप में इसको स्थापित किया है। साहित्य के क्षेत्र में भी इसकी भूमिका का पता इसी तथ्य से चलता है कि साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं ने नियमित रूप से साक्षात्कार का प्रकाशन होता है, परन्तु आश्चर्य तब होता है जब हम देखते हैं कि उपन्यास, कहानी और कविता की भाँति साक्षात्कार को अपेक्षित महत्ता प्राप्त नहीं, इसका आलोचनात्मक अध्ययन तो न के बराबर है यही हाल इसके ऐतिहासिक संदर्भों का भी है। यह अध्यताओं की उपेक्षा का शिकार रहा है। साहित्यिक सन्दर्भों में विद्वानों ने इसके सैद्धान्तिक पहलू पर कम ध्यान दिया है। यद्यपि पाठ्यक्रम में परम्परा पूर्ति के लिए स्नातक और स्नात्‌कोत्तर स्तर पर कहीं न कहीं साहित्यिक विधाओं का एक प्रश्न-पत्ररख दिया जाता है और कर्तव्य की इति मान ली जाती है। छात्रों को इन विधाओं से सम्बन्धित उपयुक्त सामग्री भी नहीं मिल पाती है।
साक्षात्कार के सन्दर्भ में उत्साहजनक तथ्य यह है कि जब से पत्रकारिता के पाठ्यक्रमों की धूम मची है तो पत्रकारिता सम्बन्धी सामग्री की हिन्दी में मार्केट वैल्यू बढ़ी है। धड़ाधड़ विद्वान और व्यावसायिक, दोनों तरह के लोग पुस्तक पर पुस्तक लिखे जा रहे हैं। प्रकाशकों को भी इन पुस्तकों से वित्तीय लाभ हो रहा है। पत्रकारिता सम्बन्धी इन पुस्तकों में छुट-पुट रूप से साक्षात्कार के सैद्धान्ति पक्ष पर प्रकाश डाला जा रहा है, परन्तु यह सारे प्रयास व्यावसायिक आवश्यकता के तहत ही हो रहे हैं।
वाङ्मय अपने सीमित संसाधनों के साथ सीमित समय में चौथे विशेषांक के साथ प्रस्तुत है। सफलता-असफलता की चर्चा को पाठकों पर छोड़ देनी चाहिए इसलिए विद्वजनों से केवल यही निवेदन करना चाहूगा कि जिस प्रकार आरम्भ से वाङ्मय का आग्रह वाद निरपेक्षता का रहा है, उसी क्रम में यह अंक भी प्रस्तुत है। परिणाम के सन्दर्भ में विद्वानों की राय मेरे लिए महत्त्वपूर्ण होगी। पत्रिका के प्रस्तुतिकरण में कितनी सादगी है यह भी निर्धारित पाठकों को ही करना होगा।
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साक्षात्कार की भूमिका  

Posted by डा. फीरोज़ अहमद in

डॉ० मेराज अहमद
बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में सूचना-क्रान्ति ने जनसंचार के क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन उपस्थित किया है। समाज में संचार माध्यम के स्वरूप और महत्त्व की जैसी वैविध्यपूर्ण और प्रभावशाली समाज में भूमिका वर्तमान सन्दर्भों में दिखायी देती है वह कभी-कभी आश्चर्य चकित-सा करने लगती है। यद्यपि संचार माध्यमों की उपस्थिति, प्रयोग और उपयोगिता अत्यन्त प्राचीन है। सदियों से संचार माध्यमों की उपस्थिति भिन्न-भिन्न रूपों में और भिन्न-भिन्न समाजों में रही है, परन्तु वर्तमान में इसका जो बहुआयामी स्वरूप और शक्तिशाली प्रभाव दृष्टिगत हो रहा है, वह निश्चित रूप से अपने पूर्ववर्ती युग से अतुलनीय है।
प्राचीन सभ्यताओं में मिलने वाले भित्ति-चित्राों, शिला-खण्डों, स्तम्भों और मन्दिरों में उत्कीर्ण राजकीय घोषणाओं, नगाड़ों और तुरूही की ध्वनियों में निहित युद्ध घोष के सकेतों एवं वाकया नवीसों द्वारा हस्तलिखित खबरों के द्वारा आरम्भ संचार प्रणाली कबूतरों द्वारा संदेश प्रसारण की यात्राा करते हुए सन्‌ १४५० में जर्मनी के नगर जोहाँसवर्ग में मुद्रण कला के आरम्भ द्वारा रफ्तार पाती बेव पत्रकारिता के उस दौर में पहुँच गयी है जो आश्चर्य उत्पन्न करने के साथ-साथ स्तब्ध भी करती है।
आधुनिक संचार-संसाधनों में सूचना एवं समाचार सम्प्रेषण के जो विविध रूप या विधाएँ प्रभावशाली ढंग से उभरकर आयी हैं, उनमें ‘साक्षात्कार' का उपयोग प्रिंट और इलैक्ट्रॉनिक दोनों माध्यमों में समान रूप से किया जा रहा है। साक्षात्कार कदाचित सूचना एवं समाचार प्रेषण का सबसे प्रामाणिक रूप है। इसका सम्बन्ध सीधे मूल स्रोत से होता है, इसलिए इसकी प्रामाणिकता लगभग असंदिग्ध होती है।
साक्षात्कार शब्द अंग्रेजी भाषा के शब्द ‘इन्टरव्यू' के पर्याय के रूप में ग्रहण किया गया है। ‘हिन्दी विश्वकोश' के भाग २३ में इसका अर्थ भेंट, मुलाकात मिलन१ दिया गया।
विशिष्ट सन्दर्भों में इसका अर्थ भीतर झाँकना या देखना है। वास्तव में साक्षात्कार सत्य के अन्वेक्षण का एक माध्यम है। सत्य समाज का सत्य होता है। समाज की व्यक्तिगत अथवा सामाजिक इकाई के सत्य के गहन अन्वेषण के बाद जब समाचार प्रस्तुत किया जाता है तो, उसमें प्रमाणिकता का वह गुण स्वयं ही आ जाता है जो साक्षात्कार को जीवन्त और प्रभावशाली बनाता है।
साक्षात्कार के लिए बहुत सारे पयार्य का प्रयोग होता है। बातचीत, भेंट, भेटवार्ता, वार्ता, मुलाकात, आमने-सामने और गुफ्तगू इत्यादि शब्द विषय व्यक्ति समाज एवं प्रयोजन आदि की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर संचार के विविध माध्यमों में प्रयुक्त होते हैं, परन्तु इनमें दो पर्याय ही अधिक प्रचलित हैं। ‘इन्टरव्यू' और ‘साक्षात्कार' यद्यपि कुछ लोग हिन्दी में भी ‘इन्टरव्यू' शब्द का प्रयोग करते हैं, परन्तु ‘साक्षात्कार' शब्द हिन्दी भाषा की शब्दावली का है, इसलिए साहित्यिक सन्दर्भ में साक्षात्कार शब्द लगभग स्थापित हो चुका है। यही समीचीन भी है।
माध्यम की बहुलता और विषय-विस्तार के कारण साक्षात्कार को किसी निश्चित परिभाषा में आबद्ध करना आसान नहीं, इसके बावजूद साहित्य मनीषियों और मीडिया विशेषज्ञों ने अपने अनुभव और अध्ययन के आधार पर इसे परिभाषित करने का प्रयास किया है। प्रो० रमेश चन्द्र जैन की पुस्तक ‘प्रिन्ट मीडिया लेखन' में उद्धृत कतिपय परिभाषाएं द्रष्टव्य हैं-२
‘‘इन्टरव्यू से अभिप्राय उस रचना से है, जिसमें लेखक व्यक्ति विशेष से साक्षात्कार करने के बाद प्रायः किसी निश्चित प्रश्नमाला के आधार पर उसके व्यक्तित्व और कृतित्व के सम्बन्ध में प्रामाणिक जानकारी प्राप्त करता है और फिर अपने मन पर पड़े प्रभाव को लिपिबद्ध करता है।'' डॉ० नगेन्द्र
‘‘साक्षात्कार में किसी व्यक्ति से मिलकर किसी विशेष दृष्टि से प्रश्न पूछे जाते हैं।'' डॉ० सत्येन्द्र
‘‘साक्षात्कार में दो व्यक्तियों की रगड़ व टकराहट हो तभी सर्वोत्तम रहता है। प्रश्नकर्ता का निर्जीव व खुशामदी होना अथवा उत्तरदाता का अहंकारी एवं स्वागोपी होना घातक होता है। दोनों व्यक्तियों में अन्तर्व्यथा हो तो दोनों संभोग-सा रस पाते है।'' वीरेन्द्र कुमार गुप्त
उक्त परिभाषाएँ स्पष्ट रूप से साक्षात्कार का स्वरूप निर्दिष्ट करने में सक्षम नहीं हैं। एक में इसके तकनीकी पहलू को अनदेखा किया गया है, दूसरी परिभाषा में दृष्टि सीमित है। अन्य में साक्षात्कारकर्ता और दाता के गुणों के प्रभाव पर विचार किया गया है।
प्रो० रमेश जैन की पुस्तक में ही अर्थाधारित परिभाषाएँ भी प्रस्तुत की गयी है। देखिए-
‘‘श्याम सुन्दरदास द्वारा सम्पादित ‘हिन्दी शब्द सागर' में इन्टरव्यू का अर्थ व्यक्तियों का आपस में मिलना, एक दूसरे का मिलाप, भेंट, मुलाकात, साक्षात, वार्तालाप आपस में विचारों का आदान-प्रदान कहा गया है।''
‘‘मानक हिन्दी अंग्रेज+ी कोश'' में ‘इंटरव्यू' शब्द का अर्थ कुछ इस प्रकार स्पष्ट किया गया है - ‘विचार विनिमय के उद्देश्य से प्रत्यक्ष दर्शन या मिलन, समाचार पत्रके संवाददाता और किसी ऐसे व्यक्ति से भेंट या मुलाकात जिसमें वह वक्तव्य प्राप्त करने के लिए मिलता है। इसमें प्रत्यक्ष लाभ, अभिमुख-संवाद किसी से उसके वक्तव्यों को प्रकाशित करने के विचार से मिला जाता है।'
‘‘प्रमुख कोशकार डॉ० रघुवीर इंटरव्यू के सन्दर्भ में लिखते हैं कि इसका तात्पर्य समक्षकार, समक्ष भेंट, वार्तालाप आपस में मिलना है।''
‘‘आक्सफोर्ड डिक्शनरी (लंदन)'' में किसी बिन्दु विशेष को औपचारिक विचार-विनिमय हेतु प्रत्यक्ष भेंट करने, परस्पर मिलने या विमर्श करने किसी समाचार पत्रप्रतिनिधि द्वारा प्रकाशन हेतु वक्तव्य लेने के लिए किसी से भेंट करके को साक्षात्कार कहा गया है।
अर्थपरक प्रस्तुत अभिव्यक्तियाँ भी वैविध्यपूर्ण हैं, कहीं ध्येय मात्रअर्थाभिव्यक्ति है तो कहीं लक्ष्य का संकेत है। यद्यपि स्वरूप भी निर्दिष्ट हुआ है परन्तु इन समस्त परिभाषाओं और अर्थों से साक्षात्कार का एक निश्चित पारिभाषित स्वरूप उभरकर नहीं आता है।
उपर्युक्त तथ्यों के प्रकाश में कहा जा सकता है कि साक्षात्कार आमने-सामने होकर विचार विनिमय का उद्देश्यपूर्ण साधन है। उद्देश्य का सम्बन्ध बहु आयामी है। इसे रेखांकित अथवा चिन्हित करना विशेष रूप से संचार माध्यम के साक्षात्कार के उपयोग से तो बड़ा दुष्कर है। यही स्थिति साहित्य से जुड़े व्यक्ति के साक्षात्कार के सम्बन्ध में भी सामने आती है।
‘साक्षात्कार' शब्द के विधात्मक स्वरूप के सन्दर्भ में ‘हिन्दी साहित्य का वृहत इतिहास', चतुर्दश भाग में रेखांकित इसकी व्याख्या बड़ी अहम्‌ है। यथा, ‘‘इस शब्द से ऐसी विशिष्ट कोटि की साहित्यिक विधा का बोध होता, जिसमें एक जिज्ञासु व्यक्ति जीवन के किसी क्षेत्र में विद्यमान किसी विशिष्ट व्यक्ति से मिलकर उसके विषय में सीधी जानकारी प्राप्त करता है।''३ लेकिन संचार माध्यम की बढ़ती संख्या और सूचना तकनीकि दिन पर दिन होती उन्नति ने साक्षात्कार सम्बन्धी स्थापित प्राचीन मापदण्डों को बदल दिया है। समाचार प्रेषण की दृष्टि से अब कभी-कभी अति साधारण विशिष्ट की श्रेणी में आ जाते हैं। व्यक्ति के बजाय घटनाएँ महत्त्वपूर्ण होकर विशिष्टता को निर्धारित करती हैं। इस तरह व्यक्ति की विशिष्टता के मायने बदल गये हैं। तकनीकि पहलू का दखल और उसके विस्तार के कारण साक्षात्कार के लिए साक्षात्कारकर्ता और दाता को आमने-सामने रहने की बाध्यता समाप्त हो गयी है।
पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति में व्यक्ति स्वातंत्रय को प्राप्त हुई महत्ता के समानान्तर ‘साक्षात्कार' विधा का उद्भव उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में पश्चिमी देशों में हुआ। साहित्य की अन्य आधुनिक विधाओं की भाँति साक्षात्कार विधा भी हिन्दी-भाषा साहित्य में पाश्चात्य सभ्यता और साहित्य के प्रभाव स्वरूप आयी। इसको प्रतिष्ठा स्वतंत्राता के बाद ही प्राप्त हुई, यद्यपि आरम्भ के सन्दर्भ में पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी द्वारा ‘विशाल भारत' में सन्‌ १९३१ में प्रस्तुत ‘रत्नाकर जी से बातचीत' शीर्षक से माना जाता है। पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी द्वारा किया गया दूसरा साक्षात्कार सन्‌ १९३२ में प्रकाशित हुआ इसका शीर्षक था, ‘प्रेमचन्द जी के साथ दो दिन।४
हिन्दी भाषा साहित्य में साक्षात्कार को विधा के रूप में स्थापित करने में पत्रा-पत्रिकाओं की बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है, यद्यपि कई एक साक्षात्कार पुस्तकाकार रूप में भी उपलब्ध हैं। साक्षात्कार सम्बन्धी अधिकांश पुस्तकें साक्षात्कारों का संकलन हैं। इसमें कुछ अलग-अलग व्यक्तियों के अलग-अलग लोगों द्वारा लिए गये साक्षात्कारों पर आधारित हैं, तो कुछ अलग-अलग लोगों द्वारा एक ही व्यक्ति के साक्षात्कारों पर आधारित संकलन हैं। कतिपय संकलन में एक व्यक्ति द्वारा अलग-अलग लोगों के साक्षात्कार प्रस्तुत किए गये हैं। कुछ एक पुस्तकें एक व्यक्ति द्वारा एक ही व्यक्ति के साक्षात्कार की वृहत प्रस्तुति के रूप में भी मिलती हैं।
साक्षात्कार की भूमिका प्रस्तुत करते समय साहित्यिक विधा के रूप में साक्षात्कार के अन्तर्सम्बन्धों का विवेचन विश्लेषण भी आवश्यक है। आधुनिक हिन्दी साहित्य में नाटक, उपन्यास, कहानी, निबन्ध जैसी व्यापक धरातल पर प्रतिष्ठित विधाओं के साथ-साथ संस्मरण, रेखाचित्रा, जीवनी और आत्मकथा, साक्षात्कार, फीचर, रिपोर्ताज और कोलाज इत्यादि अन्य विधाओं का भी समय-समय पर प्रवेश हुआ। इसमें संस्मरण, रेखाचित्रा, जीवनी और आत्मकथा ने अपनी विशिष्ट स्थिति बना ली, जबकि फीचर, रिपोर्ताज कोलाज की पैठ बहुत प्रभावशाली ढंग से नहीं बन पायी। इन विधाओं की महत्ता समाचार और सूचना के सन्दर्भ में ही अधिक प्रभावशाली प्रतीत होती है। साक्षात्कार की स्थिति दोनों वर्ग की विधाओं से भिन्न हैं। अपने जन्मकाल से वर्तमान तक संख्या की दृष्टि से इसकी स्थिति दूसरे वर्ग की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली है और क्षेत्र विस्तार भी तीव्र है। बड़े प्रकाशन समूह इस पर यथेष्ट ध्यान दे रहे हैं और इधर काफी संकलन आ रहे हैं। छोटी-बड़ी, सभी साहित्यिक पत्रिकाओं में लगभग नियमित रूप से साक्षात्कार प्रकाशित किये जाते हैं। गौरतलब यह भी है कि सूचना सम्प्रेषण की दृष्टि से सक्रिय न केवल प्रिन्ट माध्यम बल्कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम में भी साक्षात्कार का एक प्रमुख औज+ार के रूप में अत्याधिक मात्राा में प्रयोग किया जा रहा है इसलिए साक्षात्कार को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। प्रश्न अभी कदाचित अनुत्तरित ही है कि साक्षात्कार की मुख्य भूमिका को किस रूप में देखा जाय? साहित्य की स्वतंत्रविधा के रूप में अथवा समाचार प्रेषण के माध्यम के रूप में सूचना देने के लिए संचार की विशिष्ट संरचना के तौर पर?
वस्तुतः इस संदर्भ में सर्वप्रथम साहित्य और समाचार के अन्तर को देखना होगा। यद्यपि विज्ञान विषय की भाँति मानविकी से सम्बन्धित विषय को परिभाषित करना और सीमाबद्ध रूप से व्याख्यायित करना मुश्किल काम है, दरअसल यही तो इसका महत्त्वपूर्ण गुण है, फिर भी समाचार के समानान्तर रखकर खींच-तानकर कहा जा सकता है कि साहित्य का सम्बन्ध समझ से होता है, जबकि समाचार का ज्ञान से। बड़ी अहम्‌ बात यह है कि साहित्य का प्रभाव स्थायी होता है। समाचार का तात्कालिक। जब तक समाचार केवल प्रिन्ट मीडिया का प्रस्तुतीकरण था तब तक स्थायित्व की दृष्टि से उसकी स्थिति फिर भी बेहतर थी, परन्तु इलेक्ट्रॉनिक माध्यम ने इसे उत्तेजना और ‘सनसनी' फैलाने के कारक के रूप में तब्दील कर दिया है। यह सच्चायी सर्व विदित है।
स्पष्ट है कि जब साक्षात्कार समाचार सूचना प्रेषण की भूमिका में होता है तो साहित्यक विधा के रूप में उसकी गणना नहीं की जा सकती है, परन्तु सूचना और सम्प्रेषण के दूसरी संरचना की अपेक्षा इसका व्यापक फलक विशुद्ध सूचना प्रेषण का माध्यम होने से बचाता है। यही व्यापकता इसे साहित्य की विधा के निकट ला देती है। बातचीत में नाटकीयता निहित होती है। जब साक्षात्कारकर्ता साक्षात्कार के स्थान, वातावरण और उसकी बाह्यकृति का वर्णन करता है तो यह निबन्धात्मक हो जाता है। साक्षात्कारदाता के व्यक्तित्व का वर्णन और साक्षात्कार के समय की साक्षात्कर्ता की अनुभूमि के आधार पर उसका चित्राांकन साक्षात्कार में रेखाचित्रका रंग भर देता है। साक्षात्कारदाता जब नेस्टॉल्जिक होकर अपने अतीत में पहुँच जाता है, ऐसे क्षणों में उसकी स्वीकारोक्तियाँ और उद्गार संस्मरण का आभास कराते हैं। अपने बारे में साक्षात्कारदाता का दिया बयान साक्षात्कार को आत्मकथा और जीवनी के तत्त्वों के निकट ले जाता है। विशेष रूप से साहित्यिक व्यक्ति के साक्षात्कार में साक्षात्कारदाता एवं कर्ता दोनों तरफ से व्यक्ति कृति और कृत्य की आलोचना न हो ऐसा लगभग असंभव है।५
इधर जब से विश्वविद्यालयी स्तर पर पत्रकारिता के अध्ययन-अध्यापन का महत्त्व बढ़ा है, साथ में संचार माध्यमों का द्रुत गति से विस्तार हुआ है, साक्षात्कार के विभिन्न रूप और प्रविधि पर काफी विचार हो रहा है। ‘हिन्दी साहित्य का वृहत इतिहास' में इसके तीन भिन्न स्वरूप का उल्लेख किया गया है। पहले स्वरूप के अन्तर्गत प्रसिद्ध लेखकों के पास प्रश्नावली भेजकर उसका उत्तर लिया जाता है। जिससे साक्षात्कार लेना है उससे मिलकर बातचीत के माध्यम से उसके विचार और मान्यताएँ प्राप्त करने को दूसरे प्रकार के साक्षात्कार के रूप में रेखांकित किया गया है। काल्पनिक साक्षात्कार का उल्लेख तीसरे स्वरूप के सन्दर्भ में किया गया है।६ कमोवेश तीनों प्रकार के साक्षात्कार वर्तमान में भी अपनी उपस्थित बनाए हुए हैं, परन्तु तकनीकी विकास ने साक्षात्कार को विभिन्न रूपों के धरातल पर भी काफी हद तक प्रभावित किया है। पत्रके माध्यम से प्रश्नावली भेजकर साक्षात्कार की प्रविधि यद्यपि अभी विद्यमान है, लेकिन इसके कई और विकल्प भी सामने आये हैं। टेलीफोन के माध्यम से दूरस्थ व्यक्ति का साक्षात्कार सहजता से किया जा सकता है। इसमें रिकार्डिंग की सुविधा के कारण इसे कागज पर उतारने में भी सहजता होती है। नेट पर चैटिंग के माध्यम से लिए गये साक्षात्कार की परम्परा आरम्भ हो गयी। आमने-सामने होकर साक्षात्कार सम्पन्न करने की प्रविधि अपनी महत्ता की दृष्टि से भूत और वर्तमान दोनों में ही समान है। यही सबसे अधिक प्रचलित भी है परन्तु तकनीकी के विकास ने इसे और भी सहज बना दिया है। प्रश्नकर्ता द्वारा उत्तर कागज पर नोट करने के बजाय अब टेपरिकार्डर में रिकार्ड करके सुविधानुसार संक्षिप्त और संशोधित करके प्रस्तुत किया जाता है। इसमें साक्षात्कर्ता को तो आसानी होती ही है, साक्षात्कारदाता भी अपनी बात को नोट किये जाते समय बार-बार खड़े होने वाले व्यवधान से बच जाता है। मूवी कैमरे के सामने प्रस्तुत साक्षात्कार भी तकनीकी विकास का ही परिणाम है।
तीसरे स्वरूप में कोई विशिष्ट परिवर्तन नहीं हुआ है। दरअसल यह साक्षात्कार के व्यावहारिक स्वरूप से सम्बन्धित नहीं। इस प्रकार का साक्षात्कार वस्तुतः शैली के लिए प्रयुक्त होता है। इसे माध्यम बनाकर किसी रचनाकार को प्रेषणीय बनाया जाता है। आलोचना प्रस्तुत की जाती है। वर्तमान में कुछ एक साक्षात्कार ऐसे आये हैं जिनके माध्यम से जीवनी प्रस्तुत की गयी है। तकनीकी विषय के सन्दर्भ में विशेषज्ञों की प्रस्तुति के लिए भी इसे माध्यम के लिए प्रयोग में लाया जा रहा है। पुन्य प्रसून वाजपेयी की पुस्तक ‘ब्रेकिंग न्यूज+' और असगर वजाहत की ‘पटकथा लेखन' से सम्बन्धित एवं डॉ. भरत सिंह की रामविलास शर्मा पर आधारित ‘गोदारण' पुस्तक इस सन्दर्भ में उल्लेखनीय है।
साक्षात्कार को समय-समय पर वर्गीकृत किया जाता रहा है विशेष रूप से जनसंचार एवं सूचना तकनीकी कि लिए शुरू हुए पाठ्यक्रम को आधार बनाकर लिखी जाने वाली पुस्तकों में विद्वानों ने इसे तरह-तरह से वर्गीकृत करने का प्रयास किया है। साक्षात्कार विधा के प्रमुख विद्वान विष्णु पंकज ने जन संचार माध्यमों के परिप्रेक्ष्य में साक्षात्कार के विषय, स्वरूप शैली साक्षात्कारकर्ता, बात...सम्पर्क इत्यादि को आधार बनाकर इसे वर्गीकृत किया है। ‘हिन्दी साहित्य का वृहत इतिहास' में वास्तविक और काल्पनिक साक्षात्कार कहा गया है।
साक्षात्कार की प्रविधि पर चर्चा करने से पहले आवश्यक यह कि स्पष्ट कर दिया जाय कि साक्षात्कार चाहे साहित्यिक हो या व्यावसायिक, कमोवेश एक जैसी प्रविधि ही प्रयुक्त होती है। थोड़ा-बहुत अन्तर यदि दृष्टिगत होता है तो उसका कारण उद्देश्य में अन्तर होता है।
साक्षात्कारकर्ता और साक्षात्कारदाता के मध्य परस्पर अन्तरवैयक्तिक सम्बन्ध स्थापित हो जाता है, इसलिए साक्षात्कारकर्ता का व्यक्तित्व अध्ययन बड़ा अहम्‌ होता है। जिस किसी का साक्षात्कार लेना है, तैयारी के रूप में जितना संभव हो सके दाता के व्यक्तित्व एवं उसके सृजन की जानकारी हासिल करके ही उसके सामने जाना चाहिए। साक्षात्कारकर्ता में दूरदर्शिता का गुण उत्तरदाता के मन को समझने में सहायता पहुंचाने के साथ-साथ पूरक-प्रश्न करने में भी सहायक होता है। संवेदनशीलता भी ऐसा गुण है जो साक्षात्कारकर्ता में यदि है तो साक्षात्कार की प्रक्रिया सहज हो जाती है। संवेदनशील व्यक्तित्व के कारण साक्षात्कर्ता दाता की कायिक भाषा को समझकर उसके शब्दों को सम्पूर्णता में ग्रहण करने क्षमता हो जाती है। साक्षात्कारकर्ता का साधारण व्यवहार साक्षात्कार के समय महत्त्वपूर्ण होता है। मुखाकृति तनाव रहित हो। साक्षात्कारदाता की बातों को आत्मीयता के भाव से सुनते हुए उसमें रुचि प्रदर्शित करे, बहस-मुबाहसे बचे तो निश्चित रूप से साक्षात्कर्ता को अपना लक्ष्य प्राप्त करने में आसानी होती है।
साक्षात्कार के लिए पहले से यदि प्रश्नावली तैयार कर ली जाय तो साक्षात्कार लेना सुविधाजनक हो जाता है। तिथि एवं समय का निर्धारण साक्षात्कार के लिए महत्त्वपूर्ण होता है। स्वीकृति मिल जाने के बाद भी साक्षात्कारकर्ता को चाहिए कि वह तिथि और समय सुनिश्चित कर ले साथ ही जाने से पहले टेपरिकार्ड की अच्छी तरह जाँच-परख कर ली जाय तो यान्त्रिाक अवरोध की संभावना नहीं होती है। उल्लेखनीय यह है कि कभी-कभी भावुकतावश या किसी विशिष्ट प्रसंग में साक्षात्कारदाता ऐसी बात कर सकता है, प्रत्यक्ष में जिसकी स्वीकृति में उसे हिचकिचाहट हो सकती है, ऐसी बातों को ‘ऑफ द रिकार्ड' मानकर उसे लोगों तक पहुँचाते समय साक्षात्कार में शामिल नहीं करना चाहिए। यदि उसे सार्वजनिक करने की आवश्यकता होती है तो चाहिए कि दाता की सहमति लेकर ही उसे लोगों तक पहुँचाए साक्षात्कारकर्ता को चाहिए कि वह साक्षात्कार के समय तटस्थ होकर विचार विनिमय का प्रयत्न करे। ऐसे में वह साक्षात्कर्ता मनचाही जानकारी ले सकता है।
साक्षात्कार की प्रविधि पर भी, जैसा कि पहले ही संकेत किया जा चुका है कि इधर काफी विस्तार से चर्चा की जा रही है, यहां यह भी कहना आवश्यक है कि संचार माध्यमों में समाचार एवं सूचना प्रेषण की दृष्टि से साक्षात्कार दूसरे रूपों की अपेक्षा प्रामाणिकता के लिहाज से अधिक विश्वसनीय माध्यम है, तो ऐसे में नित्य-प्रतिदिन इसमें नयी-नयी तकनीकी का प्रयोग होता ही रहता है, इस संदर्भ में होने वाले हर प्रयोग को संज्ञान में लेकर समय-समय पर उसका उल्लेख विद्वान करते भी रहते हैं। उपर्युक्त तथ्यों को ध्यान रखते हुए किसी का भी साक्षात्कार प्रस्तुत किया जा सकता है।

सन्दर्भ -
१. हिन्दी विश्वकोश, सं० श्री नगेन्द्रनाथ वसु, बी०आर० पब्लिशिंग कॉर्पोरेशन, दिल्ली, सन्‌ १९८६, पृ० ७३६
२. प्रिन्टमीडिया लेखन, प्रो. रमेश कुमार जैन, मंगलदीप पब्लिकेशन्स, जयपुर, सन्‌ २००४, पृ० ८३
३. हिन्दी साहित्य का बृहत इतिहास (त्रयोदश भाग) सं० लक्ष्मीनारायण सुधाशु, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, संवत्‌ २०२२ वि० पृ० १२९
४. वही, पृ० १२९
५. प्रिण्ट मीडिया, प्रो. रमेश जैन, पृ० ८८
६. हिन्दी साहित्य का वृहत इतिहास (त्रायोदश भाग) सं० लक्ष्मी नारायण सुधांशु, पृ० १२९
- शिव कुमार मिश्र
मीरा प्रेम और भक्ति की तन्मय गायिका के रूप में ख्यात और मान्य हैं। वे श्रीकृष्ण की प्रेमिका भी हैं, और उनकी भक्त भी। ऐसी प्रसिद्धि है कि उन्होंने बचपन में ही श्रीकृष्ण को अमें बँधी या बाँधी गईं, पति-गृह में वे श्रीकृष्ण की प्रतिमा के साथ आईं और भोजराज की विवाहिता होते हुए भी वे मन में श्रीकृष्ण को ही पति मानती रहीं, उन्हीं के प्रति समर्पित रहीं। मीरा के जीवन को लेकर कुछ विवाद भी हैं। एक मत है कि मीरा का भोजराज के साथ वैवाहिक जीवन बड़ी अल्प अवधि का रहा। भोजराज की असमय में मृत्यु हुई और मीरा कम उम्र में ही विधवा हो गई। अन्य मत है कि मीरा विधवा नहीं हुईं क्योंकि कहीं भी उन्होंने अपने विधवा होने का साक्ष्य अपने रचे गए पदों में नहीं दिया है। इसी तरह मीरा के जीवन को लेकर कुछ अन्य बातों में भी मतभेद और विवाद है। जो पक्ष मीरा के वैधव्य को नहीं मानता उसके अनुसार अपने आक्रांता के रूप में मीरा ने अपने पदों में जिस राणा का उल्लेख बार-बार किया है, वे और कोई नहीं, उनके पति भोजराज थे, जो मीरा की श्रीकृष्ण भक्ति, मीरा द्वारा पति-रूप में उनकी स्वीकृति, साज-सिंगार करके श्रीकृष्ण को रिझाने और उनकी प्रतिमा के समक्ष पग में घुँघरू बाँधकर उनके नाचने-गाने, साधु-संगति करने आदि-आदि बातों से बेहद असंतुष्ट और क्षुब्ध थे। सामाजिक विधि-निषेधों, राजकुल की मर्यादाओं की मीरा द्वारा की गई अवमानना तथा मीरा के अपना मनोवांछित जीवन जीने के हठ के चलते-यही भोजराज थे, जिन्होंने मीरा को यातनाएँ दीं, उन्हें प्रताड़ित किया और अंततः मीरा को राजमहल का त्याग करना पड़ा।
जो पक्ष मीरा के अकाल-वैधव्य को मानता है, उसके अनुसार भोजराज जब तक जीवित रहे, मीरा को उन्होंने समझाया-बुझाया जरूर, परन्तु जब वे नहीं मानीं, वे उदासीन हो गए और मीरा के क्रिया-कलाप चलते रहे। उनकी मृत्यु के बाद, मीरा को जो यातनाएँ मिलीं - वे यातनाएँ उन्हें, देवर राणा विक्रमादित्त्य ने दीं और मीरा अपने पदों में जिस राणा का उल्लेख करती हैं, वे भोजराज नहीं, उनके छोटे भाई अर्थात्‌ मीरा के देवर राणा विक्रमादित्य हैं।
राणा विक्रमादित्त्य इस कारण भी क्षुब्ध थे कि पति की मृत्यु के उपरांत वंश-कुल की परम्परा के अनुसार मीरा पति के साथ सती नहीं हुईं। विधवा के वेश के बजाए सधवा के रूप में साज-सिंगार करती रहीं, नाचती-गाती रहीं। यह कहते हुए कि उनके पति श्रीकृष्ण तो अविनाशी हैं, मर ही नहीं सकते। अपने को उन्होंने विधवा माना ही नहीं। देवर की यातनाओं से परेशान होकर अंततः मीरा ने राजमहल का परित्याग कर दिया।
संप्रति, हमारी रुचि, मीरा के जीवन को लेकर उनके वैधव्य को लेकर जो विवाद है, उसकी तफसील में जाने की नहीं है। हमारा सवाल, या कहें, हमारी जिज्ञासा दूसरी हैं।
राणा भोजराज हों अथवा राणा विक्रमादित्त्य, यदि श्रीकृष्ण के प्रति मीरा के प्रेम या भक्ति-भाव को, या श्रीकृष्ण को पति मानने की मीरा की बात को, मीरा के चाहे अनुसार, राज परिवार की, लोक की, सगे-संबंधियों की स्वीकृति मिल गई होती या वे सब मीरा के क्रिया-कलापों के प्रति तटस्थ या उदासीन हो गए होते, और मीरा बाधा-रहित श्रीकृष्ण के प्रति अपनी मनोभावनाओं को अभिव्यक्त कर पातीं, तब क्या जिस रूप में आज हम मीरा का स्मरण कर रहे हैं, उसी रूप में मीरा को याद करते? या कि जिस तरह आज, मीरा के समय में पाँच सौ सालों बाद, मीरा को - नई सदी के मुख्य विमर्शों में एक-स्त्री-विमर्श से जोड़कर देख रहे हैं, उन्हें अपना समकालीन मान रहे हैं वैसा समकालीन उन्हें मानते? शायद नहीं। अधिक से अधिक, ऐसी स्थिति में हम मीरा का स्मरण, उनके महत्त्व का आंकलन
उसी तरह करते, मीरा हमें उसी तरह स्मरणीय होतीं जैसे विद्यापति, सूरदास, जयदेव आदि आज हमारे लिए हैं।
जाहिर है कि मीरा श्रीकृष्ण से अपने संबंधों, उनके प्रति अपने प्रेम या भक्ति के नाते हमारी समकालीन नहीं हैं, उनके समकालीन होने का संदर्भ दूसरा है। स्त्री-विमर्श में भी मीरा की भागीदारी का सबब उनकी भक्ति या प्रेम नहीं, उनसे जुड़ी कुछ दूसरी बातें हैं।
वस्तुतः मीरा हमारी समकालीन है और चल रहे स्त्री-विमर्श की भागीदार हैं - अपने उस प्रतिरोध तथा विद्रोह के नाते, जो उन्होंने अपने ऊपर लगाई गई पाबंदियों के खिलाफ किया। वे स्त्री-विमर्श में इसलिए हमारे साथ हैं कि सामंती जकड़बंदी के बीच आपकी प्रेम-पिपासा की उन्होंने निष्कुंठ अभिव्यक्ति की। उनके विद्रोह का संबंध है लोक, राज परिवार तथा संबंधियों द्वारा उन्हें दी गई यातना से उन पर थोपी गई पाबंदियों से जिन्हें मीरा ने अमान्य किया। यहाँ तक कि राजभवन को लात मारकर वे उससे बाहर आ गईं।
लोक, समाज, राज परिवार आदि ने मीरा के प्रति जो क्रूरता बरती, उसके मूल में है - धर्मशास्त्र-आधारित सामाजिक सोच और वह सामाजिक संरचना जिसके तहत जीवन-व्यवहार, मर्यादाओं तथा कर्त्तव्यों के नाम पर स्त्री के लिए एक नरक रचा गया है। थोड़े-से सुभाषितों की आड़ में आजन्म, पराधीनता के एक नियति उसे दी गई है। स्त्री के वजूद को पूरी तरह नकारा गया है। उसे तरह-तरह की जंजीरों में बाँधा गया है।
मीरा ने साहस के साथ इस नरक का प्रतिकार किया, पाबंदियों के खिलाफ बगावत की और व्यवस्था के प्रभुओं के इरादों का पर्दाफाश किया। अपने आक्रांताओं को उन्होंने पूरे मन से धिक्कारा। उसका नाम ले-लेकर उसे सबके सामने उजागर किया। उस समाज को भी मीरा ने लानत दी जिसने उन्हें बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मीरा के पद साक्ष्य हैं कि कितनी कठोर यातनाओं से होकर उन्हें गुजरना पड़ा है।
हेली म्हासूं हरि बिन रह्यो न जाइ।
सास लड़े मेरी, ननद खिजावै, राणा रह्या रिसाइ।
पहरो भी राख्यो, चौकी बिठारयो, ताला दियो जड़ाय।
पूर्वजन्म की प्रीत पुराणी, सो क्यूं छोड़ी जाए।
ढेरों पद इसी तरह के हैं जिनमें विष का प्याला मंजने, पिटारी में सांप भेजने तथा यातना के दूसरे तरीकों का जिक्र मीरा ने किया है। समझा जा सकता है कि अपने आक्रान्ताओं के प्रति मीरा में कितनी घृणा, कड़वाहट तथा रोष है।
संत या भक्त के मन को निर्मल कहा गया है - व्यक्तिगत्‌ राग-द्वेष से परे, उदार और क्षमाशील। मीरा की मनोभूमि ऐसी नहीं है। वे न तो अपने आक्रान्ताओं को जिन्दगी की आख़िरी सांस तक भूल पाई हैं और ना ही क्षमा कर पाई हैं। उनके प्रति उनकी घृणा रह-रहकर और भभकती रही है। फिर भी, मीरा संत और भक्त के रूप में मान्य हैं। निश्चय ही, संत और भक्त तो वे हैं, परन्तु इनके साथ-साथ एक औरत होने का एहसास भी उनमें बराबर रहा है। उनके पदों में संत और भक्त होने के साथ उनके औरत होने-लाचार और निरीह औरत होने की पहचान भी जुड़ी हुई है। वस्तुतः

औरत होने का यह एहसास ही मीरा को हमारे समय के स्त्री-विमर्श से जोड़ता है। यह औरत मीरा में बराबर जि+न्दा रही है। मीरा ने उसे विचार के स्तर पर और संस्कार के स्तर पर अपने में, शिद्दत से जिलाए रखा है। जितना सच मीरा का संत या भक्त होना है?, उनका औरत होना भी उतना ही बड़ा सच है।
इस बिन्दु पर सहज ही एक जिज्ञासा होती है। हम कह चुके हैं कि अपने समय में मीरा की अपने ऊपर थोपी गई पाबंदियों के खिलाफ बगावत, वंश, कुल की मर्यादा को अमान्य कर पति की मृत्यु पर उनका सती न होना, सधवा
की तरह सज-सँवर कर अपने प्रियतम्‌ श्रीकृष्ण के समक्ष नाचना-गाना-साहस का, जोखिम का काम था, जिसे मीरा ने जोखिम उठाकर किया - परन्तु पदों का साक्ष्य देखें तो मीरा का यह विद्रोह - उनका निजी व्यक्तिगत्‌ विद्रोह ही अधिक लगता है। वह व्यंजक हैं, परन्तु है वह व्यक्तिगत्‌ विद्रोह ही। हमें मीरा के ऐसे पद नहीं मिलते जिनमें उनका यह विद्रोह उनके ‘स्व' से आगे जाकर स्त्री-जाति की यातना और मीरा - जैसी उसकी मनोकांक्षा से जुड़ा हो। बंधनों से अपनी ‘मुक्ति' का आग्रह मीरा में है - उस मुक्ति की आकांक्षा के तार- स्त्री - जाति की वैसी ही मुक्ति से सीधे नहीं जुड़ते। हम उन्हें स्त्री-जाति की मुक्ति-पराधीनता से मुक्ति से ज+रूर जोड़ते हैं परन्तु मीरा की मनोभूमि में भी उनकी अपनी ‘मुक्ति' के साथ स्त्री-जाति की मुक्ति की भी चिन्ता या उससे उनकी संलग्नता थी या नहीं थी। इस विषय में जिज्ञासा बनी रहती है, मीरा की पदावली, जितनी और जो भी हैं पूरी तरह प्रामाणिक रही हैं। जिज्ञासा होती है कि अपनी यातना, अपनी बेबसी, अपनी मुक्ति के साथ मीरा को क्या कभी- स्त्री-जाति की यातना, पराधीनता या मुक्ति की आकांक्षा की बात याद आई?
मीरा के संदर्भ में इस तरह की जिज्ञासा स्वाभाविक है। मीरा का खुद औरत होना, उनका स्वतः यातना भोगना हमारी जिज्ञासा को एक आधार देता है।
हमारा वाङ्मय गवाह है कि स्त्री के बारे में मीरा के पहले जो कुछ लिखा गया उसे लिखने वाले पुरुष थे - वे वाल्मीकि, वेद व्यास, कालिदास, भवभूति, कोई भी हों। उनकी रचनाओं में स्त्री के ख्यात स्त्रियों के - सीता, द्रौपदी, शकुन्तला आदि के जो भी बिम्ब उभरे हैं, उन पुरुष-रचनाकारों द्वारा निर्मित बिम्ब हैं। स्त्री उनकी रचनाओं में उनकी संवेदना, सहानुभूति, सब कुछ पा सकी है, परन्तु अंततः वह आर्यशास्त्रानुमोदित नियमों-मर्यादाओं के दायरे में ही बाँधी गई है। उस सामाजिक संरचना का उन पुरुषों द्वारा समर्थन ही है, जिसमें स्त्री के लिए-मुक्ति की बात को अमान्य किया गया है। वाल्मीकि की ‘रामायण' देखें, या व्यास की ‘महाभारत' - यातना के कठिन दौरों से गुज+रकर भी सीता-द्रौपदी तथा दूसरी नारियाँ जन्म-जन्म में उन्हीं पतियों को पाने की आकांक्षा रखती हैं उन्हें ही परमेश्वर मानती हैं, जिनके द्वारा वे यातनाग्रस्त हुई हैं। कहा जा सकता है कि चूँकि ये पुरुषों द्वारा रचित कृतियाँ हैं उनके पुरुष मानस से स्त्री के ऐसे ही बिम्ब सामने आ सकते थे, जो उनके मन के अनुरूप हों, जैसा कि वे आए भी हैं।
परन्तु मीरा के यहाँ, मीरा के नाम पर जो कुछ संकलित है, वह मीरा का अपना रचा और गाया हुआ है। वह पुरुष की रचना न होकर एक स्त्री की रचना है, पहली बार एक स्त्री की रचना और उस स्त्री की रचना - जो महज रचनाकार नहीं, भोक्ता भी है। उसने जो कुछ रचा-गाया है, अपने भोगे हुए को, सहन किए हुए को। ऐसी स्थिति में ही हमारी जिज्ञासा को आधार मिलता है कि क्या अपने जिए भोगे को गाते-अभिव्यक्त करते हुए मीरा को, रचनाकार मीरा को, अपने साथ-साथ स्त्री-जाति का दुख, उसकी पराधीनता, उसके द्वारा भोगा और सहा जाना तथा जिन बंधनों में स्त्री जकड़ी है, उनसे स्त्री-जाति की मुक्ति की आकांक्षा की कभी याद आई है? अपनी यातना में मुक्ति की अपनी आकांक्षा में क्या वे स्त्री-जाति की यातना, मुक्ति की उसकी आकांक्षा को भी देख सकीं? अपनी यातना को क्या स्त्री-जाति की वृहत्तर यातना से वे जोड़ सकी है? जिज्ञासा इसलिए ताकि मीरा को हम समग्रता में जान सकें।
इसी से जुड़ी हुई एक जिज्ञासा और भी। मीरा के पद-उनकी दो तरह की जीवन-स्थितियों में रचे गाए गए पद हैं, एक जब वे राजमहल की चहार दीवारी के भीतर बंधन की स्थितियों में रच और गा रही थीं। दूसरे राजमहल छोड़ देने के बाद से द्वारका तक मृत्यु पर्यन्त उनके द्वारा रचे और गाए गए पद - कब वे अपेक्षाकृत मुक्त, बंधनों की जड़ से बाहर आ गई थीं। कहते हैं - राजमहल छोड़ देने के बाद भी राज परिवार ने मीरा पर सदैव दबाव बनाए रखा। उन्हें चैन से नहीं रहने दिया। कहा तो यहाँ तक गया है और जो संभावित भी है कि द्वारका में कृष्ण की मूर्ति के आगे मीरा के अंतर्धान हो जाने की कथा, सिर्फ कथा ही है। वस्तुतः मीरा की वह हत्या थी। वास्तविकता जो भी हो, राजमहल के बाहर आकर मीरा अपेक्षाकृत अपनी मनोकांक्षित जमीन पर आ गई थीं। जिज्ञासा है कि क्या दो जीवन स्थितियों में लिखे रचे गए इन पदों की अलग से शिनाख्त की गई है - ताकि दोनों को समानान्तर रखकर जाना जा सके कि भिन्न जीवन स्थितियों में रचे गाए गए इन पदों में क्या मीरा की मनोभूमि में कुछ अंतर दिखाई पड़ता है? राजमहल से बाहर आकर क्या वे श्रीकृष्ण के प्रेमभाव में ही डूबकर रह गईं अथवा अपनी मनोकांक्षित जमीन पा जाने के बाद उन्हें स्त्री-जाति की यातना भी याद आई? क्या उन्होंने पुरुष वर्चस्व वाले समाज के समक्ष वैसे ही कुछ सवाल खड़े किए जैसे तब खड़े किए थे - जब वे बंधन में थीं?
इन जिज्ञासाओं के मूल में हमारा आशय महज इतना मानना ही है कि क्या मीरा की यातना, उनका विद्रोह, पराधीनता की नियति से मुक्त होने की उनकी इच्छा, उनकी तड़प, स्त्री- जाति की वैसी ही यातना, पराधीनता या मुक्ति की आकांक्षा से जुड़ती हैं - खासतौर से मीरा की अपनी पहल पर?
हम जानते हैं कि मीरा घर-परिवार से जुड़ी हुई स्त्री थीं, विवाह के पहले भी और विवाह के बाद भी। श्रीकृष्ण के पति उनके एकल प्रेमभाव और भक्ति से भी हम परिचित हैं। हम उस समय को ही पहचानते-जानते हैं जिसे मीरा जी रही थीं। उस समय की स्थितियों से भी हम अनभिज्ञ नहीं है। हमें ज्ञात है कि मीरा या उस समय के कोई भी संत या भक्त, हमारे अपने समाज की तरह की कोई सामाजिक कार्यकर्ता नहीं थे, ना ही मीरा स्त्री-मुक्ति की कोई ।बजपअपेज थीं, जो स्त्री-जाति की मुक्ति का कोई आन्दोलन छेड़तीं और उनका नेतृत्व करतीं। अपने समय की स्थितियों में खींचकर हम मीरा को अपनी मनोभूमि के अनुरूप ढालने का प्रयास भी नहीं कर रहे। मीरा के अपने समय में जो नामुमकिन था, उसकी कसौटी पर हम मीरा को नहीं परखना चाहते।
हम बस इतना जानना चाहते हैं कि एक स्त्री होने के नाते, अपने कहे-लिखे-गाए गए में क्या मीरा ने ऐसा ही कुछ लिखा जो उनकी अपनी निजी यातना या आकांक्षा से आगे स्त्री जाति की यातना और आकांक्षा से भी जुड़ सका हो, एक वृहत्तर इयत्ता पा सका हो। यदि मीरा के ऐसे पद हमें मिलें तो मीरा के महत्त्व का संदर्भ भी बड़ा हो जाता है। मीरा की समकालीनता तो गाढ़ी होती ही है - मीरा अपने समय-संदर्भ से हमारे समय संदर्भ तक अंधकार में एक प्रखर ज्योति रेखा की तरह भास्वर हो उठती हैं।
एक अंतिम और जरूरी बात और।
जिस भेदभावपूर्ण सामाजिक संरचना के तहत अपने समय में मीरा ने बहुत कुछ सहा और भोगा - तमाम प्रतिरोधों के बावजूद वह सामाजिक संरचना न केवल बरकरार है, पहले से भी अधिक पीड़क हुई है। व्यवस्था के पंजे और मजबूत हुए हैं और उसके नाखून और दाँत और भी पैने। यह पहले से अधिक शातिर भी हुई है।
कबीर हों, मीरा हों, प्रतिरोध सबने किया परन्तु कुछ भी इसलिए नहीं बदला कि मात्रसदिच्छाओं से या पीड़ा की वैयक्तिक अभिव्यक्तियों से, समाज नहीं बदला करता। सामाजिक परिवर्तन जिन स्थितियों और जिन शक्तियों के तहत होता है, न तो वैसी स्थितियाँ उस समय थीं ना ही वैसी शक्तियाँ। दूसरे, कबीर हों, अन्य संत हों या मीरा, उनकी अपनी सोच के विचारगत्‌ और व्यवहारगत्‌ अंतर्विरोध भी थे, जिनके चलते भी यथास्थिति को बल मिला। चली आ रही व्यवस्था के कुछ पहलुओं को विचार और आचरण के स्तर पर जरूर इन लोगों ने चुनौती दी परन्तु व्यवस्था के कुछ दीगर पहलू संस्कार बनकर उनके विचारों में घुले-मिले भी रहे जिन्होंने उनकी सोच को भी प्रभावित किया और आचरण को भी।
व्यवस्था की शातिर निगाहों ने उन्हें उनके समय में भी भाँपा और आज भी उन्हें भाँप रही है। व्यवस्था के प्रभुओं ने उनके अंतर्विरोध को उनके समय में भी अपने हक में भुनाया और आज भी भुनाने पर आमादा हैं।
इन संतों का, मीरा का, कहा हुआ, आचरित जो भी व्यवस्था के हित में जाता है, व्यवस्था ने तब भी उसे Highlight किया और आज भी कर रही है। इन संतों का और मीरा का जो कुछ भी कहा-रचा गया व्यवस्था के हित में नहीं रहा, व्यवस्था के प्रमुखों ने तब भी उसे दबाने की, हाशिए पर डालने की, विरूप करने की, अपने ढंग से व्याख्यायित करते हुए ।propriate करने की कोशिश की, आज भी कर रहे हैं। कबीर के साथ यह हुआ और हो रहा है। मीरा के साथ भी ऐसा ही हुआ और हो रहा है। सच कहा जाए तो व्यवस्था द्वारा मीरा का अप्रोपिएशन आसान भी है।
मीरा की पदावली को देखें, पढ़ें और विचार करें, तो स्पष्ट होगा कि एक औरत होने के अहसास से ही नहीं, औरत होने के नाते अपने कमजोर, निरीह, असमर्थ और लाचार होने के एहसास से भी मीरा की मनोभूमि काफी कुछ आच्छादित और आक्रांत है। अबला होने का एहसास उन पर इस कदर हाबी है कि वे बार-बार अपने प्रभु या प्रियतम्‌ से अपनी रक्षा की गुहार लगाती हैं। श्रीकृष्ण पर उनकी निर्भरता तथा रक्षा का भरोसा इस नाते भी है कि जिन परिस्थितियों में वे थीं उन स्थितियों से उन्हें उबारने वाला उन्हें श्रीकृष्ण के अलावा कोई दूसरा नहीं दिखाई देता। श्रीकृष्ण से उनका संबंध भक्त का, प्रियतमा का और पत्नी का भी है, और श्रीकृष्ण प्रभु हों, प्रेमी हों,पति हों, अंततः पुरुष ही हैं - हर स्थिति में मीरा के संरक्षक और उद्धारक परम्परा भी ऐसा ही मानती है।
मीरा प्रयत्ति की, शरणागति इस हद तक पहुँची हुई है कि अपने समूचे वजूद को अपने प्रभु, प्रेमी या पति पर निछावर किए हुए हैं। सारी तन्मयता, सारा समर्पण, सारा राग उन्हीं की ओर से है। भक्ति के स्तर पर तो भक्त के प्रभु के समक्ष इस तरह के एकांत समर्पण की बात समझी जा सकती है परन्तु प्रेमिका या पत्नी के रूप में, प्रियतम्‌ या पति के प्रति ऐसा समर्पण भाव, ऐसी निर्भरता कुछ हैरान और परेशान करती है। इस नाते कि व्यवस्था को ऐसे समर्पण में अपने अनुकूल बहुत कुछ मिल जाने और अपने हित में उसका इस्तेमाल करने की बेहद संभावना है।
मीरा का ऐसा समर्पण भाव व्यवस्था को मौका देता है कि वह उसे सामाजिक जीवन-व्यवहार के तहत स्त्री के पुरुष के प्रति, पत्नी के पति के प्रति समर्पण भाव के रूप में, एक आदर्श के रूप में प्रचारित और व्याख्यायित करें। स्त्री-जाति को यह संदेश दे कि पुरुष के बिना स्त्री की तथा पति के लिए पत्नी की और कोई गति नहीं है। स्त्री के अस्तित्व की शर्त पुरुष के प्रति उसकी निर्भरता है। व्यवस्था को मौका मिलता है कि मीरा के साक्ष्य पर स्त्री-पुरुष या पति-पत्नी के ऐसे संबंध को वह वैध साबित करें।

हमारी यह सोच किसी को अतिरंजित लग सकती है, परन्तु व्यवस्था का इतिहास साक्षी है कि उसने स्त्री की कमजोरी को हमेशा अपने हित में भुनाया और इस्तेमाल किया है।
मीरा अपने प्रियतम्‌ से अपने मन चाहे पति से कभी बराबरी के स्तर पर नहीं बतियातीं। वे उनके प्रति अपने एकांत समर्पण में ही सुख मानती है। ‘गुलामी के इस सुख' को वे अपना सौभाग्य मानती हैं। वे अपने प्रभु या प्रियतम्‌ या पति-परमेश्वर की चाकरी के लिए सहज प्रस्तुत हैं - ‘प्रभु जी, कहाने चाकर राखो जी।' प्रभु की, प्रियतम्‌ की चाकर बनने में अपने वजूद को वे यहाँ तक भुला देती हैं कि उनका प्रभु उनका प्रियतम्‌, उन्हें जिस तरह रखे, जो भी खिलाए-पहिनाए, जहाँ भी रखे,वे उस तरह रहने, खाने-पहनने और वहाँ रहने को तैयार हैं। वह उन्हें बेचेगी, तो वे बिकने के लिए भी प्रस्तुत हैं। हमारे धर्मशास्त्राों में स्त्री को जिन मर्यादाओं में बाँधा गया है वे यही मर्यादायें हैं। संस्कार बनकर स्त्री मानस में वे इस तरह घुल पच गई हैं कि उनसे उबर पाना, जितना स्त्री मानस के लिए कठिन है, मीरा के लिए भी। अपने एक पद और (काश, यह पद प्रक्षिप्त हो) मीरा यहाँ तक कह गई है कि अपना पति, अपना ही है, वह कोढ़ी-कुष्टी ही क्यों न हो -
छैल बिराणो लाख को हे, अपणे काज न होइ।
ताके संग सीधारती है, भला न कहसीं कोई।
वर हीणो अपनो भले है, कोढ़ी-कुष्टी कोइ।
जाके संग सीधारती है, भला कहै सबलोइ॥
स्त्री के संदर्भ में समर्पण की यह नियति, गुलामी का यह सुख, इस सुख से स्त्री की यह रजामंदी ही हमारी हैरानी और परेशानी का कारण है। कहने की जरूरत नहीं कि स्त्री मुक्ति की वही सबसे बड़ी बाधा भी है।
मुक्ति कैसी भी हो किसी की भी हो, एक साथ और एक बार में होती है। किश्तों में मुुक्ति नहीं हुआ करती। चल रहे स्त्री-विमर्श में सक्रिय और उसके साथ चलने वाले सीधे-गुलाम होने के सुख पर मीरा को मुक्ति की इस आकांक्षा और अभियान में प्रतिरोध की मिसाल के रूप में प्रस्तुत करने वाले (प्रतिरोध की मिसाल मीरा हैं) सोचें और समझें कि मुक्त मीरा को ही नहीं होना है स्त्री जाति की मुक्ति होनी है। मीरा तो प्रतिरोध में है - मुक्त होंगी,जैसा कि वे हुईं-पर मीरा की मुक्ति से अहम्‌ सवाल हमारे लिए मुक्ति के अभियान में लगे हुए लोगों के लिए यह होना चाहिए कि मीरा की उस सास और ननद की मुक्ति भी स्त्री मुक्ति के अभियान से जुड़ी हुई है। मुक्त उन्हें भी होना है, जिनके लिए सचमुच गुलाम होने का सुख बहुत बड़ी नियामत है बिना उनके मुक्त हुए मीरा की या किसी अन्य की किसी समुदाय की मुक्ति का कोई मतलब नहीं। मुक्ति का यह अभियान कितना कठिन है आसानी से समझा जा सकता है।
व्यवस्था बहुत शातिर है मीरा के अपने परमेश्वर-पति के प्रति समर्पण को स्त्री-जाति के सामने पति-परमेश्वर के प्रति समर्पण के रूप में व्याख्यायित कर ले जाना उसके लिए बहुत सहज है। धर्मशास्त्र स्त्री को, पति को परमेश्वर मानने की सीख तो देते हैं।
समकालीन स्त्री-विमर्श में मीरा की भागीदारी ज+रूरी है। मीरा ने अपने समय में अपनी सीमाओं में जो किया बड़ा काम था। सन्तों के प्रतिरोध की जो वाणी बोली उसका भी हमारे लिए महत्त्व है। व्यवस्था न कबीर बदल सके, न मीरा। उनके लिए यह संभव भी न था। उनका महत्त्व इस बात में है कि मुक्ति के सपने को उन्होंने पराधीनों की आँखों में जीवित रखा। नई सदी में भी वह उनकी आँखों में जीवित हैं। इन्हीं आँखों में जितना कबीर हमारे समकालीन है, उतना ही मीरा।

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साक्षात्कार  

Posted by डा. फीरोज़ अहमद in ,

प्रो. रमेश जैन
साक्षात्कार जनसंचार का अनिवार्य अंग है। प्रत्येक जनसंचारकर्मी को समाचार से संबद्ध व्यक्तियों का साक्षात्कार लेना आना चाहिए, चाहे वह टेलीविजन-रेडियो का प्रतिनिधि हो, किसी पत्र-पत्रिका का संपादक, उपसंपादक, संवाददाता। साक्षात्कार लेना एक कला है। इस विधा को जनसंचारकर्मियों के अतिरिक्त साहित्यकारों ने भी अपनाया है। विश्व के प्रत्येक क्षेत्र में, हर भाषा में साक्षात्कार लिए जाते हैं। पत्र-पत्रिका, आकाशवाणी, दूरदर्शन, टेलीविजन के अन्य चैनलों में साक्षात्कार देखे जा सकते हैं। फोन, ई-मेल, इंटरनेट और फैक्स के माध्यम से विश्व के किसी भी स्थान से साक्षात्कार लिया जा सकता है। अंतरिक्ष में संपर्क स्थापित कर सकते हैं। पहली बार पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी ने अंतरिक्ष यात्री कैप्टन राकेश शर्मा से संवाद किया था, जिसे दूरदर्शन ने प्रसारित किया था। इस विधा का दिन पर दिन प्रचलन बढ़ता जा रहा है।
मनुष्य में दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ होती हैं। एक तो यह कि वह दूसरों के विषय में सब कुछ जान लेना चाहता है और दूसरी यह कि वह अपने विषय में या अपने विचार दूसरों को बता देना चाहता है। अपने अनुभवों से दूसरों को लाभ पहुँचाना और दूसरों के अनुभवों से लाभ उठाना यह मनुष्य का स्वभाव है। अपने विचारों को प्रकट करने के लिए अनेक लिखित, अलिखित रूप अपनाए हैं। साक्षात्कार भी मानवीय अभिव्यक्ति का एक माध्यम है। इसे भेंटवार्ता, इंटरव्यू, मुलाकात, बातचीत, भेंट आदि भी कहते हैं।
साक्षात्कार की परिभाषा
साक्षात्कार या भेंटवार्ता किसे कहते हैं, इस संबंध में कोई निश्चित परिभाषा नहीं है, विषय-विशेषज्ञों ने इसे अलग-अलग परिभाषित किया है- ‘‘इंटरव्यू से अभिप्राय उस रचना से है, जिसमें लेखक व्यक्ति-विशेष के साथ साक्षात्कार करने के बाद प्रायः किसी निश्चित प्रश्नमाला के आधार पर उसके व्यक्तित्व एवं कृतित्व के संबंध में प्रामाणिक जानकारी प्राप्त करता है और फिर अपने मन पर पड़े प्रभाव को लिपिबद्ध कर डालता है।'' (डॉ. नगेन्द्र)
‘‘साक्षात्कार में किसी व्यक्ति से मिलकर किसी विशेष दृष्टि से प्रश्न पूछे जाते हैं।''
(डॉ. सत्येन्द्र)
‘‘इंटरव्यू में दो व्यक्तियों की रगड़ व टकराहट हो तभी सर्वोत्तम रहता है। प्रश्नकर्ता का निर्जीव, खुशामदीद होना अथवा उत्तरदाता का अहंकारी एवं स्वगोपी होना घातक होता है। दोनों व्यक्तियों में अन्तर्व्यथा हो तो दोनों ही संभोग-सा रस पाते हैं।''
(वीरेन्द्र कुमार गुप्त)
‘हिन्दी शब्द सागर' (संपादक-श्याम सुन्दर दास) में इंटरव्यू का अर्थ व्यक्तियों का आपस में मिलना, एक-दूसरे का मिलाप, भेंट, मुलाकात, साक्षात्‌, वार्तालाप, आपस में विचारों का आदान-प्रदान करना कहा गया है। ‘मानक अंग्रेजी हिन्दी कोष' में भी इंटरव्यू शब्द कुछ इसी प्रकार से स्पष्ट किया गया है - विचार-विनिमय के उद्देश्य से प्रत्यक्ष दर्शन या मिलन, समाचार पत्र के संवाददाता और किसी ऐसे व्यक्ति से भेंट या मुलाकात, जिससे वह वक्तव्य प्राप्त करने के लिए मिलता है। इसमें प्रत्यक्ष लाभ, अभिमुख-संवाद, किसी से उसके वक्तव्यों को प्रकाशित करने के विचार से मिलने को ‘इंटरव्यू' की संज्ञा दी गई है।'
प्रमुख कोषकार डॉ० रघुवीर ने इंटरव्यू से तात्पर्य समक्षकार, समक्ष भेंट, वार्तालाप, आपस में मिलना बताया है।१ ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी (लंदन) में किसी बिन्दु विशेष को औपचारिक विचार-विनिमय हेतु प्रत्यक्ष भेंट करने, परस्पर मिलने या विमर्श करने, किसी समाचार पत्र प्रतिनिधि द्वारा प्रकाशन हेतु वक्तव्य लेने के लिए, किसी से भेंट करने को साक्षात्कार कहा गया है।
वास्तव में, साक्षात्कार पत्रकारिता और साहित्य की मिली-जुली विधा है। इसकी सफलता साक्षात्कार की कुशलता, साक्षात्कार पात्रके सहयोग तथा दोनों के सामंजस्य पर निर्भर करती है। टेलीविजन के लिए साक्षात्कार टेलीविजन-केन्द्र पर अथवा अन्यत्र उसके विशेष कैमरे के सामने आयोजित किये जाते हैं। रेडियो के लिए साक्षात्कार आकाशवाणी की ओर से रिकार्ड किये जाते हैं। अन्य साक्षात्कार समाचार पत्रों के लिए संवाददाता लेता है और उसे किसी समाचार पत्र-पत्रिका, पुस्तक में प्रकाशित किया जाता है।
साक्षात्कार के प्रकार
साक्षात्कार किसे कहते हैं? इसका क्या महत्त्व है और इसका क्या स्वरूप है? इन बातों को जान लेने के बाद यह जानना जरूरी है कि साक्षात्कार कितने प्रकार के होते हैं। यही इसका वर्गीकरण कहलाता है। साक्षात्कार अनेक प्रकार से लिए गए हैं। कोई साक्षात्कार छोटा होता है, कोई बड़ा। किसी में बहुत सारी बातें पूछी जाती हैं, किसी में सीमित। कोई साक्षात्कार बड़े व्यक्ति का होता है तो कोई साधारण या गरीब अथवा पिछड़ा समझे जाने वाले व्यक्ति का। किसी में केवल सवाल-जवाब होते हैं, तो किसी में बहस होती है। किसी साक्षात्कार में हंसी-मजाक होता है तो कोई गंभीर चर्चा के लिए होता है। कुछ साक्षात्कार पत्रया फोन द्वारा भी आयोजित किए जाते हैं। कुछ विशेष उद्देश्य से पूर्णतः काल्पनिक ही लिखे जाते हैं। कोई साक्षात्कार पत्र-पत्रिका के लिए लिया जाता है तो कोई रेडियो या टेलीविजन के लिए।
प्रमुख समीक्षक डॉ. नगेन्द्र, डॉ. हरदयाल, डॉ. रामचन्द्र तिवारी आदि ने साक्षात्कार दो प्रकार के माने हैं - वास्तविक और काल्पनिक। डॉ. विश्वनाथ शुक्ल ने तीसरा रूप - पत्र-साक्षात्कार भी माना है। डॉ. चन्द्रभान ने कुछ अन्य रूप भी माने हैं, पर वे स्पष्ट और सम्पूर्ण नहीं कहे जा सकते। इसलिए साक्षात्कार के संपूर्ण वर्गीकरण की जरूरत है। डॉ. विष्णु पंकज ने विभिन्न आधारों को लेकर साक्षात्कार को निम्नलिखित वर्गों में बाँटा है२ -
१. स्वरूप के आधार पर
(क) व्यक्तिनिष्ठ (ख) विषयनिष्ठ
२. विषय के आधार पर
(क) साहित्यिक (ख) साहित्येतर
३. शैली के आधार पर
(क) विवरणात्मक (ख) वर्णनात्मक (ग) विचारात्मक
(घ) प्रभावात्मक (च) हास्य-व्यंग्यात्मक (छ) भावात्मक (ज) प्रश्नोत्तरात्मक
४. वार्ताकारों के आधार पर
(क) पत्रा-पत्रिका-प्रतिनिधि द्वारा (ख) आकाशवाणी-प्रतिनिधि द्वारा (ग) दूरदर्शन-प्रतिनिधि द्वारा (घ) लेखकों द्वारा
(च) अन्य द्वारा
५. औपचारिकता के आधार पर
(क) औपचारिक (ख) अनौपचारिक
६. वार्ता-पात्रों के आधार पर
(क) विशिष्ट अथवा उच्चवर्गीय पात्रों के
(ख) साधारण अथवा निम्नवर्गीय पात्रों के (ग) आत्म-साक्षात्कार
७. संपर्क के आधार पर
(क) प्रत्यक्ष साक्षात्कार (ख) पत्रव्यवहार द्वारा (पत्र-इंटरव्यू)
(ग) फोन वार्ता (घ) काल्पनिक
८. प्रस्तुति के आधार पर
(क) पत्र-पत्रिका में प्रकाशित (ख) रेडियो पर प्रसारित
(ग) टेलीविजन पर प्रसारित
९. आकार के आधार पर
(क) लघु (ख) दीर्घ
१०. अन्य आधारों पर
(क) योजनाबद्ध (ख) आकस्मिक (ग) अन्य
‘व्यक्तिनिष्ठ' साक्षात्कार में व्यक्तित्व को अधिक महत्त्व दिया जाता है। उसके बचपन, शिक्षा, रुचियों, योजनाओं आदि पर विशेष रूप से चर्चा की जाती है। ‘विषयनिष्ठ साक्षात्कार में व्यक्ति के जीवन-परिचय के बजाय विषय पर अधिक ध्यान दिया जाता है। ‘विवरणात्मक' साक्षात्कार में विवरण की प्रधानता होती है। ‘वर्णनात्मक' में निबंधात्मक वर्णन अधिक होते हैं। ‘विचारात्मक' साक्षात्कार बहसनुमा होते हैं। इनमें साक्षात्कार लेने देने वाले दोनों जमकर बहस करते हैं। ये साक्षात्कार नुकीले यानी तेजतर्रार होते है। ‘प्रभावात्मक' साक्षात्कार में साक्षात्कार लेने वाला साक्षात्कार-पात्र का जो प्रभाव अपने ऊपर महसूस करता है, उसका खासतौर पर जिक्र करता है। ‘हास्य-व्यंग्यात्मक' में हास्य-व्यंग्य का पुट या प्रधानता रहती है। ‘भावात्मक' साक्षात्कार भावपूर्ण होते हैं। ‘प्रश्नोत्तरात्मक' साक्षात्कार प्रश्नोत्तर-प्रधान अथवा मात्रप्रश्नोत्तर होते हैं। पत्र-पत्रिकाओं में आजकल समाचार या संवाद के साथ जाने-माने व्यक्तियों के छोटे-बड़े साक्षात्कार प्रश्नोत्तर रूप में अधिक सामने आ रहे हैं। इनमें साक्षात्कार देने वाले का विस्तृत परिचय, साक्षात्कार लेने की परिस्थिति, परिवेश, साक्षात्कार-पात्रके कृतित्व की सूची, उसके हावभाव और साक्षात्कारकर्ता की प्रतिक्रियाओं आदि का समावेश नहीं होता या बहुत कम होता है।
‘औपचारिक' साक्षात्कार उसके पात्र से समय लेकर विधिवत्‌ लिए जाते हैं। ‘अनौपचारिक' साक्षात्कार अनौपचारिक बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। ‘प्रत्यक्ष भेंटात्मक' साक्षात्कार उसके पात्र के सामने बैठकर लिए जाते हैं। पत्र-व्यवहार द्वारा भी साक्षात्कार आयोजित किए जाते हैं। पत्र में प्रश्न लिखकर उसके पात्र के पास भेज दिए जाते हैं। उनका उत्तर आने पर साक्षात्कार तैयार कर लिया जाता है। ये ‘पत्र-इंटरव्यू' कहलाते हैं। ‘फोनवार्ता' में टेलीफोन पर बातचीत करके किसी खबर के खंडन-मंडन के लिए इंटरव्यू लिया जाता है। ‘काल्पनिक' साक्षात्कार में साक्षात्कार लेने वाला कल्पना के आधार पर या स्वप्न में उसके पात्र से मिलकर बातचीत करता है और प्रश्न व उत्तर दोनों स्वयं ही तैयार करता है। इसमें साक्षात्कार-पात्रद्वारा दिए गए उत्तर पूर्णतः काल्पनिक भी हो सकते हैं और उसकी रचनाओं, विचारों आदि के आधार पर भी।
साक्षात्कार छोटे-बड़े दोनों प्रकार के होते हैं। ये एक पृष्ठ के, एक मिनट के हो सकते हैं और इनसे काफी बड़े भी। अब तक सबसे बड़ा साक्षात्कार डिमाई आकार के ६४८ पृष्ठों में छपा हुआ उपलब्ध है। साहित्यिक विषयों से संबद्ध साक्षात्कार ‘साहित्यिक' होते हैं। ‘साहित्येतर' में राजनीति, खेलकूद, कला, संगीत, फिल्म, विज्ञान आदि कोई भी विषय हो सकता है। साक्षात्कार पत्रकारों (पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों अथवा प्रतिनिधित्व), आकाशवाणी-दूरदर्शन के प्रतिनिधियों, लेखकों अथवा अन्य व्यक्तियों द्वारा लिए जाते हैं। पत्राकार या अन्य प्रतिनिधि स्वयं भी लेखक (साहित्यकार) हो सकते हैं और साक्षात्कार लेने वाला स्वतंत्र लेखक भी हो सकता है, जो पत्र-पत्रिका, रेडियो या टेलीविजन से जुड़ा न हो।
साक्षात्कार के पात्र विशिष्ट अथवा उच्च व्यक्ति (साहित्यकार, पत्रकार, राजनेता, कलाकार, खिलाड़ी, अभिनेता, अधिकारी आदि) होते हैं। बहुत से साधारण अथवा गरीब और पिछड़े समझे जाने वाले व्यक्तियों के भी साक्षात्कार छापे जाते हैं। कुछ लेखकों ने स्वयं अपने काल्पनिक साक्षात्कार ‘आत्म-साक्षात्कार' शीर्षक से लिखे हैं। इनमें प्रश्न और उत्तर उनके स्वयं के होते हैं। अनेक बार साक्षात्कार योजना बनाकर किए जाते हैं तो कई बार बिना योजना के अचानक संभव हो जाते हैं।
साक्षात्कार की प्रक्रिया
साक्षात्कार किसका लें?
साक्षात्कार लेने की भी एक प्रक्रिया होती है। सबसे पहले यह तय किया जाता है कि साक्षात्कार किस व्यक्ति का लिया जाए। व्यक्ति का चयन अनेक बातों पर निर्भर करता है। सामान्यतः लोग या जनसंचारकर्मी बड़े नेताओं, साहित्यकारों, संपादकों, कलाकारों, खिलाड़ियों, अभिनेताओं और अभिनेत्रियों आदि और कभी-कभी अपराधियों के बारे में जानने को उत्सुक होते हैं। इसलिए पत्राकार या जनसंचारकर्मी ऐसे व्यक्तियों से साक्षात्कार लेने के अवसर ढँूढते रहते हैं। कभी-कभी संवाददाता को पत्र-पत्रिका के संपादक, रेडियो-टेलीविजन के अधिकारी अथवा अन्य सक्षम अधिकारी से निर्देश या सुझाव मिल जाता है कि अमुक उद्देश्य से इस व्यक्ति का साक्षात्कार लेना है। शहर में यदि किसी विशिष्ट व्यक्ति का आगमन होता है, किसी समारोह में कोई विशिष्टजन उपस्थित होता है तो उसे साक्षात्कार का पात्र बनाया जा सकता है। साधारण व्यक्ति और पिछड़े वर्गों के व्यक्तियों से भी साक्षात्कार लिया जा सकता है। साक्षात्कार लेते समय यह भी तय करना होता है कि साक्षात्कार-पत्रों से उसके जीवन, कृतित्व, प्रेरणास्रोतों, दिनचर्या, रुचियों, विचारों आदि सभी पर बात करनी है या विषय को ही केन्द्र में रखकर चलना है।
साक्षात्कार की अनुमति और समय
पात्र और विषय निश्चित हो जाने पर आप साक्षात्कार-पात्र से भेंटवार्ता की अनुमति और समय माँगेंगे, साक्षात्कार का स्थान तय करेंगे, पूछे जाने वाले प्रश्नों की सूची बनाएँगे। कई बार साक्षात्कार अचानक लेने पड़ जाते हैं। हवाई अड्डा, समारोह स्थल, रेलवे प्लेटफार्म आदि पर लिखित प्रश्नावली बनाने का अवकाश नहीं होता। पहले से सोचे हुए या अपने मन से तत्काल प्रश्न पूछे जाते हैं। संबंधित पूरक प्रश्न भी पूछे जाते हैं, जिससे बात साफ हो सके, आगे बढ़ सके। ऐसी स्थिति में भी एक रूपरेखा तो दिमाग में रखनी ही पड़ती है।
प्रस्तावित प्रश्न एवं पूरक प्रश्न
योजना या रूपरेखा बन जाने पर साक्षात्कार के पात्रसे प्रश्न पूछे जाते हैं। प्रस्तावित प्रश्नों व पूरक प्रश्नों से वांछित सूचना, तथ्य, विचार निकलवाने का प्रयास किया जाता है। कोई साक्षात्कार-पात्र तो सहज रूप से उत्तर दे देता है, कोई साक्षात्कार पात्र किसी प्रश्न को टाल जाता है, उत्तर नहीं देता, तथ्य छिपा लेता है, अपने विचार प्रकट नहीं करता। कभी-कभी वह साक्षात्कारकर्ता से प्रति-प्रश्न भी कर देता है। ऐसी स्थिति में आपको सावधानी से काम लेना होगा। उन प्रश्नों की भाषा बदलकर पुनः उसके सामने रखा जा सकता है। समय के अनुसार ऐसे प्रश्न को छोड़ना भी पड़ सकता है। कटुता उत्पन्न न हो और साक्षात्कार-पात्र का मान-भंग न हो, इस बात का ध्यान रखना जरूरी है।
टेपरिकार्डर का उपयोग
पत्रकार शीघ्रलिपि (शॉर्टहैंड) जानता हो, यह जरूरी नहीं। इसलिए साक्षात्कार-पात्रद्वारा प्रकट किए गए विचार, उसके द्वारा दिए गए उत्तर उसी रूप में साथ ही साथ नहीं लिखे जा सकते। आशु-लिपिक की व्यवस्था भी कोई सहज नहीं है। यदि आप पात्रके कथन श्रुतिलेख की भाँति लिखते रहेंगे तो वह उसे अखरेगा और उसकी विचार-श्रृंखला भंग हो सकती है। समय भी अधिक लगेगा। फिर भी तेज गति से कुछ वाक्यांश और मुख्य बातें अंकित की जा सकती हैं, जिन्हें साक्षात्कार समाप्त होने पर अपने घर या कार्यालय में बैठकर विकसित किया जा सकता है। इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कोई महत्त्वपूर्ण बात लिखने से न रह जाए। तिथियों, व्यक्तियों-संस्थाओं के नाम, रचनाओं की सूची, स्थानों के नाम, उद्धरण, घटनाएँ, सिद्धांत-वाक्य आदि ठीक तरह लिख लेने चाहिए। जल्दी लिखने का अभ्यास अच्छा रहता है। पात्र के व्यक्तित्व, परिवेश, उसके हावभाव, अपनी प्रतिक्रिया आदि को भी यथासंभव संक्षेप में या संकेत रूप में लिख लेना चाहिए। इन्हीं बिन्दुओं और अपनी स्मृति की मदद से साक्षात्कार लिख लिया जाता है। साक्षात्कार के समय यदि आपके साथ टेपरिकॉर्डर हो तो आपको बड़ी सुविधा रहेगी। टेप सुनकर साक्षात्कार लिख सकते हैं। इस साक्षात्कार में प्रामाणिकता भी अधिक रहती है। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन के साक्षात्कार में रिकार्डिंग की अच्छी व्यवस्था रहती है।
साक्षात्कार लेकर साक्षात्कारकर्ता लौट आता है। वह दर्ज की गई बातों और बातचीत की स्मृति के आधार पर साक्षात्कार लिखता है। यदि बातचीत टेप की गई है तो उसे पुनः सुनकर साक्षात्कार लिख लिया जाता है। साक्षात्कार लिखते समय उन बातों को छोड़ देना चाहिए जिनके बारे में साक्षात्कार-पात्र ने अनुरोध किया हो (ऑफ द रिकॉर्ड बताया हो) अथवा उनका लिखा जाना समाज व देश के हित में न हो।
संक्षिप्त परिचय
साक्षात्कार के आरम्भ में पात्रका आवश्यकतानुसार संक्षिप्त या बड़ा परिचय भी दिया जा सकता है। परिचय, टिप्पणी आदि का आकार इस बात पर निर्भर करता है कि साक्षात्कार का क्या उपयोग किया जा रहा है। अगर समाचार के साथ बॉक्स में भेंटवार्ता प्रकाशित की जा रही है तो विषय से संबंधित प्रश्न और उत्तर एक के बाद एक जमा दिए जाते हैं। इनमें पात्रके हावभाव, वातावरण-चित्राण, अपनी प्रतिक्रियाएँ, पात्र के कृतित्व की सूची आदि का साक्षात्कार में समावेश होता भी है तो नहीं के बराबर। इसके विपरीत दूसरे अवसरों पर कुछ साक्षात्कारकर्ता इन सब बातों का भी साक्षात्कार में समावेश करते हैं।
साक्षात्कार तैयार होने पर उसे पत्रया पत्रिका में प्रकाशन के लिए भेज दिया जाता है। कुछ साक्षात्कार बाद में पुस्तकाकार भी प्रकाशित होते हैं। कुछ साक्षात्कारकर्ता साक्षात्कार तैयार करके उसे पात्र को दिखा देते हैं और उससे स्वीकृति प्राप्त कर लेते हैं। इस समय पात्र साक्षात्कार में कुछ संशोधन भी सुझा सकता है। साधारणतः साक्षात्कार तैयार होने के बाद उसे पात्र को दिखाने और उसकी स्वीकृति लेने की जरूरत नहीं है। यदि पात्र का आग्रह हो तो उसे जरूर दिखाया जाना चाहिए।
साक्षात्कार में ध्यान रखने योग्य बातें
साक्षात्कार के समय अन्य बहुत-सी बातों का ध्यान रखना जरूरी है। यद्यपि यह संभव नहीं है कि प्रत्येक साक्षात्कार लेने वाले में वांछित विशिष्ट योग्यताएँ हों, फिर भी कुछ बातों का ध्यान रखकर साक्षात्कार को सफल बनाया जा सकता है। डॉ. विष्णु पंकज ने अपने शोध-ग्रंथ ‘हिन्दी इंटरव्यू : उद्भव और विकास' में इंटरव्यू लेते समय निम्न सावधानियाँ रेखांकित की हैं -
१. यदि साक्षात्कार लेने से पहले उसके पात्र और विषय से संबंधित कुछ जानकारी प्राप्त कर ली जाए तो काफी सुविधा रहेगी। अचानक लिए जाने वाले साक्षात्कार में यह संभव नहीं होता। यदि संगीत के विषय में साक्षात्कारकर्ता शून्य है तो संगीतज्ञ से साक्षात्कार को आगे बढ़ाने में उसे कठिनाई आएगी। हर साक्षात्कारकर्ता सभी विषयों में पारंगत हो, यह संभव नहीं; फिर भी आवश्यक जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। पुस्तकालयों और विषय से संबंधित अन्य व्यक्तियों से मदद ली जा सकती है।
२. साक्षात्कार का पात्र चाहे साधारण सामाजिक हैसियत का ही क्यों न हो, उसके सम्मान की रक्षा हो और उसकी अभिव्यक्ति को महत्त्व मिले, यह जरूरी है। उसके व्यक्तित्व, परिधान, भाषा की कमजोरी, शिक्षा की कमी, गरीबी आदि के कारण उसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। किसी क्षेत्र विशेष का विशिष्ट व्यक्ति तो आदर का पात्र है ही।
३. साक्षात्कार करने वाले में घमंड, रूखापन, अपनी बात थोपना, वाचालता, कटुता, सुस्ती जैसी चीजें नहीं होनी चाहिए।
४. उसमें जिज्ञासा, बोलने की शक्ति, भाषा पर अधिकार, बातें निकालने की कला, पात्र की बात सुनने का धैर्य, तटस्थता, मनोविज्ञान की जानकारी, नम्रता, लेखन-शक्ति, बदलती हुई परिस्थिति के अनुसार बातचीत को अवसरानुकूल मोड़ देना जैसे गुण होने चाहिए। कई बार पात्र किसी प्रश्न को टाल देता है, कोई बात छिपा लेता है, तब घुमा-फिराकर वह बात बाद में निकलवाने की कोशिश होती है। यदि पात्र किसी बात को न बताने के लिए अडिग है तो ज्यादा जिद या बहस करके कटुता पैदा नहीं करनी चाहिए।
५. साक्षात्कार के समय, हो सकता है कि आपके विचार किसी मामले में पात्र से न मिलते हों, तब अपनी विचारधारा उस पर मत थोपिए।
६. साक्षात्कार में पात्रके विचार, उसकी जानकारी निकलवाने का मुख्य उद्देश्य होता है। साक्षात्कारकर्ता उसमें सहायक होता है। यदि वह स्वयं भाषण देने लगेगा और पात्र के कथन को महत्त्व नहीं देगा तो साक्षात्कार सफल नहीं होगा। साक्षात्कार में प्रश्न पूछने का बड़ा महत्त्व है। यदि दो व्यक्ति किसी मुद्दे पर बराबर के विचार प्रकट करने लगते हैं तो वह साक्षात्कार नहीं रह जाता, परिचर्चा बन जाती है। साक्षात्कारकर्ता को अपने पूर्वाग्रह छोड़कर पात्र के पास जाना चाहिए। साक्षात्कार मित्र-शत्रु-भाव से न लिया जाए, बल्कि तटस्थ होकर लिया जाए।
७. साक्षात्कार में सच्चाई होनी चाहिए। पात्र के कथन और उसके द्वारा दी गई जानकारी को तोड़-मरोड़कर पेश नहीं किया जाना चाहिए, यह हर तरह से अनैतिक है। कई पात्रों की यह शिकायत रही है कि उनकी बातों को तोड़-मरोड़कर साक्षात्कार तैयार कर लिया गया है। कई बार ऐसा भी होता है कि राजनेता साक्षात्कार के समय कोई बात कह जाता है मगर बाद में एतराज होने पर मुकर जाता है और कहता है कि मैंने यह बात इस तरह नहीं कही थी। कई बातें ऐसी होती हैं, जिन्हें साक्षात्कारकर्ता जानता है, फिर भी उन्हें साक्षात्कार में पूछता है, क्योंकि वे बातें पात्रके मुँह से कहलवाकर जनसामान्य के समक्ष प्रस्तुत करनी होती हैं। साक्षात्कार कोई व्यक्तिगत चीज नहीं है, वह जनता की जानकारी के लिए लिया जाता है। निजी रूप से लिए गए साक्षात्कार, यदि उनका प्रकाशन प्रसारण नहीं होता, फाइलों में सिमटकर रह जाते हैं।
८. साक्षात्कार में ऐसे मामलों को तूल न दें, जिनसे देश-हित पर विपरीत असर पड़े, सांप्रदायिक सद्भाव बिगड़े, किसी का चरित्र-हनन हो, वर्ग-विशेष में कटुता फैले या पात्रका अपमान हो। साक्षात्कार के आरम्भ और अन्त में हल्के तथा मध्य में मुख्य प्रश्न पूछे जाने चाहिए। प्रश्न और उत्तर दोनों स्पष्ट हों। यदि उत्तर स्पष्ट नहीं है तो पुनः प्रश्न पूछकर उत्तर को स्पष्ट करा लेना चाहिए।
९. साक्षात्कार यथासंभव निर्धारित समय में पूरा किया जाना चाहिए। साक्षात्कार पूरा होने पर पात्र को धन्यवाद देना न भूलिए।
साक्षात्कार स्वतंत्रविधा
साक्षात्कार में निबंध, रेखाचित्र, जीवनी, आत्मकथा, आलोचना, नाटक (संवाद) आदि विधाओं के तत्त्व शामिल हो सकते हैं, पर सीमित और सहायक रूप में ही ऐसा हो सकता है। साक्षात्कार पत्रकारिता और साहित्य दोनों क्षेत्रों की प्रमुख स्वतंत्रऔर महत्त्वपूर्ण विधा है।
साक्षात्कार में नाटक का ‘संवाद' तत्त्व बातचीत या प्रश्नोत्तर के रूप में खासतौर पर होता है। इसमें साक्षात्कार लेने-देने वाले दोनों व्यक्तियों के संवादों का महत्त्व है, पर देने वाले को ही प्रधानता दी जाती है और साक्षात्कार लेने वाले के संवाद देने वाले से बात निकलवाने के निमित्त होते हैं, यद्यपि वह उससे बहस भी कर सकता है। जब साक्षात्कारकर्ता साक्षात्कार की परिस्थिति, पात्र का परिचय या वातावरण का वर्णन करता है तो वह निबंधात्मक हो जाता है। साक्षात्कार में यह निबंध-तत्त्व होता है। साक्षात्कार में कहीं-कहीं संस्मरण के तत्त्व भी होते हैं, जब साक्षात्कार-पात्र अपने जीवन के प्रसंग या घटना सुनाने लगता है। जब साक्षात्कारकर्ता पात्रके व्यक्तित्व का, वेशभूषा का चित्रण करने लगता है तो वह रेखाचित्रात्मक होता है। कोई-कोई साक्षात्कारकर्ता साक्षात्कार के आरम्भ में पात्र का संक्षिप्त जीवन-परिचय जोड़ देता है। यह जीवनी का ही तत्त्व है। कभी पात्र स्वयं अपने जीवन के विषय में बताने लगता है, जो आत्मकथा का संक्षिप्त रूप होता है। जब साक्षात्कार का पात्र किसी कृति की आलोचना करने लगता है तब साक्षात्कार में आलोचना के तत्त्व आ जाते हैं। कभी-कभी यह कार्य साक्षात्कारकर्ता अथवा दोनों करते हैं। साक्षात्कार रिपोर्ताज, फैंटेसी, सर्वेक्षण, पत्र, केरीकेचर आदि विधाओं से एक अलग विधा है।
‘परिचर्चा' एक स्वतंत्र विधा के रूप में विकसित हो रही है। इसे ‘समूह-साक्षात्कार' (ग्रुप-इंटरव्यू) कहा जा सकता है। इसमें सभी विचार प्रकट करने वालों का पूरा महत्त्व होता है। कुछ लोगों ने ‘साक्षात्कार' के लिए चर्चा, विशेष परिचर्चा आदि शब्दों का प्रयोग किया है। परिचर्चा को साक्षात्कार से एक अलग विधा माना जाना चाहिए।३
संवाददाता-सम्मेलन भी साक्षात्कार की तरह ही होता है। कोई विशिष्ट व्यक्ति अपनी निजी या संस्थागत नीतियों, उपलब्धियों, योजनाओं, विचारों आदि की जानकारी देने के लिए संवाददाताओं को बुलाता है। वह आरम्भ में अपने विचार प्रकट करता है अथवा मुद्रित सामग्री वितरित करता है। उसके आधार पर संवाददाता उससे प्रश्न पूछते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि किसी विशिष्ट व्यक्ति के आगमन पर विभिन्न संवाददाता उसे जा घेरते हैं और उससे प्रश्न पूछने लगते हैं। किसी विशिष्ट व्यक्ति के विदेश-गमन पर भी उससे इस प्रकार प्रश्न पूछे जाते हैं। संवाददाता-सम्मेलन आयोजित और अनौपचारिक दोनों प्रकार के होते हैं। साक्षात्कार का मुख्य उद्देश्य तो साक्षात्कार के पात्रकी अभिव्यक्ति को जनता के सामने लाना होता है, लेकिन इसमें साक्षात्कारकर्ता का भी काफी महत्त्व होता है। यदि साक्षात्कारकर्ता सूत्राधार है तो सामने वाला व्यक्ति साक्षात्कार-नायक होता है।
सन्दर्भ -
१. कॉम्प्रिहेंसिव इंग्लिश - हिन्दी डिक्शनरी, पृ०-८२०
२. जनसंचार की विधा - साक्षात्कार, पृ०-६१
३. वही, पृ०-४८
replace_date('8:22 PM');

लो चुप्पी साध ली माहौल ने सहमे शजर बाबा  

Posted by डा. फीरोज़ अहमद in

सतपाल ख्याल

लो चुप्पी साध ली माहौल ने सहमे शजर बाबा
किसी तूफ़ान की इन बस्तियों पर है नज़र बाबा.

है अब तो मौसमों में ज़हर खुलकर सांस कैसे लें
हवा है आजकल कैसी तुझे कुछ है खबर बाबा.

ये माथा घिस रहे हो जिस की चौखट पर बराबर तुम
उठा के सर जरा देखो है उस पर कुछ असर बाबा.

न है वो नीम, न बरगद, न है गोरी सी वो लड़्की
जिसे छोड़ा था कल मैने यही है वो नगर बाबा.

न कोई मील पत्थर है जो दूरी का पता दे दे
ये कैसी है डगर बावा ये कैसा है सफ़र बाबा.

replace_date('3:33 PM');

ग़ज़ल  

Posted by डा. फीरोज़ अहमद in

सतपाल ख्याल

इतने टुकड़ों में बंट गया हूं मैं
मैं खुद का कितना हूं सोचता हूं मैं.

ये हुनर आते आते आया है
अब तो ग़ज़लों में ढल रहा हूं मैं.

हो असर या न हो किसे परवाह
काम सजदा मेरा दुआ हूं मैं.

कैसे बाजार में गुजर होगी
बस यही सोचकर बिका हूं मैं

replace_date('9:08 AM');

भड़ास  

Posted by डा. फीरोज़ अहमद

ज्ञानदत्त पाण्डेय जी ,आपने लिखा ...
अपने ब्लॉग को फलता फूलता देखना चाहते हैं तो न केवल आपको अपने ब्लॉग का लेखन स्तर, उसकी विषय वस्तु, लेखन की आवृति, नियमितता, अपनी टिप्पणियों का स्प्रेड और उनकी गुणवत्ता पर ध्यान देना होगा, वरन आप किस प्रकार अपनी पोस्ट और अपना ब्लॉग परोस रहे हैं - उसके प्रति भी सजग रहना होगा।
नोट- सक्रियता क्र. में 50 के अन्दर जितने भी ब्लाग है उनका स्तर ,गुणवत्ता कैसा है ।यह तो देखकर पता चलता है कि निम्न स्तर की सामग्री देते है और पसंद दिखाते है 60 की है । खुद क्लिक करके उसको आगे बढ़ाते है ।कुछ ब्लाग अडंर 50 अच्छे भी है जैसे रचनाकार ।फीडजिट लगाये पता लग जायेगा । मुझे लगता है कि जोड़तोड़ राजनीति इसमें भी है । सक्रियता क्या होती है 3 दिन में पोस्ट करते है दिखाते सक्रियता क्र.70 । मैंने लगभग 3महीने में 280 रचना पोस्ट किया सक्रियता क्र.140 है । अब मैं सक्रियता क्या समझू । बताये ।
replace_date('9:08 AM');

दलित विमर्श से जुड़े कुछ मुद्दे  

Posted by डा. फीरोज़ अहमद in

प्रो० रामकली सराफ
दलित विमर्श जैसे विषय पर बातचीत का ऐसा समय आ गया है, जिसे हम पुनर्पाठ, सिंहावलोकन या आत्मावलोकन की कोटि में रख सकते हैं। वजह यह कि इधर घुमा-फिराकर जो बातें हो रही हैं, लगभग एक जैसी कोल्हू के बैल सरीखे एक ही घेरे में चक्कर लगाती घूम रही है। इस स्थिति से भिन्न दलित विमर्श को आत्मलोचन के जरिये विस्तार और गहराई देने के प्रति संजीदा होने का समय है, क्योंकि आत्मालोचना ही उन्हें आबद्ध घेरे से बाहर निकाल आगे बढ़ने का साहस दे सकती है। यह निरंतर चलने वाली ऐसी बौद्धिक-प्रक्रिया है, जो सामाजिक-आर्थिक विकास के दर्शन को विस्तृत सामाजिक विकास-प्रक्रिया के भीतर से जानने का माद्दा भरती है। कई दलित लेखकों को अपनी आत्मसंतुष्ट जड़ता पर ध्यान देना चाहिए। क्योंकि सृजनशीलता कभी भी अपने तईं सिमटी नहीं रहती, उसमें जन्मा फैलाव गहराई ही उसे स्थायी महत्त्व दिलवाता है। निश्चित ही उन्हें व्यापक मेहनतकश दलित समूह के हितों की चिंता करनी होगी, अन्यथा भविष्य के विकास की संभावनायें भी क्षीण होगी। यही वजह है, सदियों से चली आ रही अन्यायकारी व्यवस्था के खिलाफ चिनगारियाँ उठी जरूर, लेकिन जलती हुई स्थिति में नहीं रह सकी, उन पद पर राख पड़नी शुरू हो गयी है। दरअसल अंधेरे में उठी चिंगारी को धधकती आग में तब्दील करने का संघर्ष बरकरार रखना होगा।मौजूदा दलित विमर्श के विकासमान स्वरूप के लिए यह आवश्यक है कि वह जमींनी संघर्ष से सम्बद्ध हो। प्रारम्भिक दौर के भटकावों के बावजूद बीसवीं शताब्दी के अन्तिम दो दशकों में तीव्रता से जन्में इस दलित लेखन ने अपनी भिन्न और स्पष्ट पहचान कायम की। निश्चित ही इस कालखंड की यह ऐतिहासिक उपलब्धि है। लेकिन आज भी दलित लेखन और दलित लेखक वैचारिक स्तर पर कई तरह के अन्तर्निहित अन्तर्विरोधों के शिकार हैं। हालांकि दलितों में आई जागृति का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य भी मौजूद है। चार्वाक दर्शन, बुद्ध, कबीर, रैदास के साथ इधर महात्मा फूले, डॉ० अम्बेडकर और गाँधीजी की ऐतिहासिक भूमिका रही। गाँधी जी की बनिस्पत अम्बेडकर ने दलितों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाकर उनमें स्वत्व - स्थापना हेतु संघर्ष का माद्दा पैदा किया। वे यथास्थिति को बदल डालना चाहते थे, गाँधी जी उसे बरकरार रखते हुए उसी में सुधार के हामी थे। उनके हरिजनोद्धार के एजेन्डे में सवर्ण जातियों का साथ छोड़ने की बात कहीं नहीं थी।आज यह विडम्बना ही है कि दलित लेखन में वही लोग ज्यादा मुखर नजर आ रहे हैं, जो सरकारी नौकरियों या आरक्षित सुविधाओं से लैस हैं। सद्यः प्रस्फुटित यह नवघनाढ्य वर्ग अपने ही जातीय भाइयों से दूरी का रिश्ता कायम करने लगा है। स्वयं उच्च बना यह अपने से निम्न जातियों के दलितों को हिकारत की नजर से देखता है। यहाँ भी जाति-पाँति, ऊँच-नीच का भेदभाव तेजी से पनपा है। ऐसे में ऊँचाई पर पहुँचे अधिकार प्राप्त दलित और ब्राह्मण में भेद कहाँ रह जाता है? एक-सा बाना धारण किये दोनों वर्ग-सहयोगी हो जाते हैं। फलतः जातिहित पिछड़ता जाता है और वर्गहित सर्वोपरि हो जाता है। बाकी नीचे के दलितों को एक बड़ा तबका कहीं सफाईकर्मी बना, कहीं बंधुआ बना, कहीं दिहाड़ी मजदूरी पर काम करता दारिद्रय के दलदल से ऊपर नहीं उठ पाता। ये लोग अम्बेडकर मेले, उत्सवों में तमगा, मूर्तियाँ, चित्र, खिलौने, बिल्ला आदि खरीदते भकुआये हुए से महज वोटर की पांत में खड़े रह जाते हैं। दलित संज्ञान के भीतर से जन्मा दलित आन्दोलन का ऐसा जनाधार उसे कितना आगे बढ़ायेगा यह स्पष्ट है।सवर्ण बने इन दलित बुद्धिजीवियों को दलित समाज के बीच उठना-बैठना, खाना-पीना सम्मानजनक नहीं लगता। ये राजनीतिक या सांगठनिक हलकों का प्रयोग दलित हित में करें ऐसा नहीं हो पाता। आम दलितों पर अत्याचार हो और वे चिल्लाएं बोलें, लड़ें, ऐसी उनकी फितरत नहीं हैं, वरन्‌ अपनी उपाधियों को निगलकर, जाति-समर्थक शब्दों को हटाकर यह साबित करना हम दलित नहीं हैं, आज एक बड़ी सच्चाई बन गयी है। रहन-सहन, खान-पान, अतिप्रदर्शन की प्रवृत्ति उन्हें सवर्णों के निकट ले जाती है। जहाँ वे पॉश कॉलोनी में रहते हुए ऊँची जातियों में उठना-बैठना, शादी-करना, रिश्ते-सम्बन्धों को जीने जैसे अघोषित कार्यक्रमों से जुड़ जाते हैं। इस प्रकार उनकी जाति पर परदा डालने की ग्रंथिग्रस्तता अपने कछुआधर्मी रुख से उन्हें कैसे मुक्ति मिलेगी? यह एक गंभीर सवाल है। उनकी सवर्ण मानसिकता और सत्ता-व्यवस्था के साथ समझौता उन्हें व्यापक संघर्ष-चेतना से दूर कर देता है। निश्चित ही निरन्तर सवर्ण होते दलित और निरन्तर विवर्ण होते दलित की दूरी बढ़ी है। यदि अति विवर्ण होते हुए अति दलितों, पिछड़ों, घुमन्तू जातियों की समस्याओं, उनके गीतों, कथाओं, वार्ताओं और रोज की जिन्दगी को सामने लाया जाय, तो दलित साहित्य प्रमाणिक हो सकता है।जाति में विश्वास न करना और फिर आवश्यकतानुरूप जाति के बल-दल के साथ खड़ा होना उनका मुख्य अन्तर्विरोध बनता जा रहा है। क्या कहीं ऐसा हुआ है कि किसी कामगार औरत, किसी दस्तकार दलित ने अपना अनुभव लिखा? शायद नहीं। ब्राह्मण बने दलित लेखकों का अनुभव परकाया प्रवेश की तरह है। उनका झरोखा अलग बना हुआ है। जबकि बराबर तक पहुँचने का नहीं, बराबर तक उतारने का साहित्य रचना होगा सवर्ण नहीं होना है, सवर्ण मानसिकता का विखंडन करना है। अपनी मलीनता को, गरीबी को, जातिगत दंश को जीवनीशक्ति के रूप में विकसित कर सवर्ण समाज के लिए चुनौती बनना है, जैसा कि सिद्धों, अघोरियों, आजीविकों और लोकायतों ने किया। दलित लेखन में एक बड़े अन्तराल 'गैप' के पैदा होने का परिणाम है कि रैदास और कबीर जैसी विश्वसनीयता या यहाँ तक कि हीराडोम जैसी प्रामाणिकता उनके साहित्य में खोजने पर मिलती है।भूमंडलीकरण के दौर में जहाँ बाजार तंत्र पूरे माहौल पर तारी है। बाजार की सज-धज विशुद्ध ढंग से इस मुखर बौद्धिक समुदाय और आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न लोगों की छीना झपटी का मामला है। दिल्ली के अन्डरग्राउण्ड गोलघर मार्केट में प्रायः सत्तर प्रतिशत जगह दलित नवधनाढ्यों की हैं, जिसे पैसे और आरक्षण कला के भीतर से प्राप्त किया गया है। इस नवउदारीकृत व्यवस्था ने असमानता और गरीबी में बेतहाशा वृद्धि की है। लेकिन ब्राह्मणवादी-सामन्तवादी व्यवस्था का जो भीषण जाति का शिकंजा कसा हुआ था, उसकी जकड़न अवश्य ढीली पड़ी है। बाजार के लिए जातिवाद-दलितवाद का कोई मायने नहीं है। उसका एक ही ध्येय है, 'धनी बनो-सुखी होओ।' आज आर्थिक नैतिकता का जबरदस्त द्द्वास हुआ है। इस कैरेक्टर को कैसे बचाये रक्खें, यह बड़ी चुनौती है। इस दतिल मुक्ति का संघर्ष इस प्रवृत्ति की वजह से भी कमजोर हुआ है। यह सच्चाई है कि आज भी एक बड़ा समूह विरासत में मिली अभिशप्त जिन्दगी के इर्द-गिर्द है। मैला ढोने, मरे पशुओं को उठाने, खाल उतारने, गोबरहा खाने, सुलभ शौचालयों में बैठे दलित ही दिखते हैं। उन्हें वैसी घृणा और अपमान की जिन्दगी नहीं जीनी पड़ती, पर वे इससे मुक्त हो गये यह कहना भी ज्यादती होगी। इतना जरूर हुआ है कि यह उनके प्रति बरती जाने वाली निर्ममता और जुर्म के प्रति प्रतिक्रियायें दलितों की तरफ से ही नहीं वरन्‌ समूचे समाज-राष्ट्र के भीतर से, हर तरफ से उठती है। भौतिक उपलब्धियाँ जरूरी हैं, पिछड़ों-दलितों के लिए तो और भी ज्यादा जरूरी है। लेकिन वैश्वीकृत व्यवस्था के भीतर पैठे अलगावाद और उसके साथ सत्तातंत्रा की सहमति को अपनी मौजूदा यथास्थिति को बनाए रखने के कारक के रूप में देखने से दलित लेखन परहेज करता है। लेकिन दलित मुक्ति के साथ जुड़ी सत्तासीनों की विरोधी भूमिका को नजरअन्दाज करना मुश्किल है। इधर राजनीति में दलितों की हितचिंता की बजाय जातिचिंता बढ़ी है।इसके कारण इस 'करप्ट' राजनीति में अभी जाति नहीं टूटी है। जातिवाद की ठोस जमीन पर वोट की राजनीति खेली जा रही है। पिछले दिनों दलित राजनेताओं और भगवाधारकों का 'एलायंस' दलित हितों को मुँह चिढ़ाता नजर आया। दलित राजनीति की जो भड़ैंती उभरकर आयी, दलित राजनेताओं ने राजनीति के एजेन्डे पर दलित समस्याओं के बने रहने का आश्वासन देकर छलपूर्वक जाति के आधार पर वोट बटोरने का काम किया। उन्हें ब्राह्मणों के साथ एका कायम करने में कोई हिचकिचाहट नहीं हुई। इस प्रकार जातिगत परतों-सतहों को भेदने की बजाय बनाये रखने का सत्तासीनों के इस अंदाज ने इस आन्दोलन को विरूपति और अमूर्त्तित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। दलित लेखकों को देखना होगा कि सामाजिक वैषम्यों से मुक्ति क्या राजनीतिक स्वार्थपरता और अवसरवादिता से हासिल होगी? जिसके निकट बैठने का अवसर वे खोना नहीं चाहते? वे स्वयं बड़े सत्ता प्रतिष्ठानों में बेझिझक जाते हैं, अन्तर्राष्ट्रीय यात्रायें करते हैं, मंत्रियों के साथ मंच पर विराजमान होते हैं, फिर आरक्षण की बदौलत अपने पीछे छूटे बड़े दलित तबके को खुशफहम रोमानी स्वप्नों की दुनियाँ में ले जाने का स्वांग रचते हैं।इस प्रकार बड़ी चालाकी से सत्तासीन और उनके पिट्ठूओं द्वारा जातिगत चेतना को तीखा करने के अंदाज साथ ही दलितों के बड़े तबके की अशिक्षा, पिछड़ेपन और धार्मिक अन्ध-आस्थाओं का अपने हक़ में इस्तेमाल कर नवसाम्राज्यवादी-पूँजीवादी ताकतों को मजबूत करने की साजिश को समझकर दलित लेखकों को उसके विरुद्ध संघर्ष करना होगा। इसलिए सिर्फ वर्णव्यवस्था के उन्मूलन से दलितों की समस्याओं का निदान नहीं होगा। उनके आर्थिक जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने का सवाल अहम्‌ है। यह सही है कि वर्णगत द्वन्द्व का स्वरूप आर्थिक और राजनीतिक द्वन्द्व के मुकाबले अधिक जटिल और पेचीदा है। लेकिन मौजूदा समय में समाज और सत्ता में ब्राह्मण वर्चस्व के बजाय एक ध्रुवीय वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था और उसकी साठ-गाँठ से फलता-फूलता राजनीतिक महकमा शीर्ष पर है। इसलिए जातिगत-वर्णगत व्यवस्था के विरोध के बावजूद यह गौण मुद्दा है। मुख्य है आर्थिक वैषम्य जिसके निष्क्रिय प्रतिबिम्बों के निकट खड़े मौजूदा दलित विमर्श में इसकी धमक नहीं मिलती है और ना ही राजनीति के भीतर दलितों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने का कोई चिन्तन या पुख्ता कार्यक्रम मिलता है। निःसंदेह वर्णव्यवस्था के विरोध के कारण दलितों को घृणा और उत्पीड़न से कमोबेश मुक्ति जरूर मिली है, लेकिन मात्र इसी से आर्थिक वैषम्यपूर्ण स्थितियों से छुटकारा मिल जायेगा, यह समझना निरा भ्रम है। जबकि समूचे दलित लेखन में इसी भ्रम की गूंज है। इस सीमा से बाहर आकर उन्हें समाज में मौजूद अन्याय अहम्‌ समस्याओं गरीबी, भ्रष्टाचार भूख, बेकारी आदि से कतराने की बजाय उससे रूबरू होना चाहिए। क्योंकि ये सिर्फ गरीब सवर्णों की समस्यायें ही नहीं है, दलितों की भी है। इस दृष्टि से देखें तो गैरदलित गरीब ब्राह्मण या अन्य जातियों के अभावग्रस्त लोगों की स्थिति दलित जैसी ही हैं। ऐसे लोग पूँजीवादी प्रतिष्ठानों या प्रशासनिक हल्कों में जाने पर अवमानना और प्रताड़ना के ही शिकार होते हैं। शरण कुमार लिम्बाले ने बहुत सही लिखा कि ''दलित शब्द की व्याख्या केवल अछूत जाति का उल्लेख करने से नहीं होती, इसमें आर्थिक तौर से पिछड़े हुए लोगों का समावेश होना चाहिए।'' (हंस, जनवरी १९९७, पृ० १३) मराठी दलित साहित्य में आयी इस प्रकार की व्यापक संचेतना ही वहाँ दलित जनान्दोलनों के उभार के लिए उर्वर जमीन साबित हुई। इसलिए सवर्ण विरोध का जो 'प्लेग' दलित लेखकों में घुसा हुआ है, उससे बाहर आकर दृष्टि को व्यापक बनाने की जरूरत है। स्वयं अम्बेडकर ने १९४३ में 'मजदूर और संसदीय लोकतन्त्र' नामक भाषण में स्पष्ट कहा कि गरीब मजदूर और दलित वर्ग ने अपने जीवन के निर्माण में आर्थिक पक्ष के प्रभाव की अनदेखी की। प्रेमचन्द ने इस सच्चाई को महसूस कर उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने की बार-बार बात की।दरअसल दलितों की मुख्य समस्या उनकी शिक्षा-दीक्षा, भूमि पर मालिकाना हक की रोजी-रोटी की है। आरक्षण का लाभ भी उन मुट्ठी भर लोगों को मिला जो जागरूक हैं, प्रताड़ना और बदहाल स्थिति से ऊपर उठ चुके हैं। अम्बेडकर ने जब आरक्षण की बात की थी तो निश्चित ही उसके मूल में योग्यता हासिल कर शिक्षा-नौकरी पाने और जीवनस्थिति को बेहतर बनाने का सपना था। आज निजी संस्थानों में आरक्षण की बदौलत दलितों की जीवन स्थितियों की बेहतरी का सपना परोसने वाले श्योराज सिंह 'बेचैन' को देखना चाहिए कि सर्वत्रा नव साम्राज्यवादी पूंजी का अमानुषिक-मानवद्रोही रूप प्रकट हो चुका है।ऐसे विषम के माहौल में आरक्षण न मिलने पर 'विद्रोह' की बात भी की। लेकिन ऐसे विद्रोह से दलितों को कोई लाभ मिलने वाला नहीं है, न ही आरक्षण से, क्योंकि यह विद्रोह कैसा होगा? कौन करेगा? क्या आकाशीय होगा? इसकी कोई स्पष्ट रूपरेखा उनके पास नहीं है। इसे अमर्त्य सेन के माध्यम से रेखांकित कर सकते हैं, 'विषमता एक ठोस सच्चाई है, प्रश्न यह है कि उसे कैसे बदला जाय? और उसके लिए जरूरी है कि उन ठोस सामाजिक उत्पादक शक्तियों, उनके अन्तर्विरोधों और उन प्रक्रियाओं को उद्घाटित करना, जिनके कारण असमानता पैदा होती है।' (विषमता : एक पुनर्विवेचन) ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने दलितों को जो हिकारत भरी नारकीय जिन्दगी दी तो नव उदारीकृत व्यवस्था उन्हें उदारतावश कोई ठाठ-बाट की जिन्दगी नहीं देने जा रही है। इसलिए मिथ्या कल्पनालोक में भ्रमण न कर आर्थिक विषमता के कारकों की तह में उतरना होगा। जब तक राष्ट्रीय पूंजी और विश्व पूंजी का सामंजस्य अपना उत्स दिखाता रहेगा, दलित ही क्या, अन्य उत्पीड़ित शेषित तबके की स्थिति में कोई बड़ा बदलाव संभव नहीं होगा।दरअसल प्रतिरोध भाव के बीच निहित व्यापक संघर्ष प्रक्रिया की पहचान के साथ 'विद्रोह' की आवश्यकता है। दरअसल आरक्षण नहीं दलित जीवन से जुड़े अनेक ज्वलन्त मुद्दों के प्रति संजीदा होने और लेखन में आये घटना और प्रसंगों के तमाम अन्तर्विरोधों को अतिक्रमित करके ही लक्ष्यभेदन संभव है। दलित साहित्य में सबसे महत्त्वपूर्ण आत्मकथा का साहित्य है। महाराष्ट्र से लेकर हिन्दी प्रदेश तक दलित रचनाकारों की आत्मकथाएं प्रकाशित हुई हैं। उनमें सच्चाई से सीधा संवाद है। वे समाज में उनकी दुःखद स्थिति की सूचनाएं देती है। सवर्ण समाज द्वारा मिली घृणा और प्रवंचना का तीखा प्रतिकार है। ईमानदारी और तटस्थता के साथ नग्न सत्य का अघड़कर आना रोंगटे खड़े कर जाता है। सही है सहानुभूति के तहत लिखे लेखन में ये घाव नहीं उभर पाये हैं।अनेक आत्मकथाओं जैसे 'अपने-अपने पिंजरे' (मोहनदास नैमिशराय) 'जूठन' (ओम प्रकाश वाल्मीकि), 'तिरस्कृत' (सूरज पाल चौहान) ने गहरा प्रभाव डाला, जिनमें जीवनानुभवों की सच्चाई है, अनुभवगत ऊर्जा है। भोगा हुआ संताप है। निश्चित ही पाकर, समझकर लिखे हुए की तुलना में भोगा हुआ सच अधिक प्रमाणित होता है। लेकिन तमाम क्रूरताओं की वास्तविकता के बावजूद क्या एक 'ट्रेंड' नहीं निर्मित हो रहा है, दलित आत्मकथा-लेखन का? इन लेखकों के सामने विपणन और बाजार तो नहीं है? इन लेखकों द्वारा बार-बार आत्मकथा लेखन की ओर स्वयं को मोड़ लेना क्या 'नेम एण्ड फेम' पाने की जल्दीबाजी नहीं दर्शाती? प्रायः सभी लेखकों की आत्मकथाओं में एक सी बातों की रूढ़ि बन गयी है। एक ऐसी चीख-पुकार, जो सुनने वाले को आमंत्रिात करती है, पर बदलाव का माद्दा नहीं भर पाती। अनेकशः ये लेखक दुहराव के शिकार हो और बहुत उर्जास्वित नया रच पाने में असमर्थ से दिखने लगते हैं। दलित लेखकों ने अपने स्वानुभूत सत्य के भिन्न-भिन्न रूपों और तहों की उलट-पलट के दौरान कहानी, उपन्यास, कविता, नाटक आदि अन्य क्षेत्रों में पहल की, जो स्वानुभूति के बल पर ही टिकी हैं। एक घेरे में कैद इस लेखन ने दलितों की स्थिति और मानसिकता के बदलाव को कहाँ तक अंजाम दिया है? आज यह सच्चाई किसी से छिपी नहीं है। जाहिर है कि लेखन जब तक इकहरे यथार्थ तक सिमटा रहेगा पुनरावृत्ति की संभावनाएं बढ़ती जायेंगी, नये विकल्प की तलाश भी क्षीण पड़ेगी। अतः अपनी संकुचित दुनियां में भ्रमित होने की बजाय, समग्र रचनाशीलता हेतु अपने सीमित अनुभवों को 'एक्सटेंड' करके, दुनियां और समाज की बहुरंगी सच्चाईयों से समग्रता में सम्बद्धता ही दलित लेखन को और मजबूती प्रदान करेगी।गैर दलित लेखकों ने सहानुभूति के तहत दलित जीवन के प्रति गहरे 'इन्वाल्वमेंट' के साथ दलितों के पक्ष में जो लिखा, उसकी अहमियत परखनी पड़ेगी। चाहे वे प्रेमचन्द हों, निराला या नागार्जुन यदि कहीं दलित द्वारा लिखा गया कुछ व्यवस्था के पक्ष में खड़ा है और उसे भी तवज्जो इसलिए मिले कि दलित ने लिखा है, तो स्थितियाँ उलटवार ही बनेंगी। गुणवत्ता के आधार पर मूल्यांकन होना चाहिए। साहित्य जाति-धर्म के दायरों को निर्मित नहीं करता इन्हें तोड़ता है। सवाल खड़ा होता है कि क्या दलित साहित्य सिर्फ दलितों की ओर से लिखा जायेगा और दलितों द्वारा ही पढ़ा जायेगा? अनुभूत सत्य की अभिव्यक्ति के साथ निर्णायक स्वयं बनना, दूसरे क्या कहेंगे या लिखेंगे इसकी परवाह न करने की बात कहना अविवेकपूर्ण अहमन्यता हैं, क्या गैरदलित जो पाठक समुदाय है, उनकी प्रतिक्रियायें हैं, उन्हें पीछे ढकेलकर वे अपने लिये नयी ठोस, उर्वर जमीन निर्मित करने में समर्थ होंगे? ऐसा साहित्य जो दलितों के जीवन के प्रति आस्था जगाता है, व्यक्ति को पशु स्तर से ऊँचा उठाता है, उन्हें सही मायने में आदमियत प्रदान करने की कवायद करता है। दलित साहित्य का यह सच जब अन्य सवर्णों में प्रसारित होगा तो दलित पक्ष में उनकी संवेदनशीलता बढ़ेगी और संघर्ष की भूमि व्यापक होगी। साहित्य में बंटवारे की पहल चिंतन के बचकानेपन के सिवाय कुछ नहीं है? बांटना और अपना हितसाधन करना यह राजनीतिक जीवन का सच अवश्य रहा। मराठी दलित चिंतन बहुतायत में दलितों द्वारा लिखा गया है, पर ऐसा दुराग्रही नजरिया वहाँ देखने को नहीं मिलता, शायद इसीलिए वहाँ का दलित लेखन ज्यादा समृद्ध, वैविध्यपूर्ण है।भारतीय समाज में स्त्रियाँ तो दलितों में दलित हैं। वह औरत और दलित दोनों के दर्द को गहरे तक झेलती हैं। लेकिन स्त्रियों का यह दुःख-दर्द अभी दलित बौद्धिक जगत में प्रविष्ट नहीं हो पाया है। वहाँ भी इनसे जुड़े सवाल और जवाब उनका वजूद उपेक्षित है। दलित स्त्रियों की पीड़ा दलित लेखकों की आत्मकथाओं से भी गायब है। यहाँ पुरुषवादी शिकंजा दलित स्त्रियों पर वैसा ही कसा है, जैसे कि सवर्ण स्त्रियों पर। वही सड़ांध, वहीं पुरुष वर्चस्ववाद, वही सामंती चौधराहट, वैसी ही संकीर्णतायें। अन्तर यही है कि दलित स्त्री-पुरुषों की तरह श्रम में जुटी हुई है। निश्चित ही हमें न केवल दलित वरन्‌ हर क्षेत्र में नये मानवीय क्षितिज का उद्घाटन करना होगा, जहाँ व्यापक मानवता के गौरव और गरिमा का छीजन संभव न हो।मुश्किलें तब और बढ़ जाती है जब दलित लेखन में पसरा सर्जनात्मक भावबोध सवर्णों के विरोध के बावजूद उनसे दो कदम आगे बढ़कर ब्राह्मणवादी समझ की जकड़न में ही श्रेष्ठतादंभ को जीने लगता है। ये तथाकथित दलित ब्राह्मण बने लेखक अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक दस्तक देने की जल्दीबाजी में सत्ता से सटने और अभिजन समाज तक स्वयं को संकुचित बनाने में कोई परहेज नहीं करते। निःसंदेह चन्द्रभान प्रसाद ऐसे ही लेखक हैं। उन्हें दलित मुक्ति का आन्दोलन तब तक सफल होता नहीं दीखता, ''जब तक दलितों में अभिजात वर्ग का उदय न हो, यह तब तक नहीं होगा, जब तक दलित भारत की सम्पदा में बड़े भागीदार नहीं बन जाते। हमें यह परिस्थितियाँ पैदा करनी होगी, जहाँ भारत के हर प्रमुख शहर में ऐसे सैकड़ों दलित परिवार उभर आयें, जिनके घर के गेट पर एक दरबान खड़ा हो, जिनके पास टोयटा रेंज की कारें हों, कुछ एक के पास मर्क भी हो। ऐसे दलित पति जिनकी पत्नियां आउटगोइंग के लिए आजाद हों, पति को जानलेवा मानसिक परेशानी न हो, जो स्वयं ऐसे दलित माहौल में हो जहां मेहमान दलित महिलाएं लूज ब्लाउज पहनने में स्वयं सहज महसूस कर सके।'' (हंस, अगस्त २००४) जैसा कि उनका स्वयं कहना है कि यह उनकी नवअभ्युदित मध्यमवर्गीय मानसिकता का 'शैशवकाल' ही है। स्पष्ट है कि जब पूंजी का प्रेत सिर पर चढ़कर बोलने लगता है तो भूमि से पैर ऊपर उठते जाते हैं और नीचे की जमीन बंजर होती जाती है। चन्द्रभान प्रसाद उसी बंजर भूमि को उर्वर भूमि में तब्दील करने की चालाकी भरी चाल चल रहे हैं, उनका यह नजरिया रोमानियत भरा ध्वंसात्मक है। लेखक की मानसिकता अभिजात्यता के चकाचौंध से चकराई उसी में धंसने लगी है। समूचे दलित समाज को उपभोक्तावादी भंवर में फंसाने का यह भोला पर कुटिल अंदाज लेखक की नवउदारीकृत जीवन शैली के उत्स में छिपी आत्मघाती व्यक्तिवादिता, अमानुषिकता, सम्बन्धहीनता के प्रवाह में बहने जैसी ट्रेजडी से बढ़कर क्या होगी? विपरीत प्रवाह से जद्दोजहद, संघर्ष एक अस्मिताधर्मी वर्ग की रचनात्मक उपलब्धि हो सकती है न कि उस प्रवाह का अंग बन अपनी उभरती अस्मिता का डूबो देना। श्रम की बजाय पूंजी को 'सफलता की कुंजी' के रूप में देखने का जो दर्शन इधर तीव्रता से 'डेवलप' हुआ है, उससे समझदारी का क्षरण हुआ है। उसी का परिणाम इस प्रकार का अनियन्त्रित चिंतन है, लेखक एक ही दाँव में सब कुछ हासिल कर लेने का दुस्साहस बरतता है। साहित्य में इस तरह का उपभोक्तावाद दलित आंदोलन को पीछे ढकेलेगा, न कि आगे ले जायेगा।जरूरत है दलित लेखक या उनका संगठन कोई दबाव न बनाये, उनकी रचना ही इस तरह का दबाव बनाये कि उन्हें लगे दलित लेखन, लेखन भी है और सृजन भी। कबीर, रैदास आदि अनेक संतों ने पाठकों पर गहरा दबाव बनाया। 'जाति और धर्म को अन्यायियों का छल' कहा। समाज ने उनकी रचनाओं को अक्षय मानकर पढ़ा और सहेजकर रखा। रचना अगर प्रमाणिक होगी तो इसी तरह बचेगी, यह इतिहास का सच है। इस प्रकार दलितों को अपनी संघर्षशील परम्परा के साथ सम्बद्ध हो, जातिगत संकीर्णता के कड़े विरोध के साथ समानता हासिल करनी है, लेकिन आर्थिक-सामाजिक स्वातंत्रय बोध के साथ ही अन्य शोषित-उत्पीड़ित तबके के साथ एका करके। वर्ण और वर्ग दोनों के खिलाफ संघर्ष का टोन ही उनके संघर्ष को दीर्घजीवी बना सकता है। अम्बेडकर और मार्क्सवाद की परस्पर सम्बद्धता आवश्यक है, जिसे आज अनेक दलित लेखक स्वीकार कर रहे हैं। अतः मात्र दूसरों पर दोषारोपण करके उग्र हुआ जा सकता है, सर्जनात्मक नहीं। केवल सवर्ण विरोध, उन तक सिमटा गुस्सा, आक्रोश प्रतिक्रियावादी साबित होगा। उस प्रतिरोध भाव के साथ संघर्षशील विकल्प-भाव को बनाये रखना होगा, तभी दलित लेखन का यह जीवन्त उभार अपने महत्त्व को अक्षुण बनाये रखने में समर्थ होगा।
माता प्रसाद
दलित साहित्य अपमान, शोषण और अपमान की प्रतिक्रिया की दर्दभरी और रोषपूर्ण अभिव्यक्ति है। दलित शब्द का अर्थ - दबाया गया, गिराया गया, दो फाड़ किया गया, अपमानित, शोषित, पीड़ित, वंचित एवं बहिष्कृत आदि है। जब दलित शब्द साहित्य से जुड़ जाता है तो वह दबाये गये, उत्पीड़ित किये गये, अपमानित किये गये, शोषण किये गये और वंचितों का साहित्य हो जाता है। इस साहित्य में जहाँ पीड़ा की चीत्कार होती है वहीं व्यवस्था पर रोषपूर्ण प्रतिकार और उसके उपचार के लिए कड़वी घूट के समान है। इस कड़वी घूँट से कुछ लोग तिलमिला जाते हैं किन्तु अब अधिकांश लोग इसके उद्देश्यों से सहमत होते दिखायी पड़ते हैं।दलित साहित्य में यों तो आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक पक्षों को उजागर किया जाता है लेकिन इसमें सर्वाधिक बल सामाजिक विषमता की खाइयों को पाटने पर जोर दिया जाता है। वर्ण व्यवस्था से उत्पन्न जाति व्यवस्था पर चोट कर समाज में समता की स्थिति पैदा करने का प्रयास किया जाता है। इस प्रकार यह सामाजिक समता का साहित्य है। दलित साहित्य भाग्यवाद, पुनर्जन्म, अंधविश्वास, अवतारवाद, कर्मकाण्ड, मूर्तिपूजा और अंध परम्परा का विरोधी है। यह विज्ञान संबत बातों का समर्थक है। विश्व बंधुत्व स्वतंत्रता, लोकतंत्र, समता, न्याय सेक्युलरिज्म को मानता है। रंग, वर्ण, जाति, लिंग, क्षेत्रावाद और पूंजीवाद का विरोधी है। दलित साहित्य का केन्द्र बिन्दु मनुष्य है। डॉ० अम्बेडकर के सामाजिक संघर्षों से यह प्रेरित है। दलित साहित्य तथागत गौतमबुद्ध की इस बात को भी मानता है कि जिसमें उन्होंने कहा था कि किसी ग्रन्थ में जो लिखा है उसे सही मत मानो, परम्परा में कोई बात चली आयी है उसे मत मानो, महापुरुषों ने कहा है उसे सही मत मानो, मैं भी जो कह रहा हूं उसे भी सही मत मानो बल्कि अपनी बुद्धि, विवेक और तर्क से जिस बात को सही समझो उसे ही सही मानो और उसी पर चलो।कुछ समय पहले दलित साहित्य को लोग अलगाववादी और जातिवादी साहित्य मानते थे इसलिए दलित साहित्य का विरोध होता था, किन्तु अब धीरे-धीरे लोगों की इस धारणा में परिवर्तन आता जा रहा है। क्योंकि जब तक समाज में दलित साहित्य की स्थिति को भी नकारा नहीं जा सकता है। मराठी, गुजराती, कन्नड़, पंजाबी और मलयालम में पर्याप्त मात्रा में साहित्य लिखे जा रहे हैं। हिन्दी साहित्य में भी दलित साहित्य की तरफ रूझान बढ़ रही है। हिन्दी की कई पत्रिकाओं ने दलित साहित्य पर अपने विशेषांक निकाले हैं। इस समय देश के विश्व विद्यालयों में अनेक छात्र दलित साहित्य पर शोध कार्य कर रहे हैं कुछ को तो इस कार्य पर एम०फिल्‌ और पी-एच०डी० की उपाधि भी मिल चुकी है।दलित साहित्य की पहचान उसकी सरल भाषा है। साहित्य में जो लिखा जाता है साधारण लोग भी उसकी भावना से अवगत हों इसलिए इसकी भाषा में क्लिष्टता, चमत्कारिता, छंद एवं अलंकार का अभाव होता है। दलित साहित्य में अन्यायों के विरुद्ध लिखा जाता है इसलिए इसकी भाषा कटु और चुटीली भी होती है कहीं अपमान से उत्पन्न प्रतिकार की भावना होती है इसलिए कुछ लोगों को यह पसंद नहीं आती और वे इसे साहित्य की श्रेणी में नहीं मानते।दलित साहित्य लेखन के सम्बन्ध में यह प्रश्न उठाया जाता है कि दलित साहित्य दलित ही लिख सकता है यह उचित नहीं है, बल्कि गैर दलित साहित्यकार भी दलित साहित्यकार हो सकते हैं जैसे - प्रेमचन्द, निराला, नागर, नागार्जुन और धूमिल आदि ने दलितों पर अच्छा साहित्य लिखा है इसलिए यह भी दलित साहित्यकार की श्रेणी में आते हैं। इस सम्बन्ध में यह निवेदन करना है कि दलित साहित्य भुक्त भोगियों का साहित्य है।जाके पांव न फटी बेवाई, वह का जाने पीर पराई।जिस व्यक्ति के पांव में कांटा चुभता है उसको जो पीड़ा होती है वह पीड़ा कांटा चुभे व्यक्ति को देखने वाले को नहीं हो सकती। उसके प्रति उसकी सहानुभूति तो हो सकती है किन्तु पीड़ा नहीं। इस प्रकार दलित साहित्य स्वानुभूति का साहित्य है और दूसरे लोग दलित की पीड़ा से जो साहित्य लिखते हैं वह सहानुभूति का साहित्य है फिर भी जिन गैर दलित साहित्यकारों ने सहानुभूति के हिसाब से ही दलितों की पीड़ा को समाज के सामने रखा है उनका मैं हृदय से सम्मान करता हूँ। प्रेमचन्द, निराला, नागार्जुन, नागर आदि ने अपने साहित्य में दलितों की जो स्थिति अभिव्यक्ति की है वह दलित साहित्यकार के नाते नहीं एक ऊँचे साहित्यकार होने के नाते उनकी दृष्टि में दलित भी ओझल नहीं हो सका। इस सम्बन्ध में डॉ० रमणिका गुप्ता कहती हैं -''प्रेमचन्द और निराला ने कतई इसे दलित साहित्य की दृष्टि से नहीं लिखा बल्कि मानवीय दृष्टि या जनवादी और प्रगतिशील दृष्टि से अथवा समाज की विकृतियों के विरोध स्वरूप लिखा था और उसकी जनवादी दृष्टि का केन्द्र भी मनुष्य ही था यह उनकी दलितों के प्रति सहानुभूति थी, दलितों की चेतना की दृष्टि नहीं। उनमें वर्गीय समानता की बात मुखर थी।''(डॉ० रमणिका गुप्ता, दलित साहित्य की परिभाषा और सीमाएं, पृष्ठ ६-७)वर्तमान काल में दलित साहित्यकार प्रचुर मात्रा में साहित्य के विविध स्वरूपों पर रचना कर रहे हैं। हिन्दी के अतिरिक्त मराठी, गुजराती, पंजाबी, तेलगू, मलयालम, कन्नड़ और बांगला में दलित साहित्य लिखे जा रहे हैं। हिन्दी की सभी विधाओं में यथा कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, समीक्षा, आलेख, शोध ग्रन्थ, आत्म कथा, लेखन और पत्रा सम्पादन पर्याप्त मात्रा में किये जा रहे हैं जो दलित साहित्य के उज्ज्वल भविष्य के प्रतीक हैं।दलित साहित्य के कुछ साहित्यकार तो हिन्दी के नामी साहित्यकारों से लेखन में टक्कर लेते दिखायी पड़ रहे हैं इनमें डॉ० जय प्रकाश कर्दम, डॉ० एन० सिंह, श्री कंवल भारती, डॉ० धर्मवीर, डॉ० तेज सिंह, ओम प्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिशराय, डॉ० पुरुषोत्तम सत्यप्रेमी, एन० सागर, सी०बी० भारती, डॉ० कुसुम वियोगी, विपिन बिहारी, पारस नाथ, डॉ० श्योराज सिंह बेचैन, सूरजपाल चौहान, दयानन्द बटोही, डॉ० प्रेमशंकर, डॉ० सुशीला टाक भौरे, डॉ० बी०आर० जाटव, डॉ० सोहनपाल सुमनाक्षर, डॉ० अवन्तिका प्रसाद मरमट, डॉ० चमन लाल, डॉ० रघुवीर सिंह, डॉ० तारा परमार, बुद्ध शरण हंस, ईश कुमार गंगानिया के नाम प्रमुख रूप से लिये जा सकते हैं।
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टिप्पणी  

Posted by डा. फीरोज़ अहमद in

दलित मुसलमानों सामाजिक त्रासदी पर टिप्पणी
सुरेशचंद गुप्ता

काफ़ी विस्तृत विश्लेषण किया है आपने. मैं एक भारतीय हिन्दू हूँ और यह मानता हूँ कि हर नागरिक को अपना जीवन स्तर सुधारने के समुचित समान अवसर मिलने चाहियें. पर यह अवसर धर्म, जाति, भाषा, स्थान आदि के आधार पर नहीं होने चाहियें.गरीबी और पिछड़ापन ही इस के लिए एकमात्र आधार होना चाहिए. सरकार गरीबों और पिछड़ों को इंसान के रूप में नहीं बल्कि एक वोट के रूप में देखती है. यही रवैया बाकी राजनितिक दलों का भी है. अफ़सोस इस बात का है कि यह गरीब और पिछड़े लोग ख़ुद को भी एक वोट के रूप में ही देखने लगे हैं. वोट लेने के लिए सरकारें और राजनितिक दल इन्हें धर्म, जाति, भाषा के आधार पर बांटते है, सारे कार्यक्रम इसी आधार पर तैयार किए जाते हैं. राजनीतिबाजों के दलाल इन्हें गुमराह करते हैं. मदद का एक बहुत छोटा हिस्सा ही इन तक पहुँच पाता है. इसका एक ही उपाय है. गरीब और पिछड़े स्वयं को धर्म और जाति के पैमाने से नापना बंद कर दें. आरक्षण और किसी अन्य सहायता के लिए वह अपने धर्म और जाति की बात न करें. केवल अपनी गरीबी और पिछड़ेपन की बात करें. पर क्या ऐसा सम्भव है?
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दलित मुसलमानों की सामाजिक त्रासदी  

Posted by डा. फीरोज़ अहमद in

डॉ० तारिक असलम
भारतीय समाज की यह कैसी विडम्बनापूर्ण त्रासदी है कि यहाँ की बहुसंख्यक जातियां दलितों के रूप में पहचान रखती हैं, जिसमें से कुछ एक जातियों को राज्य एवं केन्द्र के आरक्षण पैनल में विशेष महत्त्व प्रदान किया गया है और बहुत सारी जातियों को नजरअंदाज कर दिया गया है। इस मुद्दे पर मेरी सोच थी कि मुसलमानों के लिए आरक्षण की मांग करना सर्वथा अनुचित है, दूसरे यदि आरक्षण देना अनिवार्य है तो फिर समस्त जातियों में ऐसे परिवारों या व्यक्तियों की पहचान होनी चाहिए जो आर्थिक रूप से पिछड़े हैं और अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान को बनाये रखने में असक्षम सिद्ध हुए हैं।वर्तमान आरक्षण व्यवस्था के अनुसार अनुसूचित एवं जन जातियों को सर्वाधिक सुविधाएं मिली हैं और उन्होंने सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक स्तर पर विकास भी किया है। जिसके बाद होना यह चाहिए था कि जिन जातियों को आरक्षण की सुविधा मुहैया करायी गई और उन परिवारों के सदस्यों ने स्वालम्बन की दिशा में चहुंमुखी प्रगति दर्ज की। उनको आरक्षण से वंचित करते हुए, उसी समूह के अन्य व्यक्तियों को लक्ष्य समूह की सुविधाएं मिलें किन्तु सामाजिक स्तर पर देखने को यही मिल रहा है कि जिन अनुसूचित जातियों एवं जन जातियों को ''विशेष अभियान'' के तहत सरकारी सेवाओं, संस्थानों, पब्लिक सेक्टर कम्पनियों आदि में नियुक्तियां हो रही हैं। वे कुछ परिवार ही नाली के कीड़े सी जिन्दगी छोड़कर विलासितापूर्ण जीवन यापन में संलग्न दिख रहे हैं। ऐसे कई एक परिवारों के मूल्यांकन के बाद में इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि जो अपना जीवन स्तर सुधारने में सफल हो गया। वह व्यक्ति भी अपने परिवार के पीछे रह गए लोगों से कन्नी काटता है और उनके प्रति घोर अन्यायपूर्ण, अनुचित व्यवहार करता प्रतीत होता है।एक ओर देश भर में सरकारी स्तर पर चल रही विकास योजनाओं में विशेषकर गृह निर्माण संबंधी सामान्य इन्दिरा आवास योजना एवं प्रधानमंत्री आवास योजना के अन्तर्गत जिला उप विकास आयुक्त के द्वारा सरकारी निर्देश के आलोक में न्यूनतम ६० प्रतिशत आवास निर्माण एवं मरम्मती कार्य की स्पष्ट अनुशंसा की जाती है और इस प्रतिशत से कम लाभार्थियों के चयन पर दंडित करने संबंधी कार्रवाही का उल्लेख होता है। दूसरी ओर इन्हीं योजनाओं में अत्यंत पिछड़ी जाति को १७ प्रतिशत विकलांग एवं अन्य को ३ प्रतिशत, पिछड़ी जातियों को १० प्रतिशत तथा अल्पसंख्यक को भी १० प्रतिशत लाभ देने का आदेश है। गौरतलब सवाल यह है कि बहुत सारे प्रखंड क्षेत्रों में अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जन जातियों की संख्या काफी कम होने के बावजूद मानक प्रतिशत के अनुरूप लक्ष्य प्राप्ति पर जोर दिया जाता है, जिससे पंचायतों के मुखियाओं के समक्ष एक गंभीर समस्या खड़ी हो जाती है क्योंकि उनके पंचायत में अल्पसंख्यकों की जनसंख्या अधिक होती है अब यदि एक पंचायत में कुल दस यूनिटें गृह निर्माण हेतु प्राप्त होती हैं तो उसमें मुसलमानों का हिस्सा मात्र एक यूनिट बनता है। इस संबंध में पंचायत समिति के अलावा प्रमुख द्वारा आयोजित बैठकों में प्रस्ताव पारित कर जिला पदाधिकारी एवं जिला उप विकास आयुक्त को पत्र लिखने के साक्ष्य भी उपलब्ध हैं किन्तु उन कार्यालयों से कभी कोई तर्क संगत उत्तर प्राप्त नहीं हुआ।बिहार राज्य की पिछड़ी एवं अत्यंत पिछड़ी जातियों के वर्णन से पूर्व मैंने यह स्पष्ट करना आवश्यक समझा तो इसके कई कारण हैं जैसे कि बिहार में अल्पसंख्यक वित्त निगम, जिला उद्योग केन्द्र, स्वर्ण जयंती ग्रामस्वरोजगार योजना आदि के अन्तर्गत भी आम मुसलमानों को आर्थिक सहायता अथवा ऋण दाल में नमक के बराबर ही उपलब्ध होता है। मैंने बहुत करीब से देखा है कि यदि कोई मुस्लिम आवेदक किसी कार्य को आरंभ करने के लिए ऋण आवेदन प्रस्तुत करता है तो कार्यालय कर्मियों द्वारा कई प्रकार के अनावश्यक व्यवधान उपस्थित किये जाते हैं। यहां तक मैं स्वयं अनुभव करता हूँ कि उनके नामों को प्रखंड स्तरीय गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों के लक्ष्य समूह सूची में नाम शामिल करने में कोताही बरती जाती है।केवल बिहार में ही नहीं बल्कि मैं पूरे देश के स्तर पर शिद्दत से अनुभव करता हूँ और देखता हूँ कि एक सुनियोजित षड्यंत्र के रूप में मुसलमानों को आर्थिक, सामाजिक एवं शैक्षणिक स्तर पर पिछड़ेपन के साथ जीवन यापन को विवश किया जा रहा है। उस पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के एक नहीं अनेक स्तरों पर प्रयास किये जा रहे हैं जिसमें उनकी दहशतगर्दों, आतंकवादी, उग्रवादी आदि के लेबलों से नवाजने के बाद ''इस्लामी आतंकवादी'' का जामा पहनाया जा चुका है और इसकी सजाएं भी भारतीय मुसलमान भुगतते नजर आ रहे हैं। वह दिन ज्यादा दूर नहीं है जो शिक्षित और बुद्धिजीवी मुसलमान इस भ्रम में पड़े हैं कि इससे उनका क्या नुकसान है? इन आरोपों के दायरे में वह कहीं नहीं आते? यह मुगालता के सिवा कुछ नहीं है? जिन मदरसों में पिछड़ी और अत्यन्त पिछड़ी जातियों की ८० प्रतिशत बच्चे-बच्चियाँ दीनी (धार्मिक) और दुनियावी (सांसारिक) शिक्षाएँ प्राप्त करते हैं। उन मदरसों को इस्लामी आतंकवाद का प्रशिक्षण केन्द्र घोषित करने की विश्व स्तरीय योजनाओं को साकार कर पूरे मुस्लिम वर्ल्ड को ''बारूद'' का ढेर साबित करने की लाबिंग हो रही है। उसके प्रति किसी उच्च जाति के मुसलमान का ध्यान नहीं है। पिछड़े तो अपनी दाल रोटी की जुगाड़ में बेहाल हैं और शिक्षित, नौकरी पेशा, सुविधा संपन्न मुस्लिम जातियाँ अपने महलों में स्वयं को सुरक्षित महसूस कर रही हैं। इसका एक दिन खमियाजा भुगतना होगा।बिहार में मुस्लिम पिछड़ी जातियों के अन्तर्गत कलन्दर, चीक, चुड़िहार, दफाली, धोबी, धुनिया, नट, नालबंद, पामरिया, भठियारा, मदारी, मेहतर, लालबेगी, हलालखोर और भंगी, मिरयासिन, मुकेरी, रंगरेज, राइन, साईं, इदरीसी (दर्जी) इत्यादि को स्थान दिया गया है। यह नाम पिछड़ा वर्ग आयोग के तृतीय प्रतिवेदन के लिए गए हैं जो परिशिष्ट-६ के अन्तर्गत आयोग द्वारा तैयार की गई अन्य पिछड़े वर्गों की सूची में शामिल हैं। उक्त जातियों की जिलेवार जनसंख्या क्या है? मेरी समझ से सरकार या फिर संबंधित आयोग ने सर्वेक्षण कराने का कष्ट उठाना उचित नहीं समझा, यदि इदरीसी जाति और रंगरेज जातियों को पिछड़ी जाति से उठाकर अत्यन्त पिछड़ी जाति के श्रेणी में स्थान दिया गया तो इसके लिए उक्त जातियों के समूहों द्वारा संगठित होकर किये गए प्रयास हैं, जिससे इदरीसी जाति एवं रंगरेज जाति को सामाजिक स्थिति सुधारने में कोई सफलता मिली हो अथवा नहीं। इन जातियों के संगठन संचालकों को पौ बारह अवश्य हुए हैं। इदरीसी जाति के लोगों ने गत दिनों पटना में वार्षिक सम्मेलन का आयोजन किया था, जिसमें महज इस बिरादरी के लोग अपने बच्चों की शादी ब्याह और अपने स्तर के लोगों के चयन में व्यस्त देखे गए। संगठन के रहनुमाओं के पास इनकी शिक्षा-दीक्षा, मान-सम्मान, धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक स्थिति में परिवर्तन के लिए कोई न तो प्रस्ताव सामने आया और न ही विकास योजना की सार्थक रूपरेखा प्रस्तुत की गई। अब यह संगठन एक राजनीतिक दल की छांव में सासें ले रहा है और उसके हाथों दर्जियों को नीलाम करने की घोषणाएं करने में जुटा है।इदरीसी बिरादरी की औरतें और मर्द आर्थिक तंगहाली के कारण सारा दिन मेहनत करती हैं। पुरुष कपड़े की दुकानों, हाट, बाजारों, चबूतरों, घरों में गांव-घर के कपड़े सिलाई करते हैं तो औरतें तीज-त्यौहारों, शादी-ब्याह में देने योग्य गुड्डे, गुड़िया, हाथी, घोड़े, बटुए, काज बटन, तुरपई, औरतों के लिए खुले (एक प्रकार का औरतों का जेबदार कुर्ती) हाथों से तैयार करती हैं।आज से अधिक नहीं बीस-पचीस साल पहले तक दर्जी जो खानदानी होते थे, वे गांव के पूरे कपड़े सिलाई करते थे। कुछ दर्जी स्वर्ण जाति, धनिकों से साल भर की सिलाई के एवज में जजमनिका लेते थे। उनको बड़े किसान साल में एक मुश्त फसल कटाई के समय धान-गेहूं देते थे किन्तु खानदानी दर्जियों के बुरे दिन तब शुरु हुए, जबकि पेंशन का बोलबाला बढ़ा। युवक ''टेलरिंग हाउस'' की ओर रुख करने लगे। इससे चालाक, होशियार और आर्थिक रूप से कुछ समर्थ परिवारों ने अपने लड़कों को पेंशन के अनुसार आधुनिक डिजाइन के कपड़ों की सिलाई के लिए पटना, दिल्ली, लुधियाना भेज कर प्रशिक्षित करा कर शहरों में दुकानें खोल लीं या फिर दूसरे राज्यों के गारमेंट मेन्युफेक्चरिंग कंपनियों में सिलाई-कटाई करने लगे। जबकि उम्र की ढलान पर पहुंच चुके दर्जी दरवाजों पर लंगोटा और महावीरी झंडा सिलाई कर रोटी-प्याज की जुगत में जीवन गंवाते रहे।ऐसे एक नहीं सैंकड़ों परिवारों से मिलने के बाद यह रहस्य खुला है कि दर्जी का कार्य करने वाले खानदानी दर्जियों की संख्या तेजी से घटी है। वह अपने बिरादरी के पेशे से पेट भरने में नाकाम रहे हैं। संभवतः इसी कारण टेंट-शामियाना का काम भी पेशेवराना तौर पर अपनाया। इस पेशे में बड़ी पूंजी की आवश्यकता होती है। अतः यह भी इनके हाथों से निकल कर गैर बिरादरियों के कब्जे में जा चुका है। इन दिनों दर्जी का बड़े पैमाने पर काम करने वाले लोगों में मोमिन, शेख, पठान, सैयद के अलावा अनेक हिन्दू जातियां भी शामिल हो चुकी हैं। इन लोगों का इस पेशे पर एकाधिकार कायम हो चुका है और दर्जी बिरादरी भूखों मरती अथवा सड़कों पर अड़े, प्लास्टिक, साइकिल मरम्मती कार्य करते दिखाई देती है चूंकि ये आर्थिक रूप से पिछड़े हैं। शिक्षा के नाम पर मदरसे की तालीम से आगे नहीं बढ़ा पाते। ये लोग धार्मिक स्तर पर स्वयं को पैगम्बर हजरत इदरीस अलैहिस्सलाम का पैरोकार मानते हैं, जो अपने जीवन काल में लोगों को शिक्षित करने के अलावा जीवन यापन के लिए सिलाई का काम किया करते थे, आज ये बिरादरी आर्थिक रूप से विपन्नता, अर्कमण्यता का शिकार है तो महज इसलिए कि इनको खोज खबर लेने के लिए कोई तैयार नहीं है। इस बिरादरी में शिक्षा का स्तर ५ प्रतिशत से अधिक नहीं है।उक्त स्थितियों की दृष्टिगत रखते हुए सरकार ने बिहार में पदों एवं सेवाओं की रिक्तियों में आरक्षण अधिनियम-१९९१ की अनुसूची-१ में इदरीसी जाति (दर्जी) को जोड़ने के संबंध में कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग द्वारा संकल्प प्रकाशित किया गया। यह निर्णय ''पिछड़े वर्गों के लिए राज्य आयोग'' द्वारा की गई अनुशंसा के आलोक में बिहार अधिनियम-३, १९९२ की पिछड़े वर्गों की सूची (अनुसूची-२) के क्रमांक-३२ पर अंकित इदरीसी (दर्जी) जाति को विलोपित कर अत्यन्त पिछड़ी जाति की सूची (अनुसूची-२) के क्रमांक १०७ पर अंकित किया गया। लेकिन यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि सरकार द्वारा आरक्षण दे देने मात्र से इस बिरादरी की समस्याओं का अन्त नहीं होगा, बल्कि इसके लिए ईमानदार, कौमपरस्त, कर्तव्यपरायण, निस्वार्थ भाव से सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए सुनियोजित तरीके से सामाजिक नेताओं और दिगर रहनुमाओं को भी कोशिश करनी होगी।इसी प्रकार राज्य सरकार ने रंगरेजों की सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक स्तर पर एक सर्वेक्षण प्रखंड स्तर पर निर्गत किया तो मैंने देखा कि कई कार्यालयों में उस सर्वेक्षण प्रतिवेदन का नजरअंदाज कर दिया गया। दोबारा पुनः यही सर्वेक्षण पत्र कार्यालयों को उपलब्ध कराया गया। जिसकी वास्तविक स्थितियों का आकलन के अनुरूप प्रतिवेदन सरकार को भेजवाने में स्वयं दिलचस्पी लेनी पड़ी। मुझे यह कहते हुए कोई हिचक नहीं कि बिहार भर से प्राप्त प्रतिवेदनों का निष्कर्ष सार्थक रूप में सामने आया और कपड़े रंगने के पेशेवर बिरादरी जो अपना पेशा छोड़कर कई दूसरे पेशों को अपनाये हुए थी, उसे पिछड़े वर्ग के लिए गठित राज्य आयोग द्वारा अन्य पिछड़े वर्गों की अनुसूची-२ के क्रमांक २४ से विलोपित कर अत्यन्त पिछड़ी जाति की अनुसूची-१ में सम्मिलित किया गया। यह संकल्प, बिहार सरकार के कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग के ज्ञापांक-११/वि २-पि०व०आ०-०४/२००० का० २११/पटना १५.१०.२००१ के माध्यम से जारी हुआ था।प्रख्यात लेखक एवं विद्वान जाबिर हुसेन ने अपनी एक पुस्तिका ''बिहार में पिछड़ी मुस्लिम आबादियाँ'' में एक विचारणीय प्रश्न उठाया है कि, खासतौर से इस बात का खुलासा होना चाहिए कि मुस्लिम समाज के पिछड़े एवं अत्यंत पिछड़े पेशागत समूहों के सार्वजनिक हितों से जुड़ी संस्थाओं में रोजगार अवसरों की बंदरबांट में इन उत्पीड़ित मुस्लिम आबादियों को किस हद तक नुमाइंदगी मिली है?''इस पुस्तिका में दक्षिण बिहार में आबाद जातियों को विशेष रूप से चर्चा करते हुए कुलहयया, विभिन्न नामों से जाने जाने वाले शेरशाहाबादी समुदाय, चूड़िहार, इदरीसी, जुलाहा, राईन अथवा कुंजड़ा, गद्दी, धुनिया आदि की सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक एवं धार्मिक स्थिति की चर्चा की है, जिस पर नये सिरे से चर्चा की आवश्यकता महसूस करता हूं मैं। कारण कि क्या किसी बिरादरी को केवल आरक्षण सुविधा प्रदान कर देने से ही उसकी आर्थिक विपन्नता, सामाजिक संकीर्णता और शैक्षणिक पिछड़ेपन से मुक्त स्वीकार किया जाना चाहिए? वास्तव में ऐसा नहीं है इसलिए धूम फिर कर कहीं काफिले के रूप में खेमाजन कलन्दर जाति, खस्सों या मुर्गे का गोश्त बेचने वाले चीक, संभ्रान्त परिवार से लेकर निर्धन बहू-बेटियों के हाथों में चूड़ियां डालने वाली चूड़िहारिनों, सिर पर टोकरे में औरतों की जरूरत की चीजें घूम-घूमकर बेचने वाली दफालिनों, सबके गन्दे कपड़े साफ करने और गधों के साथ जिन्दगी जीने वाले मुस्लिम धोबियों, हजामत बनाने के लिए ईंट लगा कर बैठे या दरवाजे-दाढ़ी साफ करने, बाल बनाने के काम में जुटे नाइयों, जिसे बतौर मेहनताना एक-दो रुपये मिलते हैं। जबकि सैलून में पांच-दस रुपये जाड़े के दिनों में रुई धुनकर तोश्क-रजाई तैयार करने में महारथ रखने वाले धुनिया, नाच, गाकर और कई दूसरे काम करके जीवन यापन करने वाले पामरिया, कभी रस्सियों पर, कभी बन्दरों के साथ तमाशा दिखाते मदारी वालों, शादी ब्याह के अवसर पर औरतों के बीच गीत गाने वाली मिरयासिनों, गली-मुहल्ले से लेकर बाजार तक सब्जि+यां बेचने वाले सब्जी फरोशों, भीख मांगकर गुजर करने वाले साई जातियों को आरक्षण की सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो सकी हैं।इसकी अनेक वजहें हैं। सर्वप्रथम तो इन जातियों में अशिक्षा का स्तर शत-प्रतिशत शून्य है। ये अपने को सामाजिक स्तर पर संगठित नहीं कर पाये हैं। इनका कोई नेता या रहनुमा नहीं है। सरकार के दरबार में कोई पैरवीकार नहीं है जो पिछड़ी जातियां किसी प्रकार आरक्षण लाभ ले चुकी हैं। वे अपने को किसी-न-किसी सरकार में शामिल राजनीतिक दल का पक्षधर बताते हैं। उनको केवल अपनी बिरादरी का वोट जुटाने में सफलता दिखती है। तात्पर्य यह है कि मुस्लिम उच्च जातियां हों या पिछड़ी जातियां सबने जेबी संस्थाएं बना रखी हैं, जिसमें दूसरी किसी जाति के लिए कोई जगह नहीं है। वास्तव में इन जातियों को हिन्दू दलित जातियों के समकक्ष सुविधाएं मिलनी चाहिए और आज स्वतंत्रा भारत में सही मायने में कोई दलित होने की शर्तें पूरी करता है तो ये केवल भारतीय मुसलमान हैं। ये उच्च जाति के हों या निम्न जाति के, यह सब देखने की अपेक्षा आर्थिक आधार पर आर्थिक एवं आरक्षण सुविधाएं दी जानी चाहिए, जिनके बारे में किसी को कोई चिन्ता नहीं है। जिनके समक्ष अस्तित्व संघर्ष की समस्या सुरक्षा के समान मुंह फाड़े खड़ी है। इन जातियों के प्रति स्वर्ण मुस्लिम जातियों ने अपना रुख परिवर्तित नहीं किया तो निश्चित रूप से एक दिन ये लोग किसी और धर्म को स्वीकारेंगे जैसा कि प्रतिदिन हिन्दुओं की एक बड़ी जमात ईसाई धर्म स्वीकार रही है और उत्तर पूर्व भारत का एक बड़ा भाग ईसाईयत की चपेट में आ चुका है।ये मुस्लिम दलित जातियां वास्तव में नाम की मुसलमान हैं। ये धार्मिक रूप से केवल अपने नामों से पहचान रखती हैं। ईद-बकरीद के वक्त मस्जिदों में सज्दे कर लेती है अलावा इसके धार्मिक रूप से पूरे तौर पर ज्ञान शून्य होती हैं। ऐसे ही एक व्यक्ति के नाम के साथ रामायण नट एक आवेदन पत्रा पर पढ़ने को मिला। मैं चौंका। चूंकि उसने अपनी जाति मुस्लिम नट लिखा था। उससे पूछने पर ज्ञात हुआ कि नाम बाप-दादा का रखा है। हम मुसलमान हैं। किन्तु जब पूछा गया कि, ''मुसलमान होने की पहचान क्या है?'' तो उसने कोई प्रतिउत्तर नहीं दिया। तो मेरी समझ और सर्वेक्षणों से यह साफ हो चुका है कि न केवल बिहार में बल्कि देश में नाम भर के मुसलमानों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। मुस्लिम अंगड़ी जाति हो या पिछड़ी जाति यह सबके लिए एक चेतावनी है कि उन्होंने जिस बेरहमी से अपनी मातृभाषा उर्दू, धार्मिक क्रिया-कलापों, संस्कारों, मान्यताओं, परंपराओं आदि को तिलांजलि देने का सिलसिला आरंभ किया है। इसके परिणाम बेहद घातक होंगे।यह एक शगूफा नहीं समझा जाए। ऐसे कई एक मुस्लिम पदाधिकारी नजरों के सामने हैं जो अपने बच्चों को धार्मिक शिक्षा से दूरी बढ़ाते दिख रहे हैं और ऐसे स्कूलों में शिक्षा दिलवा रहे हैं जहां उनकी मातृभाषा की पढ़ाई नहीं होती है, जिसके स्थान पर उनके बच्चे हिन्दी और संस्कृत की पढ़ाई कर रहे हैं। ऐसे शिक्षित मुसलमानों से इस्लामी सभ्यता एवं संस्कृति की क्या रक्षा होगी? यह सोचें और गौर करें? हम किधर जा रहे हैं। भारत की धार्मिक जन सांख्यिकी पर शोध करने वाली संस्था इंडिया फर्स्ट फाउंडेशन, नई दिल्ली ने अपनी पुस्तक में ९६.५ प्रतिशत देशवासियों को हिंदू करार दिया है, जिसमें भारतीय धर्मानुयायी के रूप में मुसलमानों का प्रतिशत गायब है? जबकि इसी पुस्तक के एक अध्याय भावी प्रवृत्तियों का पूर्वानुमान के तौर पर स्पष्ट रूप से पृष्ठ २४ पर लिखा है, ''यदि अंतिम सौ वर्षों की प्रवृत्तियाँ भविष्य में भी बनी रहीं तो भारतीय धर्मानुयायियों का वर्ग निकट भविष्य में भारत में अल्पसंख्यक बन जाएगा।''उक्त संभावना व्यक्त करने के पीछे कई तथ्य सक्रिय रहे हैं। मसलन, देश में मुसलमानों की आबादी तेजी से बढ़ी है और हिंदू दलित जातियों ने बड़े पैमाने पर ईसाई, इस्लाम धर्म स्वीकार किया है और ये अधिक कट्टरता प्रदर्शित करते दिखे हैं, जबकि सदियों से मुसलमान का चोला पहने भारतीय मुसलमान अपनी पहचान खोने लगे हैं। ये अस्तित्व संघर्ष की तीव्रता के कारण संभव हुआ है। असहाय, लाचार, गरीब, मुसलमानों की किसी को सुध लेने की फुर्सत नहीं है, प्रत्येक जाति-बिरादरी ने अलग-अलग खेमे और गुट बना रखे हैं और अपनों को लाभान्वित करने में ही सफलता देख रहे हैं।यह कटु सत्य है कि जो मुसलमान मस्जिद में कांधे से कांधा मिलाये नमाजें अदा करते दिखाई पड़ते हैं। वही मस्जिद की सीढ़ियां उतरे अनेक जातियों का चोला पहन लेते हैं। ऐसे व्यक्ति और संगठन दोनों ही समाज की विकलांगता को बढ़ावा देने के लिए उत्तरदायी कहे जाएगें।जिन दलित मुसलमानों की चिंता सुविधा संपन्न मुसलमानों और उच्च जाति के लोगों को होनी चाहिए। वे ही उनको अपने सामने बराबरी का अधिकार देने से कतराते हैं। निम्नवर्गीय उत्पीड़ित, पद दलित मुसलमानों से भेदभाव और अलगाव का परिणाम यह निकला है कि पिछड़ी जातियां भी दूर से सलाम करने में कोताही बरतने लगी हैं। एक पिछड़ी जाति मोमिन (अंसारी) ने प्रत्येक स्तर पर अपनी सफलता के डे गाढ़ने में कामयाबी हासिल की, तो इसका कारण यह रहा है कि उनको अब्दुल क्यूम अंसारी जैसा रहनुमा मिला और इस बिरादरी ने कांग्रेस का विभाजन के समय साथ दिया, जबकि इदरीसी बिरादरी मोमिनों से अधिक आरक्षण का दावेदार होने के बावजूद उक्त सुविधाओं यानी आरक्षण और छात्रवृत्ति से वंचित रह गई तो महज इसलिए कि उनके पास कोई रहनुमा नहीं था और वे मुस्लिम लीग का समर्थन करने की भूल कर चुके थे। जिसका खमियाजा पचास से अधिक सालों तक भुगतना पड़ा। दूसरी ओर अपने कौम के लोग भी दलित मुसलमानों के लिए अधिक प्रयत्नशील नहीं दिखे। उनके सामाजिक आर्थिक, शैक्षणिक पिछड़ेपन को बरकरार रखने में भलाई देखी ताकि वे उच्च मुस्लिम जातियों के बन्धुआ बने रहें और उनकी जूतियां खाते और रोटियां चबाते रहें। इस सोच ने भी मुसलमानों का बहुत अहित किया है।एक और अपनों की साजिशें दूसरी ओर देश की बहुसंख्यक जाति के एक विशेष वर्ग द्वारा मुसलमानों को आर्थिक रूप से बाजार, व्यापार, कारोबार, उद्योग-धंधों में आगे नहीं निकलने देने की लगातार कोशिशें और ऊपर से दंगे-फसाद। यह दंगा भागलपुर के स्लिक उद्योग, मुम्बई के कारोबारियों और गुजरात के मुस्लिम उद्योगपतियों को काफी कमर तोड़ चुका है। कहने का अर्थ यह कि भविष्य में मुसलमानों को न केवल धार्मिक बल्कि शैक्षणिक एवं आर्थिक, सामाजिक स्तर पर भी एकजुटता दर्शाते हुए प्रयास करने होंगे। आपसी भेदभाव, ऊँच-नीच, जात-पात की लानत से मुक्ति हासिल करनी होगी वरना वह दिन दूर नहीं, जबकि मुसलमान अपने प्रति अपनाये गए अनेक स्तरीय उपेक्षाओं से तंगहाली, गरीबी और भेड़चाल से आजिज आकर कोई और धर्म स्वीकारने लगें। दलित मुसलमानों के आगे उपस्थित इस खतरे को समझना होगा और उनके सामाजिक, आर्थिक शैक्षणिक उत्थान एवं सम्मानजनक स्थिति के लिए प्रयास करने होंगे। तमाम सरकारी योजनाओं का पिछड़े मुसलमानों को शत-प्रतिशत लाभ मिले। यह हम सबको सुनिश्चित करते हुए, दूसरी मांगों की पूर्ति की कोशिश भी करनी पड़ेगी। क्योंकि एक मोमिन जाति को छोड़कर किसी अन्य आरक्षण प्राप्त जाति की स्थिति में अपेक्षित सुधार मुझे नहीं दिख रहा है, जैसा कि दिखाई देना चाहिए पूरे समाज को।उल्लेखनीय है कि बिहार राज्य में मुसलमानों की कुल जनसंख्या १९९१ की जनगणना के अनुसार १४.८१ प्रतिशत है। इस आबादी का अधिकांश हिस्सा दलित, उत्पीड़ित, प्रताड़ित एवं आर्थिक रूप से पिछड़े मुसलमानों की है, जिसके लिए प्रत्येक चुनावी मौसम में प्रत्येक दल आश्वासनों की बरसात करते हैं और चुनाव जीतते ही सावन की बड़ी जेठ के सुखाड़ में तब्दील हो जाती है, चूँकि कुर्सी मिलने के बाद किसी को यह याद नहीं रहता कि उन्होंने जिस सीट पर विजय पताका फहरायी है। वहां के मुस्लिम गरीब मतदाताओं का विशेष योगदान रहा है। बिहार में ऐसे अनेक क्षेत्र हैं, जहां किसी की जीत में मुस्लिम वोटरों की अत्यन्त अहम्‌ भूमिका होती है।गौरतलब है कि एम०वाई० समीकरण को यथार्थ घोषित करते हुए राजद की सरकार ने बरसों पूर्व राजभाषा विभाग, बिहार सरकार अन्तर्गत सहायक उर्दू अनुवादों की नियुक्ति के संबंध में तमाम प्रक्रियाएं पूरी करते हुए, सितम्बर, १९९५ में नियुक्ति की। कुल २५२ सहायक उर्दू अनुवादक राज्य के विभिन्न प्रखंडों से लेकर समाहरणालय तक नियुक्त हुए, जिसमें संभवतः देश के किसी राज्य में पहली बार किसी सरकार ने यह कदम उठाया। इसके साथ उर्दू अनुवादकों की नियुक्तियां भी समाहरणालय, अनुमंडल पदाधिकारी कार्यालय एवं कुछ एक जिलों के प्रखंडों में हुई, लेकिन इसके बाद आज तक इस विभाग के कर्मियों के भाग्य में समय से कभी वेतन मिलना नहीं दिखा। अनेक प्रयासों के बावजूद उर्दू कर्मचारियों के लिए पदोन्नति के मापदंड का निर्धारण नहीं हुआ, केन्द्र के अनुसार अनुवादकों को वेतनमान नहीं मिला। यह जहां गए, उन्हें नकारा, निकम्मा और राजनीतिक अवसरवादिता की देन के रूप में मुफस्सिल के बहुत कम शिक्षित कर्मचारियों ने एक तुच्छ प्राणी के रूप में स्वीकार किया, अब यह अलग प्रश्न है कि आज परिस्थितिवश प्रखंडों में ये स्थापना से लेकर नजारत तक के प्रभार ढो रहे हैं। इस अवसर को अल्पसंख्यक संगठनों, नेताओं एवं मुस्लिम राजनीतिज्ञों ने पुनः भुनाने में गंभीर कोताही बरती। किन्तु मुसलमानों को आरक्षण देने के नाम पर होने वाले लाभों को देखकर ही पहले आंध्र प्रदेश फिर तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने अपने एक बयान में कहा है कि उनकी सरकार मुस्लिमों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण प्रदान करने की संभावनाओं का पता लगाएगी। जबकि बिहार विधान सभा - २००५ के आम चुनाव में एक दल मुस्लिम मुख्यमंत्री की मांग पर अड़ा है तो दूसरे दल अपने चुनावी दौरे पर हैलीकाप्टरों में मुस्लिम मौलानाओं और ओलेमाओं को साथ लिए फिर रहे हैं? अब कोई बताये कि इन ओलेमाओं के आम मुसलमानों ने क्या अपने जमीर का पेश इमाम बनाया है जो मुसलमानों के अधिकारों के संबंध में कहीं कुछ बोलते नहीं देखे जाते, बल्कि बिजूका बने हुए हैं। जाहिर है उनके इस कारनामों से उनको व्यक्तिगत लाभ हासिल हो जाए किन्तु आम मुसलमानों को क्या मिलेगा? क्या इन्हें पता नहीं कि यह माहौल सर्द पड़ते ही वे एक बार फिर हाशिये पर डाल दिये जाएंगे। जिस दुखड़े को गलियों से मस्जिद, हुजरे तक में रोते रहेंगे अगले चुनाव तक। आखिर ओलेमा या मुस्लिम सियासतदां किस मर्ज की दवा हैं? क्या इसके खिलाफ मुस्लिम बुद्धिजीवियों को सामने नहीं आना चाहिए? एक जाबिर हुसेन कितने मोर्चों पर लड़ेंगे? यह वोट बैंक और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण का खेल आखिर कब तक?
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निजीकरण और दलित  

Posted by डा. फीरोज़ अहमद in

जसराम हरनोटिया
आजादी के उपरान्त भारत को शक्तिशाली बनाने, एकता और अखण्डता के लिए निजी सम्पत्तियों उदाहरणार्थ-बैंक, बड़े-बड़े कल-कारखानों आदि का राष्ट्रीयकरण राष्ट्र निर्माताओं सर्वश्री पंडित जवाहर लाल नेहरू, मौलाना अब्दुल कलाम आजाद, सरदार पटेल, डॉ० बी०आर० अम्बेडकर, बाबू जगजीवन राम एवं श्रीमती इन्दिरा गाँधी आदि के द्वारा भारत की सपन्नता और उज्ज्वल भविष्य के लिए किया गया। जिसे राजीव गाँधी जैसे राष्ट्र सपूतों ने प्राणों की आहुति देते हुए भी फलीभूत किया। जिसके कारण गरीब, मजबूर, दलित सर्वहारा समाज के बच्चों को रोजगार मोहैया कराये गये। इस आर्थिक लाभ से निम्न वर्ग को गरीबी की रेखा से ऊपर उठने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस कदम से कई लाभ दृष्टिगोचर हुए। लोगों को रोजगार मिले, गरीब से गरीब परिवार भी शिक्षा की ओर आकर्षित हुए जिससे देश में निरक्षरता की अपेक्षा साक्षरता आन्दोलन को बल मिला और दिन-प्रतिदिन शिक्षा के द्वार खुले तथा देश से अशिक्षा-तिमिर समाप्त होने लगा और राष्ट्र में शिक्षा आन्दोलन शिखर की ओर बढ़ने लगा, ज्ञान चक्षु खुलने लगे। प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा के प्रकाश से भविष्य को सुखदायक बनाने का मार्ग जो अवरुद्ध था, स्पष्ट दृष्टिगोचर होने से राष्ट्र चहुँमुखी प्रगति-पथ पर अग्रसर होने लगा।
पिछला जमाना याद आता है, जिसे बुद्ध कालीन युग कहा गया है, जब भारत में समता, भाईचारा और मैत्री का वातावरण स्थापित था, लेकिन रूढ़िवाद एवं अन्धविश्वास की संस्कृति इस सुखमय वातावरण को बरदाश्त (सहन) नहीं कर सकी और वर्ण व्यवस्था को पुनः लागू कर दिया। जिसका परिणाम यह हुआ कि भारत को अनेक आक्रमणों को झेलते हुए गुलामी का मुँह देखते-देखते हजारों वर्ष बीते क्योंकि युद्ध में भारतीय समाज के सभी वर्णों को नहीं लड़ना पड़ता था, बल्कि तथाकथित क्षेत्रीय वर्ण को ही मुकाबला करना पड़ता था। उनके पराजित होने के उपरान्त क्षेत्रा की सभी जनता स्वतः गुलाम मान ली जाती थी।
भारत में रूढ़िवादी व्यवस्था यह भूल गई कि स्वतन्त्रता संग्राम में भारत का प्रत्येक नर-नारी, बूढ़ा-जवान, विद्यार्थी, किसान एवं मजदूर शामिल था और आजादी के लिए प्रत्येक वर्ग, वर्ण ने फाँसी के फंदों को चूमने में तथाकथित उच्च वर्ण अथवा जाति से भी आगे यहाँ का दलित, सर्वहारा पहली पंक्ति में खड़ा था अर्थात्‌ आजादी की लड़ाई में ऊँच-नीच एवं एक-दूसरे से नफरत को दफनाकर भारत आजादी की लड़ाई लड़ रहा था। इस सामूहिक स्वतन्त्रता आन्दोलन के कारण ही परतन्त्रता की बेड़ियों को तोड़कर भारत को स्वतन्त्र कराने में सफलता मिली। राष्ट्र निर्माताओं ने भारत को पुनः हरा-भरा खुशहाल बनाने का स्वप्न देखा। उस स्वप्न को साकार करने के लिए अनेक योजनायें बनाई गईं। स्वतन्त्र भारत के संविधान का बाबा साहेब डॉ० अम्बेडकर द्वारा निर्माण हुआ।
भारत की चहुँमुखी प्रगति के लिए ऐसे संविधान का निर्माण किया गया जिसमें भारत का प्रत्येक नागरिक, नर-नारी, शूद्र-अतिशूद्र एवं वंचित वर्ग को भी स्वतन्त्रता का अनुभव हो सके। प्रजातांत्रिक प्रणाली द्वारा राष्ट्रीय नेताओं के चुनाव के समय छोटे-बड़े, फुटपाथ पर बसेरा करने वालों से लेकर महलों में निवास करने वालों तक को मत का समान अधिकार हो, कर्तव्य एवं अधिकारों में कोई अन्तर न हो। सबको अपने-अपने धर्म में आस्था का पूर्ण अधिकार हो, भारत के प्रत्येक निवासी को सम्पत्ति, शिक्षा, कृषि, व्यापार आदि में समान अधिकार हो। समता पथ पर लाने के लिए ऐसे समाज को आरक्षण का प्रावधान हो जिसके लिए आजादी से पहले शिक्षा के द्वार बन्द थे, सम्पत्ति रखने के अधिकार नहीं थे, वंचित एवं अछूत माने जाते थे। भारत की नारी भी सछूत होते हुए गुलाम भारत के अधिकारों के लिए उपरोक्त श्रृंखला में ही रखी गई थी जिसको बराबरी के अधिकार स्वतन्त्रता प्राप्ति के उपरान्त संवैधानिक अधिकार मिले। यद्यपि अधिकांश नारी-वर्ग इस जानकारी से आज भी अनभिज्ञ हैं कि संवैधानिक अधिकार किसने दिलवाये, कौन इनके अधिकारों के लिए संघर्षरत रहे? इसका आभास होने के उपरान्त ही शोषण, भ्रष्टाचार एवं अनैतिकता का विनाश अवश्य है। क्योंकि सत्ता बहुजन समाज के हाथ में होगी जो भारत का नव-निर्माण समता भाईचारे के पैटर्न पर (चलने) में सक्षम होगा।
आरक्षण का प्रावधान संविधान की धारा ३३४ तथा ३३५ के अनुसार दो भागों में बाँटा गया। एक आरक्षण का आधार सामाजिक-आर्थिक समता पर आधारित है। जिसके माध्यम से भारत के सभी पब्लिक सैक्टर में नौकरियों तथा पब्लिक सैक्टर के सभी उपकरणों (जिसमें आर्थिक लाभ की व्यवस्था है) कल-कारखानों तथा राष्ट्रीय सम्पत्तियों में जन संस्था के आधार पर अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति को भागीदारी का प्रावधान है। यह प्रावधान तब तक लागू रहेगा जब तक कि अनुसूचित जाति/जनजाति का सामाजिक तथा आर्थिक स्तर भारतीय समाज के बराबर न हो जाये। सामाजिक स्तर का तात्पर्य सामाजिक समानता अर्थात्‌ उच्च वर्ग एवं निम्न वर्ग में सामाजिक समता का सामन्जस्य होकर ऊँच-नीच की खाई को पाटना।
दूसरा भाग राजनैतिक आरक्षण जो केवल दस वर्षों के लिए ही जिसका तात्पर्य था, दलित समाज में राजनैतिक चेतना का आभास होना तथा इस राजनैतिक चेतना के माध्यम से संविधान की रक्षा के लिए पूर्ण अधिकारों का ज्ञान होना। लेकिन दुर्भाग्यवश यह राजनैतिक आरक्षण सभी राजनैतिक दलों को ऐसा भाया कि प्रत्येक दस वर्षों के उपरान्त इसे संसद के माध्यम से बढ़ाते रहते हैं। जिसके कारण भारतीय समाज में एक घृणा एवं द्वेषात्मक वातावरण पनपता जा रहा है कि इनका आरक्षण क्यों बढ़ाया जा रहा है। लेखक को यह कहते हुए कुछ संकोच भी होता है लेकिन सत्य है कि इस राजनैतिक आरक्षण के कारण सभी दलों में अधिकांश दलित गुलामों की भीड़ बढ़ रही है। कुछ अपवाद भी हैं जो राजनैतिक चेतना एवं अधिकारों के माध्यम से दलितों के सामाजिक-आर्थिक अधिकारों से संवैधानिक अधिकारों के प्रति सजग रह कर संघर्ष भी करते रहे हैं और आज भी विद्यमान हैं। इस राजनैतिक आरक्षण को प्रत्येक दस वर्ष के बढ़ाने के कारण एक गहन चिन्तन का विषय भी बनता जा रहा है। सभी राजनैतिक दलों में यह भय भी दृष्टिगोचर होता है कि राजनैतिक आरक्षण समाप्त होने पर दलित वर्ग कहीं पुनः पृथक निर्वाचन की मांग करने के लिए इकट्ठा न हो जाये और अपनी राजनैतिक शक्ति के माध्यम से सामाजिक-आर्थिक आरक्षण को प्रत्येक क्षेत्रा में पूरा करने के लिए सक्षम हो जाये अथवा राजसत्ता पर अपना अधिकार न कर ले? इसलिए इनकी संगठन शक्ति को स्वार्थहित राजनैतिक आरक्षण के नाम पर बाँटकर अलग-थलग रखना ही राजनैतिक दलों के हित में अधिक श्रेयस्कर एवं लाभदायक है।
यहाँ यह स्पष्ट करना भी उचित समझता हूँ कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री श्री रमसे मैकडोल्ड के समक्ष भारत की एकता और अखण्डता के लिए दलित राष्ट्रभक्तों विशेषकर बाबा साहेब डॉ० बी०आर० अम्बेडकर जी ने स्वतन्त्रता प्राप्ति के उपरान्त भारत के मूल निवासियों (आदिवासियों) के सामाजिक-आर्थिक तथा राजनैतिक हितों को सुरक्षित रखने के लिए अपना मांग पत्रा रखा था। उस मांग-पत्र के माध्यम से भारत के कर्णधारों-महात्मा गाँधी एवं बाबा साहेब डॉ० अम्बेडकर के बीच एक समझौता हुआ। यह लिखित समझौता २४ सितम्बर, १९३२ को नर्वदा जेल में हुआ था जिसे इतिहासकारों ने पूना पैक्ट के नाम से उजागर किया। यद्यपि दूसरे धार्मिक एवं राजनैतिक दल अंग्रेजों की भारत विभाजन के प्रपंची जाल में फंसकर भारत को विभाजित करने में सफल रहे लेकिन भारत का दलित यह गौरव एवं स्वाभिमान से कह सकता है कि हमारे राष्ट्रभक्तों एवं कर्णाधारों ने अनेक बार अंग्रेजों द्वारा उकसाने के बावजूद भी अपनी जन्मभूमि को विभाजित करने की कभी भी मांग नहीं की तथा भारत को अनेक खण्डों में टूटने (बंटने) से बचा लिया। इसीलिए भारत का दलित (मूलनिवासी) स्वाभिमान से कहता है कि यह भारत, हमारा भारत है। इसकी एकता और अखण्डता के लिए जीवन बलिदान करने में सर्वदा पहली पंक्ति में रहेंगे। लेकिन अपनी भागीदारी का संघर्ष जारी रहेगा। यद्यपि मान्यवर जिन्ना ने भी बाबा साहेब डॉ० अम्बेडकर को उकसाने में कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने कहा था कि भारत में आप छुआछूत आदि की घृणा के शिकार हैं फिर भी आप बंटवारे की बात नहीं करते। बल्कि एकता अखण्डता के साथ केवल अधिकार की बात करते हो। इसका सरल एवं छोटा उत्तर बाबा साहेब ने अपने शब्दों में दिया था कि भारत मेरे पुरखों की जन्मभूमि हैं जिस पर हमारा पूर्ण अधिकार था, इसलिए मुझे भारत से प्यार हैं। मैं भारत की कोई धन-जन की हानि बरदाश्त नहीं कर सकता।
भारत समाजवादी व्यवस्था से अतीत की भाँति पुनः समृद्ध राष्ट्र न बन जाये, विश्व में शान्ति एवं समता भाईचारे का सन्देश न दे सके, इसी षड्यन्त्र के अनुसार पूँजीपति राष्ट्र भारत को निजीकरण की ओर प्रभावित ही नहीं कर रहे अपितु दबाव भी बना रहे हैं। क्योंकि भारत विश्व में एक ऐसा विचित्रा राष्ट्र है जिसमें अनेक ऋतुएँ एवं इसके गर्भ में अनेक खनिज सम्पदा के भंडार तथा वैज्ञानिक दृष्टि से भी विलक्षण बुद्धि है। इतना ही नहीं इसके उत्तर में हिमालय, दक्षिण पश्चिम तथा अधिकांश पूर्वी भाग में विशाल सागर है जो सुरक्षा की दृष्टि से भी सक्षम है। इसलिए ही इसकी शक्ति को क्षीण करने के लिए निजीकरण नामक संक्रामक कीटाणुओं के बीज बोये जा रहे हैं।
निजीकरण के नाम पर अरबों-करोड़ों रुपयों की संपत्तियों, कल-कारखानों को व्यक्ति विशेष अथवा समूह विशेष को बेचा जा रहा है। जिसमें उपनिवेश के रूप में विदेशी कम्पनियों को भी आमंत्रिात किया जा रहा है। जिसका आर्थिक लाभ राष्ट्र को न होकर व्यक्ति विशेष अथवा विदेशी कम्पनियों को ही होगा। पब्लिक सैक्टर की अपेक्षा प्राइवेट सैक्टर में बड़े-बड़े हॉस्पिटल खोले जा रहे हैं जहाँ पर भारत का ८० प्रतिशत निवासी अपना इलाज नहीं करा सकता, क्योंकि वहाँ का इलाज इतना महंगा है कि आम आदमी के काबू से बाहर है। इतना ही नहीं सरकारी विद्यालयों की अपेक्षा प्राइवेट स्तर पर मैडिकल कॉलिज, इंजीनियरिंग कॉलेज खोले जा रहे हैं। जिनकी फीस इतनी अधिक है कि पूँजीपतियों के अलावा साधारण भारत के किसान, मजदूर, दलित मध्यम वर्ग के नौकरीपेशा लोगों की पहुँच से बाहर है, क्योंकि अंग्रेजी मीडियम के नाम पर फीस इतनी अधिक है कि भारत के दस-पन्द्रह प्रतिशत घराने के लोग ही इन विद्यालयों में अपने बच्चों को शिक्षा देते हैं। इतना ही नहीं अधिकांश विद्यालयों में प्रवेश के समय बिना डोनेशन के प्रवेश भी नहीं मिलता है। कितनी बड़ी विडम्बना हैं कि दूसरी ओर सरकारी विद्यालयों तथा अस्पतालों को जनसंख्या के आधार पर बहुत कम खोला जा रहा है। जिससे कि दोनों ओर बहुजन समाज का शोषण बढ़ता चला जाये और भारत में पुनः जातिवाद एवं रूढ़िवाद की घृणा एवं द्वेष का जहर बढ़ता-फैलता जाये और और भारत पुनः आर्थिक गुलामी की ओर अग्रसर हो जाये?
निजीक्षेत्र में आरक्षण के अधिकार की मांग उठने पर सक्षम वर्ग अथवा निजीकरण के हिमायती यह कहते नहीं थकते कि निजीकरण में आरक्षण का प्रावधान होने के कारण क्वालिटी और प्रोडक्शन गिर जायेगी। क्योंकि अनुसूचित जाति/जनजाति एवं ओ०बी०सी० में कार्य क्षमता की कमी है। लेकिन निजीकरण के हिमायती क्षमता के नाम पर यह भूल जाते हैं कि स्पर्धा एवं कार्य क्षमता की जानकारी तब मिलती है जबकि उसे कार्य करने का सुअवसर प्राप्त हो तथा शिक्षा का माध्यम एक हो। एक विद्यार्थी को आगे बढ़ने के लिए अर्थात्‌ उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए सभी साधन उपलब्ध कराये जाते हैं और दूसरे विद्यार्थी को उपयुक्त समय पर पुस्तक भी उपलब्ध नहीं हो पाती अथवा एक विद्यार्थी पर शिक्षा के नाम पर इतना पैसा खर्च किया जाता है, जिसमें गरीब, मजदूर, दलित सर्वहारा बहुजन समाज का पूरा परिवार अपनी जीविका चलाता है। इतना ही नहीं निजी विद्यालयों में भी लाखों रुपया दान देकर प्रवेश के नाम पर डिग्रियाँ प्राप्त की जाती हैं। उस समय स्पर्धा एवं कार्यक्षमता कहाँ चली जाती है? कार्यक्षमता एवं विलक्षण बुद्धि का प्रदर्शन उचित अवसर प्राप्त होने पर पता चलता है। इसके ज्वलन्त उदाहरण बाबा साहेब डॉ० अम्बेडकर, बाबू जगजीवन राम जी हैं, जिन्होंने सु-अवसर प्राप्त होने पर अपनी विलक्षण बुद्धि एवं स्पर्धा का प्रदर्शन किया। बाबा साहेब डॉ० अम्बेडकर ने भारत के संविधान का निर्माण किया तथा दामोदर वैली (घाटी) पर बाँध बंधवाकर अपनी विलक्षण बुद्धि एवं राष्ट्र-निष्ठा का परिचय दिया। भारत जब भुखमरी के कगार पर खड़ा था, चारों ओर अन्नाभाव में हा-हा कार मचा हुआ था, पूर्णतः अमरीका तथा आस्ट्रेलिया से आयातित गेहूं पर ही निर्भर था। तब इन्दिरा गाँधी जी द्वारा बाबू जगजीवन राम को कृषि मंत्राालय सौंपा गया। बाबूजी धरती पुत्रा (कृषक पुत्र) होने के कारण पूर्णरूपेण विज्ञ थे कि कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए समय पर खाद, पानी और उच्च श्रेणी के बीज की आवश्यकता होती है। इसीलिए ही बाबू जी ने कृषि मंत्रालय के साथ-साथ खाद तथा सिंचाई विभाग लेकर समय पर खाद और पानी फसलों को उपलब्ध कराया था। नई दिल्ली के बड़े-बड़े बंगलों में गेहूँ तथा सब्जियाँ उगवाकर हरित क्रान्ति का उद्घोष किया। कुछ ही वर्षों में भारत अन्न, चीनी तथा दालों में आत्मनिर्भर ही नहीं हुआ बल्कि निर्यात करने की स्थिति में खड़ा हो गया था। वही स्थिति आज भी है। दूसरी ओर सदियों पहले से भारत विदेशी आक्रमणों के सामने हारता ही रहा, लेकिन भारत के रक्षा मंत्री पद का सुअवसर प्राप्त होने पर अपनी विलक्षण बुद्धि के बल से भविष्य दृष्टा की भांति भविष्यवाणी कर दी थी, यदि पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया तो युद्ध पाकिस्तान की भूमि पर ही होगा जो पूर्णतया सत्य सिद्ध हुआ। इतना ही नहीं पाकिस्तान पर विजय प्राप्त करके विश्व मानचित्रा पर पाकिस्तान को तोड़कर बंगलादेश स्थापित कर दिया।
इतना ही नहीं भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में भी भारत के मूल निवासियों (दलितों) ने चाहे उधम सिंह जी रहे हों चाहे चेतराम जाटव, बांके चमार, वीरापासी, बल्लू महतर, बांके, मातादीन भंगी रहे हों, चाहे विरांगना झलकारी रही हो अथवा महावीरी भंगिनी रही हो, ऐसे लाखों दलित राष्ट्र दीवाने फाँसी के फंदों को चूमकर शहीद हुए लेकिन कभी भी पीठ नहीं दिखाई। यह किसी से छिपा नहीं बल्कि इतिहासकारों की कलम उनकी वीरता के इतिहास लिखते समय कुंठित-सी हो गई थी।
भारत के निजी विद्यालयों, इंजीनियरिंग कॉलिजों, मेडिकल कॉलिजों, अस्पतालों एवं कल-कारखानों को सस्ते दामों पर भूमि आबंटित की जाती है, भारतीय कोष से उनके निर्माण के लिए आसान किस्तों एवं सस्ते ब्याज पर धन दिया जाता है। सड़कें, बिजली, पानी आदि सुविधा उपलब्ध करायी जाती हैं, जिसमें सार्वजनिक धन का उपयोग होता है। कैसी विडम्बना है कि धन सरकार का जो सार्वजनिक और उसका लाभ व्यक्ति विशेष अथवा समूह विशेष को। अब बहुजन समाज अधिक समय तक इसे अनदेखा नहीं कर सकेगा। भारत की सम्पत्ति पर प्रत्येक भारतीय का अधिकार है। उसमें जनसंख्या के आधार पर भागीदारी होनी चाहिए। इसके अलावा अनछुए मुद्दों पर दृष्टि डालनी होगी। उदाहरण के तौर पर हाईकोट, सुप्रीम कोर्ट में नोमिनेशन नहीं सलेक्शन होना चाहिए। न्यायपालिका का प्राधिकरण होना चाहिए जिससे प्रत्येक भारतीय सुअवसर प्राप्त करके अपनी विलक्षण बुद्धि और कार्यक्षमता का प्रदर्शन राष्ट्रहित में कर सके।
राष्ट्रहित में तो यह अधिक लाभकारी एवं हितकर होगा कि शिक्षा का स्तर एक हो, सभी परीक्षाओं एवं उच्च शिक्षा के लिए एक भाषा माध्यम हो ताकि एक ही सैलेबस हो सके। विद्यालय प्रवेश के समय जाति/उपजाति तथा धर्म का कालम समाप्त कर दिया जाये और इनके स्थान पर राष्ट्रीयता को प्रबल समर्थन देकर राष्ट्र एकता, अखण्डता तथा भाईचारे का अत्यधिक सुदृढ़ मार्ग राष्ट्र के कर्णाधारों ने प्रसन्न नहीं किया तो विघटनकारी ताकतें राष्ट्र को हानि पहुँचाने के लिए मुँह उठा सकती हैं?
आजादी के वे दीवाने जो भारत को स्वतन्त्र कराने के लिए फांसी के फंदे चूमते हुए नींव के पत्थर बन गये, राष्ट्र निर्माताओं ने ऐसा कभी नहीं सोचा होगा कि टुकड़ों में (रियासतों में) बंटे भारत को विशाल भारत बनाने के उपरान्त, निजीकरण एवं विदेशी निवेश का नारा देकर उनका अपमान किया जायेगा अथवा किसी राष्ट्र विशेष के प्रभाव या दबाव में आकर ऐसे कदम उठाये जायेंगे जिससे राष्ट्र पुनः आर्थिक परतन्त्रता की बेड़ियों में जकड़ जाये और उन राष्ट्र निर्माताओं का अपमान हो? इस समय स्थिति बड़ी भ्रामक एवं भयावह है। यदि ऐसा हुआ तो उन राष्ट्रभक्तों एवं निर्माताओं के सपूत पुनः प्रताड़ना एवं अपमान सहकर किसी भी कुर्बानी के लिए तैयार हैं।
इसकी गरिमा को किसी भी कीमत अथवा त्याग से सुरक्षित रखा जायेगा। किसी भी राजसत्ता राजनैतिक दल ने उन राष्ट्र भक्तों के विश्वास एवं निष्ठा के विरुद्ध कोई कदम उठाने की अनाधिकार चेष्टा की तो उसका परिणाम वही होगा जो अभी भूत में हुआ है?
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दलित साहित्य में दलित : एक विमर्श  

Posted by डा. फीरोज़ अहमद in

डॉ० निरंजन कुमार
पिछले वर्षों में दलित, दलित चेतना, दलित आंदोलन व दलित साहित्य ने विचारकों, सामाजिक चिंतकों, साहित्यकारों एवं आलोचकों का ध्यान सर्वाधिक आकृष्ट किया है। इधर हिन्दी में भी दलित साहित्य एक स्थापित धारा बन चुकी है। दलित साहित्य आंदोलन के प्रमुख धारा बनने के बावजूद दलित और दलित चेतना पर बहस अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है, खासतौर से इस बात पर विवाद बना हुआ है कि दलित कौन है? दलित चेतना का स्वरूप क्या है? और दलित साहित्य को कैसे परिभाषित किया जाए। प्रस्तुत लेख में प्रथम प्रश्न के उत्तर देने का प्रयास किया गया है। अन्य दो के उत्तर भी इसी से जुड़े हैं।
‘दलित' शब्द १९वीं सदी के सुधारवादी आंदोलन (या नवजागरण) काल की उपज है। विवेकानंद, ऐनी बेसेंट, रानाडे आदि ने इस शब्द का अनेक बार प्रयोग किया है। अर्थात्‌ इस शब्द का प्रयोग सवा सौ साल से ज्यादा समय से हो रहा है और तभी से इस शब्द की अर्थ व्याप्ति को लेकर विद्वानों में मतभेद है। इस प्रकार से दलित शब्द का वर्तमान रूप अर्थ आधुनिक है लेकिन यह भी सही है कि दलितपन या दूसरे शब्दों में कहें तो इस शब्द से जुड़ी भावना प्राचीन काल में ही उत्पन्न हो गयी थी। व्युत्पत्ति के आधार पर पहले इसके अर्थ को देखा जाए। ‘दलित' शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के धातु ‘दल्‌' से हुई है जिसका अर्थ है तोड़ना, कुचलना। संस्कृत शब्दकोशों में दलित शब्द के निम्न अर्थ किए गए हैं -
दलित-दला गया, मर्दित, पीसा गया।
मानक हिन्दी-अंग्रेजी शब्दकोशों में दलित शब्द के लिए डिप्रेस्ड (क्मचमेमक) मिलता है, इसके अतिरिक्त डाउनट्रोडेन ;क्वूद जतवककमदद्ध भी मिलता है।
हिन्दी शब्दकोशों में भी संस्कृत और अंग्रेजी के समान ही ‘दलित' का अर्थ है - मसला हुआ, रौंदा हुआ, खंडित, विनष्ट किया हुआ।
इस प्रकार ‘दलित' शब्द के विभिन्न शब्दकोशों में विभिन्न अर्थ संदर्भ मिलते हैं लेकिन उनकी व्यंजना कमोबेश एक है। दलित वर्ग इसी दलित शब्द से ही सम्बद्ध है। उपरोक्त अर्थ संदर्भों से यह तो स्पष्ट हो ही जाती है कि समाज के उस वर्ग को, जिसे सबसे निम्न समझा जाता है, जिसका उच्च वर्गों के लोगों में दलन किया, दबाकर रखा, दलित वर्ग कहा गया। लेकिन यह दलित वर्ग की सामान्य या अभिधात्मक संकल्पना है। देखा जाए तो आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक-सांस्कृतिक, राजनीतिक, सांविधानिक लिंगीय दृष्टिकोणों से दलित शब्द भिन्न-भिन्न आयाम ग्रहण करता है।
आर्थिक दृष्टि से ‘दलित' एक ‘वर्गीय' शब्द है। भारत एक गरीब देश है। यहाँ की आधी से ज्यादा आबादी आर्थिक दृष्टि से दलित ही है। इस प्रकार यहाँ न केवल अछूत एवं शूद्र बल्कि ब्राह्मण, क्षत्रिाय, वैश्य आदि सभी जातियों के गरीब एवं अभावग्रस्त लोग ‘दलित' वर्ग में समाहित हो जाते हैं।
धार्मिक-सांस्कृतिक दृष्टिकोण से देखें तो यह स्पष्ट है कि हिन्दू समाज एक श्रेणीबद्ध समाज है जिसका आधार वर्ण व्यवस्था है। यह वर्ण व्यवस्था चार भागों में न होकर पाँच सोपानों में विभाजित है -
ब्राह्मण, क्षत्रिाय, वैश्य, शूद्र और पंचम वर्ग। यह पंचम वर्ग उस शूद्र वर्ग से अलग है जो अस्पृश्यता अथवा छुआछूत से ग्रस्त नहीं है। पंचम वर्ग अतिशूद्र और अछूत अथवा अस्पृश्य भी कहलाता है।
जैसा कि पहले कहा जा चुका है शूद्रों की स्थिति पंचम वर्ग से बेहतर थी और उन्हें कई सामाजिक-धार्मिक अधिकार भी मिले हुए थे। प्रसिद्ध समाजशास्त्री एम०एन० श्रीनिवास ने अपने ‘संस्कृतीकरण' की प्रक्रिया के अध्ययन में दिखाया है कि कैसे समाज की निम्न जातियाँ अपना आदिवासी कालक्रम में आर्थिक-रूप से मजबूत होकर जाति व्यवस्था में अपनी स्थिति उच्च कर सकी हैं। लेकिन अछूत और पंचम जातियाँ किसी भी तरीके से इस कार्य में सफल नहीं हो पाईं। जैसा कि ओवेन लिंच ने आगरा के जाटवों के अध्ययन से दिखाया। तमाम आर्थिक प्रगति और संख्या बल के बावजूद उनकी ऊर्ध्व गतिशीलता और उच्च सामाजिक प्रस्थिति को समाज ने अस्वीकार कर दिया। एफ०जी० बेली ने भी अपने उड़ीसा के एक गाँव की जाति संरचना के अध्ययन में इस बात की पुष्टि की है। आर्थिक प्रगति कर जाने पर उड़ीसा के एक गाँव बिसिपाड़ा के तथाकथित पिछड़ी/शूद्र जातियों को कालक्रम में उच्च स्थान प्राप्त हुआ जबकि समान आर्थिक प्रगति के बावजूद अछूत जातियों की सामाजिक प्रतिष्ठ जस की तस निम्न बनी रही।
स्पष्ट है कि समाज के सबसे निचले पायदान पर अवस्थित समूह, जिसके विकास एवं प्रगति को सदा अवरुद्ध किया गया, उन्हें दबाकर रखा गया, वह शूद्र जातियाँ नहीं वरन्‌ अतिशूद्र अथवा पंचम जातियां थीं जो अछूत थी अस्पृश्य भी थीं और विभिन्न निर्योग्यताओं से ग्रस्त भी।
सामाजिक दृष्टि से दलित शब्द एक और अर्थ ध्वनित करता है। इस वर्ग में न केवल अछूत जातियाँ हैं बल्कि समाज की मुख्यधारा से कटी जनजातियाँ भी शमिल हैं। ये जनजातियाँ अथवा आदिवासी राष्ट्र के विकास से अलग-थलग पड़ गए हैं बल्कि सच्चाई यह है कि सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक रूप से शोषित और वंचित हैं। स्थिति इतनी विकट है कि अनेक जनजातियाँ तो विलुप्त होने की अवस्था में हैं। एन्थ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया के ‘पीपुल ऑफ इण्डिया प्रोजेक्ट' की रिपोर्ट में अनेक जनजातियों को लुप्त होने की खतरनाक अवस्था में दिखाया गया है। कुछ के नाम गिनाये जा सकते हैं - जारवा, ओन्गेज, बिरहोर, चेन्चु, माल पहाड़िया आदि।
लिंगीय दृष्टि से भी दलित शब्द की व्याख्या की गयी है। समाज के आधे हिस्से स्त्रिायाँ, जिसे सिमन दी बुउआ सेकंड सेक्स कहती है, अपने आप में एक तरह से दलित ही है। राजेन्द्र यादव इस दृष्टिकोण के सबसे बड़े प्रवक्ता है। वे जोर देकर कहते हैं कि भारतीय समाज में शूद्रों और स्त्रिायों की स्थिति कमोबेश समा रही है। विभिन्न आर्थिक, धार्मिक-सांस्कृतिक और सामाजिक निर्योग्यताओं से दोनों ही समान रूप से ग्रस्त रहे हैं, दोनों ही वंचित, शोषित, पीड़ित तथा समाज के अत्याचार के शिकार रहे हैं।
एक अन्य स्वर राजनीति का है। बहुजन समाज की राजनीति के दौरान उभरे इस विचार में अस्पृश्यों, पिछड़ों, मुसलमानों आदि को एक वर्ग में शामिल करते हुए उन्हें समान रूप से दलित मानकर एक संयुक्त मोर्चा बनाने की कोशिश की गयी। पर इन समुदायों की समस्याएँ अलग-अलग हैं और इनके बीच कई अन्तर्विरोध भी हैं।
उपरोक्त विभिन्न दृष्टिकोण का थोड़ी सूक्ष्मता से विश्लेषण कर लिया जाए।
‘दलित' शब्द की वर्गवादी व्याख्या मार्क्सवादी चिंतकों ने की। इन विद्वानों में राजकिशोर के अतिरिक्त मराठी विद्वान नामदेव ढसाल, म०न० वान खेड़े, नारायण सुर्वे आदि ‘दलित' का वर्गीय दृष्टि से देखते हैं। यहाँ दलित शब्द के अन्तर्गत आर्थिक रूप से निम्न सभी वर्णों के लोगों को समाहित कर लिया जाता है। लेकिन यहाँ स्पष्ट कर देना उचित होगा कि आर्थिक रूप से सभी वंचित लोगों की सामाजिक प्रस्थिति समान नहीं होती। हमारे समाज में एक गरीब ब्राह्मण की सामाजिक प्रस्थिति वह नहीं होगी जो कि एक गरीब ‘अछूत' जाति के व्यक्ति की। बल्कि परंपरागत रूप से तो कई बार धन, शक्ति, यश एवं गुण से हीन ब्राह्मण भी धनवान, शक्तिशाली, गुणवान अछूत से सामाजिक स्तर पर उच्च होता है। तुलसीदास की यह पंक्तियों द्रष्टव्य हैं -
पूजिय विप्रासील गुन हीना
सूद्र न गुन गन ग्यान प्रवीना।
परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि वर्गीय विभाजन एक दम निरर्थक है। बल्कि बदलते हुए समय में जब वैश्विक अर्थव्यवस्था और पूंजीवाद के राक्षस ने अपने पाँव चारों तरफ पसारना शुरू कर दिया है उसमें इस दृष्टिकोण की उपयोगिता और सार्थकता निश्चित रूप से बढ़ जाती है जैसा कि शरण कुमार लिंबाले लिखते हैं - ‘‘व्यापक सामाजिक और राजनैतिक ऐक्य की भूमिका को ध्यान रखते हुए वान खेड़े, ढसालकृत परिभाषा समाज जागृति संगठन की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है। आज भारतीय समाज और राजनैतिक जीवन में जिस उच्च स्वर से जिस ‘बहुजनवाद' की भाषा बोली जा रही है, उसका निनाद वानखेड़े, ढसाल की परिभाषा में सुनने को मिलता है। दलित साहित्य को आंदोलन माना जाए तो वानखेड़े, ढसाल की भूमिका व्यापक हित और विधायक दृष्टि से उचित लगती है।
राजेन्द्र यादव की मान्यता, कि स्त्री को भी दलित वर्ग के अन्तर्गत मानना चाहिए, को भी परख लिया जाए। यह तो सही है कि जैविक दृष्टि से प्रकृति ने स्त्री-स्त्री में भेद नहीं किया है स्त्री चाहे द्विज हो अथवा अछूत, वह शारीरिक रूप से समान है, पुरुष वर्ग के शारीरिक दाहन-शोषण की समान भुक्तभोगी है। लेकिन सवाल यहाँ यह भी है कि स्त्री क्या एक जैविक इकाई मात्रा है? जैविक सत्ता के अतिरिक्त स्त्री की एक सामाजिक सत्ता भी है। इसीलिए पुरुष वर्ग के अधीन होने के बावजूद एक द्विज स्त्राी अछूत स्त्री से अपने को अलग समझती है। द्विज स्त्री वर्ण गर्व से आप्लावित होती है वहीं अछूत स्त्री एक ग्लानि से पीड़ित। इस प्रकार दलित स्त्री को दोहरा अभिशाप झेलना पड़ता है। वह वर्णवादी समाज और पुरुष वर्ग दोनों के अत्याचारों का शिकार होती है। इसीलिए दलित स्त्री को ‘दलित' में ‘दलित' की संज्ञा भी दी जाती है। यहाँ निष्कर्ष यही निकलता है कि सभी स्त्रिायों को एक ही दलित श्रेणी में रखा जाना सही नहीं होगा। राजनैतिक दृष्टिकोण के अन्तर्विरोधों को पहले ही देखा जा चुका है।
जनजातियों अथवा आदिवासियों को दलित समुदाय के अन्तर्गत शामिल करना भी उचित नहीं होगा। जनजातीय अथवा आदिवासी समाजों की अलग परेशानियाँ हैं, यद्यपि वे भी कम भयानक नहीं हैं लेकिन मुख्यधारा से वे परंपरगत रूप से कह रहे हैं और वर्णव्यवस्था से एक तरह से वे बाहर ही हैं। मुख्यधारों में शामिल होने पर भी उन्हें अछूतेपन की समस्या से वैसा ग्रस्त नहीं होना पड़ा है जैसा कि अछूत जातियों को। एम०एन० श्रीनिवास ने अपने अध्यापन में इस बात को दिखाया है कि अनेक जनजातियों ने संस्कृतिकरण की प्रक्रिया को अपनाकर वर्णव्यवस्था में अपेक्षाकृत उच्च गतिशीलता कर उच्च प्रस्थिति का दावा किया और समाज ने उन्हें मान्यता भी दी। उदाहरण के लिए गोंड जनजाति का इस सन्दर्भ में नाम लिया जा सकता है। (जिन्होंने संस्कृतीकरण की प्रक्रिया द्वारा कालक्रम में क्षत्रिाय प्रस्थिति का दावा किया और उन्हें सामाजिक स्वीकृति भी मिली।) यह अनायास नहीं है कि भारत सरकार के ‘अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग, जो अनुसूचित जाति और जनजातियों के कल्याण का कार्य समग्र रूप से देखती थी को दो भागों में बांट दिया गया है। अब अनुसूचित जाति आयोग और अनुसूचित जनजाति आयोग दो अलग-अलग निकाय बना दिए गए हैं।
समग्र रूप से देखें तो आज की परिस्थितियों में दलित शब्द एक रूढ़ अर्थ ग्रहण कर चुका है। वर्तमान में दलित शब्द पूर्व की अछूत या पंचम जातियों के पयार्य के अर्थ में प्रयुक्त होने लगा है जो विभिन्न सामाजिक निर्योग्यताओं से ग्रस्त रही हैं। दलित साहित्य के अधिकांश साहित्यकार व्यावहारिक रूप से ‘दलित' शब्द का यही अर्थ ग्रहण करते हैं। हालांकि सैद्धांतिक रूप से कई दलित चिंतकों-साहित्यकारों ने दलित शब्द को अपेक्षाकृत एक व्यापक अर्थ में ग्रहण करने की वकालत की है, आदिवासियों आदि समुदाय को भी शामिल करने पर जोर दिया है लेकिन इस व्यापक दृष्टिकोण की सीमाओं को उपर्युक्त विवेचन में दिखलाया जा चुका है।
यहीं पर इस बात पर भी विचार कर लिया जाए कि प्राचीनकाल के अन्त्यज अथवा कल के हरिजन आज स्वयं को दलित कहना अधिक पसंद क्यों करते हैं। दरअसल ‘दलित' शब्द जहाँ व्यक्ति को अपनी अस्मिता, स्वाभिमान और अपने इतिहास पर दृष्टिपात करने को बाध्य करता है, वहीं अवगति, वर्तमान स्थिति और तिरस्कृत जीवन के विषय में सोचने के लिए भी विवश करता है। ...दलित शब्द आक्रोश, चीख, वेदना, पीड़ा, चुभन, घुटन और छटपटाहट का प्रतीक है। ...दलित शब्द आज प्रेरणा और विद्रोह का पर्यायवाची भी है। स्पष्ट है कि ‘दलित' शब्द एक ओर जहाँ इस शोषित-पीड़ित समुदाय की वेदना, पीड़ा और छटपटाहट को अभिव्यक्त करता है, वहीं दूसरी तरफ यह विद्रोह और मुक्ति की प्रेरणा भी देता है। एक नये समाज के निर्माण की आकांक्षा, जो समानता, स्वतंत्राता और बन्धुत्व पर आधारित हो, कुछ ऐसी ही अभिव्यंजना ‘दलित' शब्द से ध्वनित होती है और यही दलित चेतना और दलित साहित्य की पृष्ठभूमि में भी दृष्टिगोचर होता है।
सन्दर्भ ग्रन्थ
डॉ० नरेन्द्र सिंह - दलितों के रूपान्तर की प्रक्रिया, पृ० ७
(सं०) शिवराम वामन आप्टे - संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश, मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली, १९८१
(सं०) महेन्द्र चतुर्वेदी एवं भोलानाथ तिवारी - व्यावहारिक हिन्दी-अंग्रेजी कोश
(सं०) रामचन्द्र वर्मा - संक्षिप्त हिन्दी शब्द सागर, पृ० ४६८
राजकिशोर - ‘अगर मैं दलित होता' धर्मयुग, १९९४, पृ० २२
एम०एन० श्रीनिवास - आधुनिक भारत में जातिवाद तथा अन्य निबन्ध, दिल्ली, १९९२
रजत रानी मीनू - नवें दशक की दलित कविता, दलित साहित्य प्रकाशन, नयी दिल्ली, १९९६, पृ० २-३
शरण कुमार लिंबाले - दलित साहित्य का सौन्दर्य शास्त्रा, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, २०००, पृ० ७६-७७
सोहनपाल सुमनाक्षर - विश्व धरातल पर दलित साहित्य, भारतीय दलित साहित्य अकादमी, दिल्ली, १९९९, पृ० ९-११
डॉ. हरेराम पाठक
हिन्दी की आधुनिक गद्य विधाओं में ‘साक्षात्कार' विधा अभी भी शैशवावस्था में ही है। इसकी समकालीन गद्य विधाएँ-संस्मरण, रेखाचित्र, रिपोर्ताज, आत्मकथा, अपनी लेखन आदि साहित्येतिहास में पर्याप्त महत्त्व प्राप्त कर चुकी हैं, परन्तु इतिहास लेखकों द्वारा साक्षात्कार विधा को विशेष महत्त्व नहीं दिया जाना काफी आश्चर्यजनक है। आश्चर्यजनक इसलिए है कि साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा साक्षात्कार विधा ही एक ऐसी विधा है जिसके द्वारा किसी साहित्यकार के जीवन दर्शन एवं उसके दृष्टिकोण तथा उसकी अभिरुचियों की गहन एवं तथ्यमूलक जानकारी न्यूनातिन्यून समय में की जा सकती है। ऐसी सशक्त गद्य विधा का विकास उसकी गुणवत्ता के अनुपात में सही दर पर न हो सकना आश्चर्यजनक नहीं तो क्या है।
परिवर्तन संसृति का नियम है। गद्य की अन्य विधाओं के विकसित होने का पर्याप्त अवसर मिला पर एक सीमा तक ही साक्षात्कार विधा के साथ ऐसा नहीं हुआ। आरंभ में उसे विकसित होने का अवसर नहीं मिला परंतु कालान्तर में उसके विकास की बहुआयामी संभावनाएँ दृष्टिगोचर होने लगीं। साहित्य की अन्य विधाएँ साहित्य के शिल्पगत दायरे में सिमट कर रह गयी हैं, परन्तु ‘साक्षात्कार' समाज के विभिन्न वर्गों के व्यक्तियों की मनोवृत्तियों से सीधा साक्षात्कार करा रहा है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने इस विधा को इतना लोकप्रिय बनाया है कि इसके विकास की अनंत संभावनाएँ दिखाई दे रही हैं।
साक्षात्कार लेने वाला व्यक्ति समाज के विभिन्न वर्गों के व्यक्तियों से मुलाकात कर निर्धारित तिथि को उनके जीवन, रुचियों, कृतित्व, विचार, प्रेरणास्रोत आदि के संबंध में प्रश्न करता है और उनके दिये गये उत्तरों को लिपिबद्ध करता है। इस प्रकार के लिए गये साक्षात्कार में कल्पना का समावेश नहीं होता। अतः ये साक्षात्कार ऐतिहासिक तथ्य के रूप में धरोहर बन जाते हैं। कालान्तर में इन साक्षात्कारों का महत्त्व इतना बढ़ जाता है कि ये इतिहास, समाजशास्त्रा, राजनीतिशास्त्रा, अर्थविज्ञान, साहित्य का इतिहास आदि के लेखन में तथ्यमूलक प्रामाणिक दस्तावेज का काम करते हैं।
साहित्य की अन्य विधाओं के समान साक्षात्कार-लेखन कोई शगल नहीं है। संग्रह एवं संकलन की भावना इसमें संवेदनात्मक स्तर पर बहुत गहरी होती है। साक्षात्कारकर्ता की संवेदना व्यक्तिगत एवं वस्तुगत दोनों स्तरों पर होती है। साहित्य की अन्य विधाओं के समान यहाँ कल्पना-तत्त्व की कोई खास जगह नहीं होती। यदि कोरी भावुकता-प्रदर्शन एवं दुराग्रहपूर्ण विचार से बचा जाय तो साक्षात्कार जैसी सशक्त विधा कोई हो ही नहीं सकती।
हिन्दी साक्षात्कार विधा की बढ़ती लोकप्रियता के चलते आज उसके स्वरूप एवं संभावनाओं की पड़ताल होने लगी है। उसके ऐतिहासिक विकास-क्रम पर समीक्षक विचार करने लगे हैं। हिन्दी साहित्य में जैसे अन्य विधाओं की उत्पत्ति के विषय में विवाद चलते रहे हैं, उसी प्रकार साक्षात्कार विधा के उद्भव के विषय में भी विद्वानों में मतैक्य नहीं है। कुछ विद्वान इस विधा का आरंभ श्री चन्द्रभान से मानते हैं तो कुछ पं. बनारसीदास चतुर्वेदी से। चतुर्वेदी जी ने ‘रत्नाकर जी से बातचीत' शीर्षक साक्षात्कार सितंबर, १९३१ के ‘विशाल भारत' में प्रकाशित किया था। इसके पश्चात्‌ ‘प्रेमचंद जी के साथ दो दिन' शीर्षक से उनका दूसरा साक्षात्कार जनवरी, १९३२ में ‘विशाल भारत' में ही प्रकाशित हुआ था। ‘हिन्दी इण्टरव्यू : उद्भव और विकास' नामक अपने शोध-प्रबन्ध में डॉ. विष्णु पंकज ने हिन्दी इण्टरव्यू विधा का जन्म सन्‌ १९०५ ई. से मानते हुए श्री चन्द्रधर शर्मा गुलेरी को इसके प्रवर्तक के रूप में स्वीकार करते हैं। साक्षात्कार विधा का प्रारंभ भले ही सन्‌ १९०५ से माना जाय परन्तु यह सर्व विदित है कि बीसवीं सदी के तीसरे दशक में ही इस विधा का स्वस्थ अंकुरण हो पाया था। पं. बनारसीदास चतुर्वेदी जैसे सुधी चिंतक ने ही इस विधा को पुष्पित एवं पल्लवित करने के लिए सर्वप्रथम सार्थक कदम बढ़ाया था। हिन्दी पत्रकारिता के उन्मुक्त प्रांगण में इस विधा का जन्म हुआ। आज इसका विकसित रूप पत्रकारिता, रेडियो, दूरदर्शन आदि से होता हुआ केबल चैनलों तक आ पहुँचा है। समयानुकूल एवं समसामयिक विषयों, घटनाओं आदि पर आधारित विशेषज्ञों के साक्षात्कार पुस्तकों, कैसेटों एवं सीडियों में संकलित किये जा रहे हैं।
पत्रकारिता के माध्यम से साक्षात्कार विधा को लोकप्रिय बनाने का श्रेय पं. श्रीराम शर्मा को दिया जाता है। डॉ. सत्येन्द्र ने ‘साधना' के मार्च-अप्रैल सन्‌ १९४१ अंक में अनेक लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकारों के साक्षात्कार प्रस्तुत किये।
पुस्तकाकार रूप में लेखक बेनी माधव शर्मा ने ‘कविदर्शन' प्रकाशित कराया जिसमें श्री हरिऔध, श्यामसुंदर दास, रामचंद्र शुक्ल, मैथिलीशरण गुप्त, सनेही आदि साहित्यकारों के साक्षात्कार सामने आये, परन्तु शैली की रोचकता के अभाव में इस पुस्तक को लोकप्रियता नहीं प्राप्त हो सकी। पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित साक्षात्कार विधा की प्रभावशाली पुस्तक डॉ. पद्म सिंह शर्मा ‘कमलेश' की ‘मैं इनसे मिला' है।
साहित्य की अन्य विधाओं में यांत्रिाकता अथवा अस्वाभाविकता हो सकती है, परन्तु साक्षात्कार विधा इनसे बिलकुल अछूती होती है। एक बार जब डॉ. पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश' मुम्बई के वयोवृद्ध हिन्दी पत्राकार तथा नाटककार हरिकृष्ण जौहर से साक्षात्कार लेने हेतु उनके आवास पर पहुँचे तो श्री कृष्ण जौहर ने गद्गद् होकर कहा था : ‘‘मेरे जीवन के अंतिम दिनों में आज, आप मेरी साहित्य साधना के विषय में जानकारी प्राप्त करने के लिए आने वाले एक मात्रसज्जन हैं। मेरे हर्ष की अब कोई सीमा नहीं है।''
उपर्युक्त कथन के आधार पर ही डॉ. कमलेश ने ‘मैं इनसे मिला' की पृष्ठभूमि में लिखा है : ‘‘उस वयोवृद्ध साहित्यकार के इन शब्दों ने मुझे अनुभव कराया कि उन जैसे अनेक महारथी हिन्दी की सेवा में मर खप रहे हैं और उनके संबंध में कोई कुछ नहीं लिखता। फलतः लोगों को उनके जीवन के विषय में भी कोई जानकारी नहीं होती। यदि ऐसे अनुभवी साहित्यकारों से उनके संग्रह हो सकें तो हिन्दी में एक नयी सामग्री भावी आलोचकों और इतिहास लेखकों को मिल जायेगी जिसके प्रकाश में वे उनके साहित्य को ठीक-ठीक कसौटी पर कस सकेंगे।''
उपर्युक्त कथनों से यह प्रमाणित होता है कि साक्षात्कार विधा साहित्य को अधिक प्रामाणिक एवं विश्वसनीय बनाने की एक सशक्त विधा है। साहित्य को विभिन्न दृष्टिकोणों से देखने-परखने एवं समझने की दार्शनिक पद्वति ही ‘साक्षात्कार' है।
डॉ. कमलेश जी द्वारा उग्र जी एवं जौहर जी पर लिए गये साक्षात्कार दिल्ली के ‘नवयुग' में प्रकाशित हुए। पाठकों ने इन साक्षात्कारों की काफी प्रशंसा की। परिणामस्वरूप दो खंडों में हिन्दी के प्रतिष्ठित साहित्यकारों के साक्षात्कार उन्होंने प्रकाशित कराये।
कविवर रामधारी सिंह ‘दिनकर' का ‘वट-पीपल' एक ऐसी पुस्तक है जिसमें साक्षात्कार, संस्मरण एवं रेखाचित्रतीनों एक ही साथ समाहित हैं। ‘वट पीपल' में श्री काशी प्रसाद जायसवाल, राहुल सांकृत्यायन, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन', सुमित्राानंदन पंत, मराठी साहित्य के मामा बरेकर, नृत्यांगना रुक्मिणी देवी तथा पोलैण्ड के राष्ट्रकवि अदम मित्स के संस्मरण एवं साक्षात्कार हैं।
हिन्दी के सशक्त लोक साहित्यकार स्व. देवेन्द्र सत्यार्थी द्वारा रचित ‘कला के हस्ताक्षर' साक्षात्कार की एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। इसका प्रकाशन सन्‌ १९५४ में हुआ था।
डॉ. पद्म सिंह शर्मा ‘कमलेश' तथा ‘देवेन्द्र सत्यार्थी' के बाद हिन्दी साहित्य में साक्षात्कार विधा के अनेक लेखक सामने आये। इस विधा का विकास इतनी तेजी से हुआ कि केवल हिन्दी भाषा ही नहीं बल्कि ग़ैर हिन्दी भाषी तथा विदेशी साहित्यकारों के साक्षात्कार भी हिन्दी में प्रकाशित होने लगे। राजेन्द्र यादव ने रूसी साहित्यकार एण्टन चेखव से भेंटकर उनका साक्षात्कार प्रकाशित कराया। सन्‌ १९६६ में सेठ गोविन्द दास द्वारा आचार्य रजनीश से लिया गया साक्षात्कार ‘माध्यम' पत्रिका में प्रकाशित हुआ। सन्‌ १९६५ में हरवंश लाल शर्मा की पुस्तक ‘उदयशंकर भट्ट : व्यक्ति और साहित्यकार' प्रकाश में आयी जिसमें कुछ साहित्यकारों एवं कलाकारों के साक्षात्कार समाविष्ट हैं। सन्‌ १९६२ ई. में ‘समय और हम' शीर्षक से प्रकाशित वीरेन्द्र कुमार गुप्त की पुस्तक जैनेन्द्र जी से लिये गए साक्षात्कार पर आधारित एक कालजयी कृति है।
बीसवीं सदी के सातवें दशक से इस विधा में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए जिसका प्रभाव आज तक विद्यमान है। इसके पहले सामान्यतः विख्यात लोगों के साक्षात्कार ही प्रकाशित होते थे परन्तु सातवें दशक से वैसे लोगों के साक्षात्कार भी सामने आने लगे जो सामान्य जीवन व्यतीत करते हैं। ऐसे लोगों के साक्षात्कार से बहुत सारी बातें निष्पक्ष रूप से सामने आती हैं। सातवें, आठवें एवं नवें दशक में इस विधा में काफी लचीलापन आया। मनोहर श्याम जोशी, शैलेश मटियानी, प्रेम कपूर, डॉ. लक्ष्मी नारायण लाल, ओमप्रकाश शर्मा आदि साहित्यकारों ने इस विधा को काफी महिमा मंडित किया। श्री अक्षय कुमार जैन, कन्हैयालाल नंदन, विष्णुकांत शास्त्राी, डॉ. धर्मवीर भारती, डॉ. शिवदान सिंह चौहान, दूधनाथ सिंह, प्रदीप पंत, डॉ. बापूराव देसाई आदि साहित्यकारों ने इस विधा को और अधिक सशक्त किया। महिला साक्षात्कारों में डॉ. सची रानी गुर्टू, विपुला देवी, सुशीला अग्रवाल, डॉ. माजदा असद, सावित्री परमार, वीणा अग्रवाल, सुधा अग्रवाल आदि प्रमुख हैं।
इक्कीसवीं सदी के इन पाँच-छह वर्षों में ‘हंस', ‘आजकल', ‘नया ज्ञानोदय', साहित्य अमृत', ‘आलोचना', द्वीप लहरी', ‘वाङ्मय', ‘भाषा', ‘समकालीन भारतीय साहित्य' हिन्दुस्तान दैनिक आदि पत्रा-पत्रिकाओं में साक्षात्कार विधा को काफी महत्त्व मिला है। प्रायः इन पत्र-पत्रिकाओं में किसी न किसी व्यक्ति का साक्षात्कार होता ही है। इक्कीसवीं सदी में अब तक लिये गये साक्षात्कारों की संख्या सैकड़ों हैं जिनका मूल्यांकन कर पाना यहाँ संभव नहीं है। फिर भी कुछ साक्षात्कारों का नामोल्लेख करना अप्रासंगिक नहीं होगा। इन साक्षात्कारों में प्रकाश प्रसाद उपाध्याय और शुभंकर मिश्र द्वारा कमला सांकृत्यायन से लिया गया साक्षात्कार, ललित खुराना और सीमा ओझा द्वारा गिरिराज किशोर से लिया गया साक्षात्कार, कमलेश भट्ट ‘कमल' द्वारा गोपालदास नीरज से लिया गया साक्षात्कार आदि में लेखकों की पीड़ाएँ उभरकर सामने आयी हैं।
‘साक्षात्कार' लेना भी एक कला है। इसके लिये पर्याप्त परिपक्वतों एवं सूझ-बूझ की आवश्यकता होती है। साक्षात्कार लेने के कुछ सामान्य नियमों की यहाँ जानकारी दी जा रही है -
(१) साक्षात्कार के लिये सर्वप्रथम जिस व्यक्ति का चुनाव करें उसके कार्य-क्षेत्रा, अभिरुचियों आदि के विषय में पूरी जानकारी प्राप्त कर लें।
(२) जिस व्यक्ति का साक्षात्कार लेना हो उसके कार्य-क्षेत्र के विषय के अनुसार प्रश्नावली तैयार कर लें।
(३) जिसका साक्षात्कार लेना हो उससे मिलकर अथवा दूरभाष से संपर्क स्थापित कर तिथि, समय एवं स्थान निश्चित करें।
(४) प्रस्तुत साक्षात्कार के संबंध में भेंट नायक को अपना उद्देश्य स्पष्ट करें।
(५) चयनित भेंट नायक से वही प्रश्न करें जिस पर उन्हें किसी प्रकार की आपत्ति न हो।
(६) आप जब भी प्रश्न करें इसका ख्याल अवश्य रखें कि आप सामान्य जनता की ओर से प्रश्न कर रहे हैं। श्रोता एवं पाठक को आपका प्रश्न उन्हें अपना जैसा लगना चाहिए।
(७) साक्षात्कार के समय दोनों का प्रसन्नचित्त एवं सहज होना आवश्यक है।
(८) जिनका साक्षात्कार लिया गया हो, यदि उनकी इच्छा हो तो साक्षात्कार के लिखित अथवा टेप किये हुए अंश को उन्हें दिखा दें।
(९) साक्षात्कार के दौरान कोई ऐसा प्रश्न न उठावें जिससे साक्षात्कार देने वाले व्यक्ति की जाति, धर्म अथवा व्यक्तिगत अभिरुचियों को ढेस पहुँचे।
(१०) साक्षात्कार के अंत में धन्यवाद ज्ञापन करें।
दूरभाष एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बढ़ते प्रभाव से साक्षात्कार विधा में गत्यात्मक परिवर्तन होना स्वाभाविक है। आजकल के अत्यंत व्यस्ततम युग में यह संभव नहीं है कि प्रत्येक साहित्यकार के घर जाकर साक्षात्कार लिया जाय। अतः ऐसी परिस्थिति में निःसंकोच दूरभाष का प्रयोग किया जा सकता है। कुछ बड़े लेखक इसे अपनी मर्यादा के खिलाफ ले सकते हैं। परन्तु मेरी समझ से ऐसा सोचना व्यर्थ है। साहित्य के प्रचार-प्रसार एवं संरक्षण हेतु हमें आधुनिक तकनीकी का सहारा लेना ही पड़ेगा।
यद्यपि हिन्दी साक्षात्कार विधा की उत्तरोत्तर प्रगति हुई है, फिर भी इसमें बहुत कुछ करना अभी भी बाकी है। अभी भी साहित्य की विभिन्न विधाओं के विद्वानों से अलग-अलग साक्षात्कार लेकर उसे प्रकाशित करने का कार्य नहीं हो पाया है। व्यक्तित्व केन्द्रित साक्षात्कार तो बहुत लिए जा रहे हैं परन्तु कृति-केन्द्रित साक्षात्कारों की कमी अभी भी खलती है। इस क्षेत्र में सार्थक पहल की आवश्यकता है।
बदलते समय के अनुसार साक्षात्कार लेने की पद्वति में परिवर्तन होना चाहिए। यदि साहित्यकार के व्यक्तिगत जीवन की छाप उसके साहित्य में है और अगर वह उसे स्वीकार करता है तो साक्षात्कारकर्त्ता सामान्यजन की जिज्ञासा का ख्याल रखते हुए उक्त साहित्यकार के व्यक्तिगत जीवन संबंधी प्रश्न भी कर सकता है, परन्तु मर्यादा के भीतर रहकर ही। बहुत-सी ऐसी साहित्यिक कृतियाँ हैं जो अभी भी विवादों के घेरे में हैं उन कृतियों के रचनाकारों से उन विवादित समस्याओं से संबंधित प्रश्न कर सकते हैं, इससे साक्षात्कार विधा को और मजबूती मिलेगी।
ज्ञानवर्द्धक साक्षात्कारों को पाठ्यक्रम में स्थान देना भी आवश्यक है। इससे साक्षात्कार लेने वाले व्यक्तियों का मनोबल भी बढ़ेगा और इस विधा का विकास होगा।
सारांशतः हम यह कह सकते हैं कि आधुनिक साक्षात्कार विधा का भविष्य उज्ज्वल है। वह समय दूर नहीं है जबकि साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा साक्षात्कार विधा की गरिमा एवं लोकप्रियता अधिक विकसित होगी।
विज्ञान भूषण
अंग्रेजी शब्द ‘इन्टरव्यू' के शब्दार्थ के रूप में, साक्षात्कार शब्द का प्रयोग किया जाता है। इसका सीधा आशय साक्षात्‌ कराना तथा साक्षात्‌ करना से होता है। इस तरह ये स्पष्ट है कि साक्षात्कार वह प्रक्रिया है जो व्यक्ति विशेष को साक्षात्‌ करा दे। गहरे अर्थों में साक्षात्‌ कराने का मतलब किसी अभीष्ट व्यक्ति के अन्तस्‌ का अवलोकन करना होता है। किसी भी क्षेत्र विशेष में चर्चित या विशिष्ट उपलब्धि हासिल करने वाले व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व और कृतित्व की जानकारी जिस विधि के द्वारा प्राप्त की जाती है उसे ही साक्षात्कार कहते हैं।
मौलिक रूप से साक्षात्कार दो तरह के होते हैं -१. प्रतियोगितात्मक साक्षात्कार २. माध्यमोपयोगी साक्षात्कार
प्रतियोगितात्मक साक्षात्कार का उद्देश्य और चरित्रमाध्यमोपयोगी साक्षात्कार से पूरी तरह भिन्न होता है। इसका आयोजन सरकारी या निजी प्रतिष्ठानों में नौकरी से पूर्व सेवायोजक के द्वारा उचित अभ्यर्थी के चयन हेतु किया जाता है; जबकि माध्यमोपयोगी साक्षात्कार, जनसंचार माध्यमों के द्वारा जनसामान्य तक पहुँचाये जाते हैं। जनमाध्यम की प्रकृति के आधार पर साक्षात्कार भी भिन्न प्रकार से आयोजित किये जाते हैं। इनके सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक पक्षों में भी बहुत अंतर होता है। जिसकी सम्पूर्ण और स्पष्ट जानकारी का होना, साक्षात्कारदाता और साक्षात्कारकर्ता दोनों के लिए आवश्यक होता है। माध्यम के अनुसार ही कर्ता और दाता अपनी तैयारी कर सकते हैं और फलस्वरूप साक्षात्कार की सफलता सुनिश्चित की जा सकती है।
जनमाध्यमों के आधार पर साक्षात्कार दो प्रकार का हो सकता है -१. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए साक्षात्कार। २. प्रिंट मीडिया के लिए साक्षात्कार।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए साक्षात्कार
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के अन्तर्गत रेडियो और टेलीविजन को शामिल किया जाता है। इन माध्यमों के लिए आयोजित किये जाने वाले साक्षात्कार की सफलता में तकनीकी पक्ष का भी विशेष महत्त्व होता है। जहाँ एक तरफ रेडियो श्रव्य माध्यम है वहीं दूसरी तरफ टी.वी. दृश्य-श्रव्य माध्यम है। यदि हमें रेडियो के लिए साक्षात्कार करना है तो टेपांकन विधि से परिचित होना साक्षात्कारदाता और साक्षात्कारकर्त्ता दोनों के लिए जरूरी है।
पूर्व निर्धारित किसी स्थान विशेष या स्टूडियो में साक्षात्कार में शामिल होने से पूर्व दाता और कर्ता को माध्यम के तकनीकी पक्षों और गुणों की पूरी तरह जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। आवाज की गति, तीव्रता, उच्चारण, माइक्रोफोन की निश्चित दिशा एवं स्थिति आदि के संबंध में पूरी तरह सहज होने पर ही एक अच्छे साक्षात्कार का आयोजन संभव हो सकता है। रेडियो के लिए किये जाने वाले साक्षात्कार के संबंध में साक्षात्कारकर्ता और दाता को भी स्मरण रखना चाहिए कि एक बार टेपांकित हो जाने के बाद उसमें संपादन की गुंजाइश बहुत कम और सीमित ही रहती है। कहने का अर्थ यह है कि साक्षात्कार में शामिल व्यक्तियों की बातचीत, श्रोता सीधे सुनता है, इसलिए उसमें सुधार की संभावना कम ही रहती है। इसी तरह टी.वी. के लिए भी आयोजित किये जाने वाले साक्षात्कार में भी अत्यंत सावधानी की जरूरत होती है। बल्कि दृश्य-श्रव्य माध्यम होने के कारण टी.वी. के लिए आयोजित किए जाने वाले साक्षात्कार में अतिरिक्त ध्यान देने की आवश्यकता होती है।
जहाँ एक तरफ रेडियो माध्यम में दाता और कर्ता की बातचीत को श्रोता सिर्फ सुन ही सकता है वहीं दूसरी तरफ टी.वी. के लिए आयोजित साक्षात्कार को लोग, सुनने के साथ-साथ देख भी सकते हैं। इसलिए साक्षात्कारकर्ता और साक्षात्कारदाता को अपने हाव-भाव,शारीरिक गतियों और चेहरे की भावाभिव्यक्तियों के प्रति भी सावधान रहना आवश्यक है। उनके द्वारा की जाने वाली प्रत्येक गतिविधि को लाखों-करोड़ों दर्शक देख रहे हैं, इस बात का भी ध्यान कर्ता और दाता को रखना पड़ता है।
इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के लिए आयोजित किये जाने वाले साक्षात्कार के द्वारा किसी भी कार्यक्रम या समाचार में प्रामाणिकता एवं जीवंतता उत्पन्न हो जाती है। लेकिन इसके साथ ही साथ जरा-सी असावधानी व लापरवाही से पूरा साक्षात्कार और कार्यक्रम ध्वस्त होने का भी भय बना रहता है। इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से प्रसारित साक्षात्कार के दौरान कही गई किसी बात को समझने के लिए श्रोताओं या दर्शकों के पास उसे दोबारा सुनने या देखने की सुविधा नहीं होती है। इसलिए इन माध्यमों के साक्षात्कार में प्रश्नों और उनके उत्तरों का आकार यथासंभव छोटे और सीधी सरल भाषा में शीघ्रता से समझ में आने वाली होनी चाहिए। इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों का उपयोग साक्षर और निरक्षर दोनों प्रकार के व्यक्ति करते हैं, इसलिए इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के लिए आयोजित साक्षात्कार की भाषा का सरल होना अतिआवश्यक होता है। इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के साक्षात्कार में समय सीमा का ध्यान भी रखना पड़ता है अर्थात्‌ साक्षात्कारकर्ता (जो कि साक्षात्कार का नियामक होता है) को इस बात का स्मरण रखना पड़ता है कि कोई भी प्रश्न बहुत लम्बा अस्पष्ट या विषय से अलग न हो। क्योंकि आयोजित किये जाने वाले साक्षात्कार के द्वारा एक निश्चित अवधि में अपने मूल विषय और निष्कर्ष पर पहुँचना रहता है।
प्रिंट मीडिया के लिए साक्षात्कार
रेडियो और टी.वी. के लिए आयोजित किए जाने वाले साक्षात्कार से पूरी तरह भिन्न प्रकृति का साक्षात्कार प्रिंट माध्यम का होता है। यद्यपि इस माध्यम के साक्षात्कार में भी कर्ता टेपरिकार्डर का उपयोग कर सकता है लेकिन उसे अंतिम रूप में लिप्यांकित ही करना पड़ता है।
प्रिंट मीडिया के लिए किये जाने वाले साक्षात्कार में दाता और कर्ता के हाव-हाव, शारीरिक गतियों और वेश-भूषा का कोई महत्त्व नहीं होता है। इस माध्यम के साक्षात्कार में सुधार करने की भी भरपूर संभावनाएँ होती हैं, क्योंकि यह साक्षात्कार दर्शकों या श्रोताओं की तरह तुरन्त या उसी रूप में पाठकों को प्रस्तुत नहीं किया जाता है। साक्षात्कार आयोजन के पश्चात्‌ संपादक अपनी कुशलता से साक्षात्कार की प्रभावपूर्ण प्रस्तुति प्रदान कर देता है। प्रिंट मीडिया के साक्षात्कार में भाषा सरल या विषयानुसार क्लिष्ट भी हो सकती है, क्योंकि इसे पढ़ने वाला व्यक्ति साक्षर तो अवश्य ही होगा, साथ ही साथ किसी शब्द, वाक्य या विषय को समझने के लिए पाठक के पास एक से अधिक बार पढ़ने की भी सुविधा होती है। इस माध्यम के साक्षात्कार में समय सीमा का भी कोई प्रतिबंध नहीं होता है लेकिन समाचार पत्रया पत्रिका में उपलब्ध स्थान की जानकारी अवश्य रखनी पड़ती है। प्रिंट मीडिया के लिए यदा-कदा सुविधानुसार साक्षात्कारदाता को प्रश्न लिखकर भी दे दिये जाते हैं, जिनका उत्तर वह लिखकर भी प्रेषित कर देता है और फिर उसे प्रकाशित कर दिया जाता है। कहने का अर्थ यह है कि प्रिंट मीडिया के साक्षात्कार में दाता और कर्ता को एक-दूसरे के सामने बैठकर बातचीत करने की बाध्यता नहीं होती है, जबकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साक्षात्कार में ऐसा करना आवश्यक होता है।
प्रिंट माध्यम में साक्षात्कार को प्रस्तुत करने के लिए वर्णनात्मक शैली भी अपनाई जा सकती है। जिसमें प्रश्नकर्ता अपने द्वारा पूछे गये प्रश्नों और दाता द्वारा दिये गये उत्तरों को जोड़ते हुए क्रमबद्ध रूप में, एक कथात्मक शैली में प्रस्तुत करता है। इसमें साक्षात्कार लेखक, साक्षात्कार दाता की भावाभिव्यक्ति को भी लिख देता है। प्रिंट माध्यम के साक्षात्कार में प्रारम्भिक अभिवादन और समाप्ति पर अभिवादन जैसी औपचारिकताओं की आवश्यकता नहीं होती है। सीधे तौर पर साक्षात्कारदाता का संक्षिप्त परिचय ही लिख दिया जाता है।
उपर्युक्त दोनों, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के लिए आयोजित किये जाने वाले साक्षात्कारों में कुछ तथ्यों में समानता भी होती है, जिनका ध्यान रखना आवश्यक है। उदाहरण स्वरूप दोनों ही माध्यमों के साक्षात्कारों के लिए प्रश्नोत्तर शैली ही अधिकांशतः प्रयोग में लायी जाती है। इसके लिए साक्षात्कारकर्ता को साक्षात्कार में शामिल होने से पूर्व ही कुछ प्रश्न तैयार करने पड़ते हैं। इन्हें संरचनात्मक प्रश्न कहते हैं। लेकिन पूरा साक्षात्कार बनी बनायी प्रश्नावली पर आधारित करने पर वह नीरस हो जाता है इसलिए यह आवश्यक है कि प्रश्नकर्ता अपनी बौद्धिक क्षमता एवं त्वरित निष्कर्ष निकालने की क्षमता के द्वारा साक्षात्कार के दौरान ही कुछ असंरचनात्मक प्रश्न भी पूछ ले। इन्हीं प्रश्नों के द्वारा साक्षात्कार में जीवंतता कायम रहती है और पाठक, श्रोता या दर्शक पूरी रुचि के साथ साक्षात्कार पढ़ता, सुनता या देखता है। दोनों प्रकार के माध्यमों के लिए आयोजित साक्षात्कार में साक्षात्कारकर्ता को दाता का परिचय, उसके व्यक्तित्व, कृतित्व और पृष्ठभूमि के बारे में बताना पड़ता है।
साक्षात्कार में दाता पूरी सहजता से सहभागिता करे इसके लिए आवश्यक है कि साक्षात्कारकर्ता पहले प्रश्न पूछे और साथ ही साथ दाता के उत्तर देने के दौरान उसमें विन न डाले। यदि साक्षात्कारदाता किसी प्रश्न का उत्तर विषय से परे हटकर या अनावश्यक रूप से विस्तारित शैली में देने लगे तो उन्हें पूरी शालीनता के साथ मुख्य विषय से जोड़ने का प्रयास करना, साक्षात्कारकर्ता का ही कर्तव्य होता है। इस तरह यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि माध्यम चाहे कोई भी हो(प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक) साक्षात्कार का नियंत्राण पूरी तरह साक्षात्कारकर्ता के हाथों में ही रहता है।




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हमारे समय में ‘नचिकेता का साहस'  

Posted by डा. फीरोज़ अहमद in

दिनेश श्रीनेत
साहित्य में साक्षात्कार की परंपरा को अगर हम तलाशना शुरू करें तो इसका आरंभ प्राचीनकाल से ही दिखाई देने लगता है। साक्षात्कार अपने प्राचीनतम रूप में दो लोगों के बीच संवाद के रूप में देखा जा सकता है। आमतौर पर इस संवाद का इस्तेमाल ज्ञान मीमांसा के लिए होता था। प्राचीन ग्रीक दर्शन से लेकर भारतीय पौराणिक साहित्य तक में इसे देखा जा सकता है। प्राचीनकाल में इस तरह के संवाद के कई रूप आज भी मौजूद हैं। प्लेटो की एक पूरी किताब ही सुकरात से किए गए सवालों पर आधारित है। इसी तरह से ‘कठोपनिषद्' में यम-नचिकेता के संवाद में जीवन-मृत्यु से संबंधित कई प्रश्नों को टटोला गया है, जहां नचिकेता पूछता है, ‘हे यमराज! एक सीमा दो, एक नियम दो - इस अराजक अंधकार को। अवसर दो कि पूछ सकूं साक्षातकाल से, क्या है जीवन? क्या है मृत्यु? क्या है अमरत्व?' भारत में पंचतंत्रभी प्रश्नोत्तर शैली का इस्तेमाल करते हुए कथा को आगे बढ़ाता है। यहां हर कहानी एक प्रश्न को जन्म देती है और हर प्रश्न के जवाब में ही एक दूसरी कहानी की शुरुआत होती है। यहां तक कि बाद की ‘बेताल पच्चीसी', ‘सिंहासन बत्तीसी' और ‘कथा सरित्सागर' में भी संवाद अहम्‌ है और कथा उसके माध्यम से आगे बढ़ती है। आधुनिक दार्शनिकों ने भी साक्षात्कार की विधा को एक ठोस आयाम दिया है। बर्कले जैसे दार्शनिकों की भी पूरी एक किताब साक्षात्कार शैली में है। इतिहासकार अर्नाल्ड टायनबी तथा दार्शनिक ज्यां पॉल सात्रके साक्षात्कार भी काफी लोकप्रिय रहे हैं। इन सबके अलावा भारतीय दर्शन की सबसे लोकप्रिय किताब ‘गीता' से बेहतर उदाहरण क्या हो सकता है, जहां पूरी ‘गीता' कुछ और नहीं सिर्फ कृष्ण और अर्जुन के बीच संवाद है।
प्रिंट मीडिया के विकास ने इसे एक दूसरा आयाम दिया। इसने साक्षात्कार को दुनिया की चर्चित हस्तियों को जानने-समझने, उनकी जवाबदेही तय करने और कई बार उन्हें कटघरे में खड़ा करने वाली विधा में बदल दिया। पश्चिमी देशों की कुछ पत्रिकाएं सिर्फ अपने साक्षात्कारों की बदौलत ही लोकप्रिय हैं। इसके विपरीत पश्चिम के मुकाबले भारत में अभी भी इंटरव्यू के मामले में प्रिंट मीडिया काफी पीछे दिखाई देता है। यहां प्रिंट मीडिया का शुरुआती विकास वैचारिक तथा अवधारणात्मक किस्म के आलेखों से हुआ। इसमें इंटरव्यू जैसे ‘लाइव' माध्यम की ज्यादा गुंजाइश नहीं थी। ‘दिनमान' और ‘धर्मयुग' तक में अधिक जोर वैचारिक तथा विश्लेषणात्मक लेखों का था। शायद यही वजह रही है कि साहित्यिक विधा के रूप में भी इसे अधिक गंभीरता से नहीं लिया गया और आज भी हमें जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद, निराला या महादेवी के बहुत अच्छे इंटरव्यू नहीं मिलते। यदि कभी ऐसे साक्षात्कार लिए भी गए हों तो कम से कम वे आज शोधार्थियों के लिए सुलभ नहीं हैं। संभवतः ‘रविवार' ने जब घटनाओं की सीधे रिपोर्टिंग करके पत्रकारिता के एक नए तेवर से हिन्दी के पाठकों को अवगत कराया तो साक्षात्कार की अहमियत खुद-ब-खुद सामने आ गई। इंटरव्यू ने पत्रकारिता को तेवर देने के साथ-साथ यथातथ्यता और प्रामाणिकता को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
हिंदी में साक्षात्कार की विधा का सही विकास इसके बाद से ही देखने को मिलता है। साक्षात्कार को एक सुंदर और साहित्यिक रूप पद्मा सचदेव ने दिया और व्यवस्थित तरीके से प्रस्तुत किया अशोक वाजपेई ने। पद्मा सचदेव ने अपने नितांत आत्मीय स्वर में की गई बातचीत से लोगों की चिरपरिचित शख्सियत को ही एक नए रूप में सामने रखा। डोगरी में कविताएं लिखने वाली पद्मा को हिंदी में बड़ी पहचान उनके इन साक्षात्कारों की वजह से ही मिली। कृष्णा सोबती ने भी ‘हम हशमत' में कई दिलचस्प साक्षात्कार लिए - इस पुस्तक में उनके साक्षात्कार आमतौर से सिर्फ बातचीत न बनकर लेखिका की सामने वाले से उसके पूरे वातावरण के बीच एक ‘मुठभेड़' बनता था। अपने शुरुआती दौर में ‘पूर्वग्रह' ने भी साक्षात्कार विधा को काफी संजीदगी से लिया। अशोक वाजपेई ने उसमें कई महत्त्वपूर्ण साक्षात्कार प्रकाशित किए। इस साक्षात्कारों का आयोजन भी आमतौर पर ‘पूर्वग्रह' ही करता था। उन्होंने हिंदी में साक्षात्कार विधा को जकड़बंदी से निकालकर उसे साहित्यकारों के अलावा चित्रकारों, संगीतकारों तथा फिल्मकारों पर भी एकाग्र किया। उन्होंने अपने संपादन में ‘पूर्वग्रह' के साक्षात्कार की दो किताबें भी निकालीं - ‘साहित्य विनोद' और ‘कला विनोद'। यह पूर्वग्रह की शैली थी कि किसी एक रचनाकार या कलाकार का दो या तीन लोग मिलकर इंटरव्यू करते थे। बाद के दौर में ‘बहुवचन' और ‘समास' जैसी पत्रिकाओं ने भी कई महत्त्वपूर्ण इंटरव्यू प्रकाशित किए, जिनमें आशीष नंदी जैसे समाजशास्त्री, कृष्ण कुमार जैसे शिक्षाशास्त्री, ज्ञानेंद्र पांडेय जैसे इतिहासकार और मणि कौल जैसे फिल्म निर्देशक भी शामिल थे। इन दिनों साक्षात्कार को एक गंभीर रचनात्मक आयोजन में बदलने वाली एक और अहम्‌ पत्रिका ‘पहल' है। ‘उद्भावना' पत्रिका ने तो सिनेमा पर गंभीर विमर्श को भी साक्षात्कार शैली में प्रस्तुत कर दिया।
हिंदी पत्रकारिता ने साक्षात्कार की विधा को देर से पहचाना और बाद में उसमें तेजी से परिवर्तन भी कर डाले। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के असर से प्रिंट मीडिया में भी इंटरव्यू का ताप और तेवर तय हुआ। लंबे साक्षात्कारों और सोच-विचारकर किए गए सवालों की जगह छोटे इंटरव्यू और पहले से तय प्रश्न दिखने लगे। फिल्मी हस्तियों, मॉडल, खिलाड़ी तथा अन्य ग्लैमर वर्ल्ड की हस्तियों के छोटे साक्षात्कार प्रकाशित होने लगे। इनके सवाल बहुत छोटे और तात्कालिक होते हैं। यह भी दरअसल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की चलते-फिरते इंटरव्यू करने की शैली का ही एक रूप है। जहां बहुत गंभीर या ठहर कर सोचने-विचारने वाले सवालों की गुंजाइश नहीं रहती। ऐसी स्थिति में ‘आपकी फेवरेट डिश' या फिर ‘लाइफ में सबसे इंपार्टेंट' जैसे सवाल ही रह जाते हैं। यानी सवाल ऐसे हों कि सिर्फ एक लाइन में जवाब दिया जा सके। यह शैली बाद के दौर में हिंदी वालों ने खूब और बिना सोचे-समझे इस्तेमाल की और अचरज की बात नहीं कि जावेद अख्तर, गुलजार और एम.एफ. हुसैन से भी इस तरह के इंटरव्यू मिल जाएं। अधकचरे किस्म के क्षेत्रीय पत्रकारों ने कामकाज संभालने वाले डी.एम. और ‘मिस शाहजहांपुर' से भी ऐसे सवाल पूछने शुरू कर दिए। कुल मिलाकर संवाद से विमर्श को खत्म कर दिया गया।
इससे उलट इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने ‘संवाद' के साथ दिलचस्प प्रयोग किए। प्रीतीश नंदी, सिमी ग्रेवाल, प्रभु चावला, विनोद दुआ और पूजा बेदी ने इंटरव्यू की शैली को ज्यादा आक्रामक बनाया। सामने वाले को निरुत्तर कर देने की हद तक चुभते सवाल पूछे और टेलीविजन पर लाखों दर्शकों ने जानी-मानी हस्तियों को इन्हीं सवालों के सामने भावुक होते और आंसू पोंछते भी देखा। इसी दौर के कुछ बेहतरीन कार्यक्रमों में साक्षात्कार को ज्+यादा से ज्यादा अनौपचारिक बनाया गया और राजनीतिक या ग्लैमर वर्ल्ड की हस्तियों को उनके अपने माहौल के बीच रिकॉर्ड किया गया। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इस विधा के साथ ज्यादा ‘तोड़फोड़' की। विधा में की गई इस तोड़फोड़ के नतीजे कभी बहुत अच्छे होकर सामने आए तो कभी उबाऊ और कभी एकदम अर्थहीन, लेकिन कुल मिलाकर प्रिंट मीडिया के मुकाबले इसने सृजनात्मकता और उसके तेवर को कायम रखा।
दिलचस्प बात यह है कि दुनिया के स्तर पर प्रिंट मीडिया ने अपनी गंभीरता बरकरार रखी। ‘टाइम' और ‘द इकोनामिस्ट' जैसी पत्रिकाओं ने अपना कलेवर या शैली इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से आक्रांत होकर नहीं बदली। नोम चोमस्की, हैरॉल्ड पिंटर, उम्बर्तो इको और गैब्रिएल गार्सिया मारक्वेज जैसे विद्वानों तथा रचनाकारों के पास अभी भी अपनी बात रखने के लिए साक्षात्कार एक बेहतर विकल्प था। यही वजह है कि इनके बहुत अच्छे साक्षात्कार उपलब्ध हैं, जिनमें अपने वक्त की घटनाओं पर उनकी सटीक टिप्पणी तथा विश्लेषणात्मक रुख देखने को मिलता है। इसके विपरीत हम हिंदी तो दूर अपनी भारतीय भाषाओं तक में महाश्वेता देवी, अरुंधति राय, अमिताव घोष या नामवर सिंह के लंबे और गंभीर इंटरव्यू नहीं पाते। लिखे हुए शब्दों का विचार से यह ‘पलायन' अपने-आप में किसी समाजशास्त्रीय विमर्श का दिलचस्प विषय है।
हमेशा से माध्यमों में आए बदलावों से विधागत परिवर्तन हुए हैं और कई बार ‘विधाओं' ने अपनी मौलिकता को बरकरार रखते हुए माध्यमों का आंतरिक ताना-बाना बदला है। इस लिहाज से इंटरनेट की साक्षात्कार विधा में एक अलग भूमिका उभरकर सामने आ रही है। इंटरनेट इस दौर में तेजी से विचारों के ‘दस्तावेजीकरण' तथा उनकी ‘उपलब्धता' सुनिश्चित करने का माध्यम बना है, बेवसाइटों को खंगालें तो लगभग सभी अहम्‌ विचारकों के साक्षात्कार मिल जायेंगे। यहां आमतौर पर बड़े और लंबे इंटरव्यू ही उपलब्ध हैं। इतना ही नहीं इनमें से बहुत से साक्षात्कारों के वीडियो तथा ऑडियो फारमेट भी उपलब्ध हैं, जिन्हें उसी रूप में देखा या सुना जा सकता है। एडवर्ड सईद, नोम चोमस्की तथा ऐजाज अहमद जैसे विद्वानों के कई महत्त्वपूर्ण इंटरव्यू तथा पूरी-पूरी किताबें इंटरनेट की साइटों पर मौजूद हैं। यह उदाहरण हमें यह भी बताता है कि ‘विचार' किस तरह से माध्यमों में अपना दखल बनाते हैं। समय बदला है मगर अपने ‘समय से संवाद' लगातार जारी है। ‘कठोपनिषद्' में नचिकेता के सवालों के जवाब में यमराज कहते हैं, ‘हे नचिकेता, तूने साहस किया है! बहुत बड़ा साहस! तूने साक्षात्‌ मृत्यु से प्रश्न किया है और वह भी उसी के साम्राज्य में प्रवेश करके। स्वागत है तुम्हारे इस साहस का!' साक्षात्कार अपने सर्वाधिक सार्थक रूप में इसी ‘साहस' से जन्म लेता है। नचिकेता की प्रश्नाकुलता अब ‘साइबर स्पेस' में तैर रही है।


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बाजार में मुक्ति तलाशती औरतें  

Posted by डा. फीरोज़ अहमद in

- सुरेश पंडित
नारीत्त्व का मिथक आखिर है क्या? क्यों स्त्री को धर्म, समाज, रूढ़ियाँ और साहित्य शाश्वत नारीत्त्व के मिथक के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं? क्योंकि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर उसे-ओ वूमेन! दाऊ आर्ट हाफ ड्रीम एण्ड हाफ रियेलिटी' बताकर रहस्यात्मकता से आच्छादित करना चाहते हैं? क्यों महाकवि जयशंकर प्रसाद उसे ‘नारी तुम केवल श्रद्धा हो' कहकर एक उदात्त देवत्त्व प्रदान करने के लिए लालायित नजर आते हैं या फिर राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ही क्यों उसे ‘अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी' लिखकर करूणा का पात्रा बनाने पर उतारू हो जाते हैं? सुविख्यात नारीवादी चिन्तक सीमोन द बोउआर इस मनोवृत्ति को दुनिया की हर संस्कृति में पाती हैं। वे कहती हैं कि हर जगह उसे या तो देवी के रूप में पूजा की वस्तु या फिर दासी के रूप में उपयोग वस्तु बनाकर प्रस्तुत किया गया है। अपने ऊपर आरोपित इन दोनों स्थितियों को उसने सहर्ष स्वीकार तो किया ही है बल्कि स्थायित्त्व देने के लिए इनको अपने आचरण में उतारा तथा अगली पीढ़ियों को संस्कार के रूप में और आगे बढ़ाने के लिए दिया भी है।
देवी के रूप में उसे दी गई प्रतिष्ठा दरअसल उसे उस मर्यादा में बंधे रहने के लिए बाध्य करती है जो पुरुष प्रधान समाज ने उसे अपने अधीन रखने के लिए बनाई थी। इसका उल्लंघन उसे तत्काल कुलटा, पतिता व कलंकिनी बना देता है और इसका प्राचश्चित व जान देकर अथवा जीवनभर सामाजिक उत्पीड़न सहकर ही कर पाती है।
परन्तु पिछली सदी में चले महिला मुक्तिकामी आन्दोलनों ने न केवल उस मर्यादा की वैधता पर प्रश्न चिद्द लगाया बल्कि उसे पुरुषों के समान अधिकार पाने के लिए अधिकाधिक जागरूक भी किया। उनकी बदौलत ही उसे अपना पक्ष मजबूती से रखने के अवसर मिले और उसका एक निर्भीक असर्टिव(स्वाग्रही) व्यक्तित्त्व सामने आया। उसने जोर देकर घोषित किया कि वह बल और बुद्धि में किसी से कम नहीं है। इसलिए उस पर आरोपित रहस्यात्मकता, कामातिरेकता, बुद्धिहीनता, निर्णय, अशक्यता और दुर्बलता आदि की धारणाएँ न केवल निराधार व कपोल कल्पित हैं बल्कि एक सुचिन्तित साजिश की परिणाम भी हैं।
स्त्री की स्वायत्त अस्मिता को पुल्लिंगी समाज से मान्यता दिलवाने में जहाँ कृषि समाज के पहले औद्योगिक और बाद में सूचना समाज में रूपान्तरण ने मदद की है वहीं मीडिया की भूमिका भी अतिशय उल्लेखनीय रही है। पत्र/पत्रिकाएँ लगाकार महिला मुक्ति के पक्ष-विपक्ष में बहस चलाते रहे हैं और इस तरह यह मुद्दा पिछले कई दशकों से चर्चा के केन्द्र में बना रहा है। मीडिया के इस संबल ने स्त्री को भरपूर आत्मविश्वासी एवं लक्ष्य प्राप्ति के लिए जुझारू बनाया है। लेकिन मीडिया की समय-समय पर हाँकने वाली ये उद्घोषणाएँ, लगता है समाज के कुछ खास वर्गों के सीमित सदस्यों को ध्यान में रखकर ही की जाती रही हैं क्योंकि अभी तक भी सामान्य परिवारों में बेटियों को जितनी छूट मिल जाती है उतनी बहुओं को सुलभ नहीं होती दिखाई देती। बल्कि देहात में तो बेटियाँ भी उस सुविधा को पाने में असमर्थ रहती हैं। बड़े और छोटे शहर, शहर और गाँव, तथा शिक्षा व धन के आधार पर बनी वर्ग भिन्नताएँ आज भी औरत की आजादी को किस तरह नियंत्रित करती हैं, इसे बताना अब आवश्यक नहीं रह गया है।
परन्तु महिला मुक्ति के अनेक समर्थक भी अब सोचने लगे हैं कि कहीं यह आन्दोलन अपने असली उद्देश्य से भटक तो नहीं गया है? कहीं बाजार की ताकतों ने इसे ‘हाइजेक' करके अपने लाभ के लिए इसका उपयोग करना तो शुरू नहीं कर दिया है? क्योंकि मीडिया औरतों में बढ़ती जिस असर्टिवनैस को बढ़ा चढ़ा कर दिखा रहा है उसका उनकी मानसिक उन्मुक्तता से उतना सम्बन्ध नजर नहीं आता जितना देह प्रदर्शन या यौन मुक्ति से होता है। उसके नजरिए से वह औरत अधिक स्वायत्त और अधिकार सम्पन्न ठहरती है जो पश्चिमी पूँजीवादी सभ्यता की नकल करते हुए अपने जिस्म को बाजार की मांग के अनुरूप ढ़ालने में समर्थ होती है। भोगवादी जीवनशैली को अपना कर ही वह अपनी स्वाधीनता का परिचय दे सकती है। जो स्त्री-विमर्श कभी स्त्री को पुरुष के समान मान्यता और सम्मानपूर्ण जीवन जीने के अधिकार दिलाने का उद्देश्य सामने रखकर आगे बढ़ा था और वह अब देखते देखते स्त्री देह-विमर्श में बदल गया है, जो दूरदराज के गाँवों में रहने वाली अनपढ़, दीन-हीन औरतों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाते हुए उन्हें अधीनता से मुक्ति दिलाने और सम्मानपूर्वक जीना सिखाने के अभियान में लगी हैं। न ही उन महिलाओं को वह महत्त्व देता है जो भूमण्डलीय ग्राम में आर्थिक उदारीकरण के तहत होने वाले विकास के कारण हो रहे विस्थापन एवं अन्याय का प्रतिरोध कर रही हैं। उन्हें वह इसलिए हाईलाइट नहीं करता क्योंकि वे ग्लेमरस नहीं हैं और पूँजीवादी सभ्यता के मार्ग की अवरोधक बन रही हैं।
दरअसल मीडिया स्त्री को उसी या उतनी ही स्वाधीनता देने का कायल है जिससे या जितनी से उसे लाभ होता है। उसका उद्देश्य स्त्री को स्वाधीन बनाना नहीं है उसकी स्वाधीनता का अपने हित में इस्तेमाल करना है। फिलहाल स्त्री-विमर्श की परिभाषा उसके लिए मात्र इतनी ही है कि स्त्री को अपनी देह पर उतना अधिकार मिलना ही चाहिए जिससे वह कामोत्तेजक मुद्राओं में स्वयं को अनावृत्त कर भोगवाद को बढ़ावा दे सके। मार्क्स एक जगह कहते हैं कि पूँजीवादी एक ऐसी स्थिति बनाता है जिसमें मनुष्य अनिवार्यतः मनुष्यता से वंचित होता चला जाता है। मीडिया भी औरत का इस्तेमाल एक मनुष्य के रूप में नहीं एक जिंस के रूप में कर रहा है।
मीडिया के प्रचार का ही कमाल है कि जो आन्दोलन कभी स्त्री को एक ‘सैक्स ऑब्जेक्ट' या भोग की वस्तु बनाये जाने की प्रवृत्ति का तीव्र विरोध करता था आज न केवल उस पर कोई ऐतराज नहीं कर रहा है बल्कि उसे ही स्त्री-स्वाधीनता का प्रमाण-पत्र भी दे रहा है। अब औरत की बौद्धिक क्रियात्मकता अथवा अन्य क्षेत्रों में प्रदर्शित उत्कृष्टता मीडिया के लिए उतना महत्त्व नहीं रखती जितना सैक्स के क्षेत्र में उसके द्वारा किए गए ‘एडवेंचर' रखते हैं। केवल सैक्सी का विशेषण उसे अत्याधुनिक, साहसी एवं सर्वाधिकार सम्पन्न बना देता है। पूँजीवादी सभ्यता के आदर्श ग्लोबल मीडिया की कृपा से सबके लिए अनुकरणीय बनते जा रहे हैं। तभी तो किसी सीरियल में कोई बच्चा जब अपनी माँ को यह कहता सुनाई देता है कि ‘मम्मी'! आज तो आप बड़ी सैक्सी दिखाई दे रही हैं' या ‘पापा की गर्ल फ्रेन्ड बड़ी ‘क्यूट' लग रही है' तो हमें जरा-सा भी झटका नहीं लगता।
अमरीकी टीवी चैनल इस मामले में सबसे आगे हैं। दूसरे देशों के लोग उनका अनुकरण इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वे आधुनिकता के मॉडल बने हुए हैं। अफ्रीकी एशियाई देशों में यह होड़ लगी हुई है कि किसी भी तरह वे विकसित योरोपीय देशों की पंक्ति में खड़े हो जायें और उन पर जो पिछड़ेपन व रूढ़िवादिता का कलंक लगा हुआ है वह जल्दी से जल्दी धुल जाए। वहाँ के ‘रियेलिटी', ‘बैचलर' तथा ‘बिग ब्रदर' जैसे हिट प्रोग्राम यहाँ भी बहुत हेर फेर के साथ विभिन्न चैनलों पर दिखाए जा रहे हैं और उन्हें देखने के लिए दर्शकों की अपार भीड़ भी जुट रही है। इनमें स्त्री जिस रूप में पेश की जा रही है उसे गौर से देखने की जरूरत है। इनमें उनका काम इतना प्रभावी नहीं होता जितना उनकी अदायें, चुलबुलापन, देह प्रदर्शन और मेकअप आदि होते हैं। कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि वे अपनी समझ-बूझ या प्रतिभा के अनुरूप अपनी भूमिका निभा रही हैं। जाहिर है ये प्रोग्राम इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि इनमें स्त्रियों की बौद्धिक योग्यता या रचनात्मक क्षमता के प्रदर्शन के लिए कोई गुंजाइश छोड़ी ही नहीं जाती। इनमें काम करने के लिए एक मात्र आवश्यक योग्यता स्त्री की फोटोजेनिक देह ही होती है। मीडिया उसे विभिन्न निर्माताओं के उत्पाद बेचने या प्रोग्राम को अधिकाधिक आकर्षक बनाकर टी.आर.पी. बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करता है। घर, परिवार में वे पिता, पति या पुत्र के ही अनुशासन में रहती थी लेकिन इस (तथाकथित) स्वाधीनता की दुनिया में उन्हें अपना अस्तित्त्व बनाये रखने के लिए पग-पग पर कीमत चुकानी होती है। जिस आजादी को पाने और पुरुष वर्चस्वी समाज द्वारा निर्धारित आचार संहिता से मुक्त होने के लिए वह पिछली सदी से अनवरत लड़ाई लड़ती आ रही थी उस आजादी का यह स्वरूप तो निश्चय ही नहीं था। तब भी वह पुरुषों द्वारा अनुशासित होती थी अब भी होती है। पहले घर-परिवार, समाज के नियमों का उसे पालन करना होता था अब बाजार की शक्तियाँ, जिनकी डोर पुरुषों के ही हाथों में होती है, उसे अपने अनुसार चलाती हैं। पहले मर्यादा लांघकर चलने का परिणाम उसे कलंकित होने या यातना झेलने के रूप में भुगतना पड़ता था अब काम से हाथ धो बैठने और इस प्रकार जीवनयापन के साधन से वंचित हो जाने के रूप में भोगना पड़ता है। ‘बैचलर गेम' में अपने लिए उपयुक्त साथी तलाश करने वाले युवक को इंटरव्यू देने आई युवतियों की हर तरह से जाँच पड़ताल करने की सुविधा उपलब्ध करवाई जाती है। वह हर एपिसोड में उनके अंग प्रत्यंग का ठीक उसी तरह सूक्ष्म निरीक्षण करता है जिस तरह बाजार से किसी वस्तु को खरीदने से पहले ग्राहक उलट-पलट कर देखता है और अन्त में किसी एक को चुनकर शेष को रिजेक्ट कर देता है। इन युवतियों में किसी को यह अधिकार नहीं दिया जाता कि वह भी उस युवक को उसकी औकात बता दे।
और ऐसे सीरियलों की तो भरमार है जिनमें किसी एक युवक को पाने के लिए अनेक युवतियाँ जी जान से कोशिश करती दिखाई जाती हैं। आश्चर्य है एक ओर तो निरन्तर कन्या भ्रूण हत्याओं का क्रम जारी है जिसके फलस्वरूप लिंगानुपात विषम होता जा रहा है। लड़कियों की संख्या लड़कों की अपेक्षा काफी नीचे गिरती जा रही है। दूसरी ओर एक युवक पर अनेक युवतियाँ अपना दावा पेश कर रही हैं। यह फिल्मी हक़ीकत हो सकती है जमीनी सच्चाई नहीं। पर सीरियल निर्माताओं को इससे क्या लेना-देना। उन्हें तो समाज में पुरुष के वर्चस्व को दिखाना है। स्त्रीवादी आन्दोलन इस तरह के प्रदर्शनों का विरोध नहीं करते न ही इनमें काम करने वाली स्त्रियाँ ऐसी भूमिकाएँ करने से इंकार करती हैं जिनसे उनके समानाधिकार पाने की मुहिम को झटका लगता है। इसके विपरीत एक युवक को पाने के लिए वे हर तरह के हथकंडे अपनाती हैं और उसके न मिलने पर आत्महत्या तक कर डालती हैं। मानो उसका न मिल पाना उसके जीवन की सबसे अहम्‌ असफलता हो। तरह-तरह से यह सिद्ध किया जाता है कि अच्छा मर्द पा लेना ही स्त्री जीवन की सर्वोत्तम उपलब्धि है। जो ऐसा नहीं कर पाती उसकी जिन्दगी तो निरर्थक मान ली ही जाती है उसे समाज दया का पात्रा भी बना देता है। अपने मनचाहे पुरुष को पा लेने के बाद भी स्त्री की समस्या वहीं खत्म नहीं होती। उसे अपने चिपटाये रखने, विलग न होने देने के लिए उसे उन सब आकर्षणों को भी अपने में बनाये रखना होता है जिनकी बदौलत वह उसे पा सकी थी। उन्हें बनाये रखने के लिए उसे जहाँ कोस्मेटिक थेरेपी का सहारा लेना होता है वहीं नियमित एक्सरसाइज और डाइटिंग का भी ध्यान रखना पड़ता है।
औरतों को बार-बार यह एहसास करवाया जाता है कि उनका यौवन, रूप-सौन्दर्य, हावभाव ही वे योग्यताएँ हैं जिनके
उनके पास रहने से ही उनके मनचाहे पुरुष व बाजार की नजरों में उनका कोई मूल्य है। इनका कम होना उन्हें आतंकित करता रहता है। इससे निजात पाने के लिए वे सौन्दर्य प्रसाधनों, मसाज पालरों का सहारा तो लेती ही हैं ब्यूटीशियनों तथा डाइटिशियनों के निर्देशों का भी सख्ती से पालन करती हैं। उम्र की ढलान, बढ़ती मांसलता, घटता चेहरे का नमक उन्हें अपने अवमूल्यन का पैगाम देता रहता है। दूसरी ओर उनका बौद्धिक विकास और शक्तिमत्ता उनकी फेमिनिटी के कम होने के सूचक माने जाते हैं। इस तरह वह परिवार की अधीनता से मुक्ति पाने की दौड़ में शामिल होकर स्वयं को बाजारवादी ताकतों के हाथ सौंप देती हैं।
बाजार की इस मनमानी के विरोध में जब जब भी विरोध मुखर होता है उसे स्त्री की स्वतंत्रता का विरोध घोषित कर दबाने की भरसक चेष्टा की जाती है और इसमें स्त्रीवादी आन्दोलन के मुखिया भी बढ़-चढ़ कर भाग लेते हैं। बुद्धि और विचार की दुनिया में निकाल कर स्त्री को रूप सौन्दर्य और भोग-विलास की ओर ले जाने के पीछे एक सुनियोजित रणनीति के होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। क्योंकि यह एक ओर तो उसे अपनी स्वाधीनता और समानाधिकार के लिए किए जाने वाले संघर्ष के रास्ते से भटकाती है और दूसरी ओर उसे उपभोक्तावाद का बरबस अनुयायी बनाती है। पहले उसे पालतू बनाने के लिए बचपन से ही पतिव्रता होने का प्रशिक्षण दिया जाता था। आज्ञाकारिता, नम्रता और समर्पण के भाव परिजनों द्वारा सिखाये जाते थे और इनके पालन न करने पर होने वाले भयावह परिणामों को बढ़ा चढ़ाकर बताया जाता था। अब उसी तरह की टे्रनिंग का दायित्त्व फैशन, विज्ञापन, मॉडलिंग आदि उद्योगों के संचालकों ने मीडिया को अपना सहायक बनाकर ले लिया है। पहले बालिकाओं को घर में बनी सीधी सादी गुड़ियाओं से खेलने दिया जाता था फिर वे बाजार में बनी तरह-तरह की फैशनों वाली गुड़ियाओं से खेलने लगी अब वे स्वयं उनकी नकल कर सैक्सी गुड़िया-सी बनने लगी हैं।
बाजार की मांग की आपूर्ति के लिए बनाई जाने वाली स्त्री की कामोत्तेजक छवि का जब-जब विरोध किया जाता है तब-तब मीडिया और तथाकथित बुद्धिजीवी इसे औरत की आजादी पर हमला बताकर इसका विरोध करने लगते हैं। यद्यपि वे यह भली भाँति जानते हैं कि न यह औरत की आजादी है और न इससे उसे सम्मान मिल रहा है। इसके विपरीत वह फिर से अधीन हो रही है, इस्तेमाल हो रही है। दूसरी ओर स्त्रियों के जुझारू संगठन भी इन विरोधकर्ताओं को पोंगापंथी व लकीर का फकीर घोषित कर उनकी निन्दा -भर्त्सना करने से बाज नहीं आते। उनका मानना है कि स्त्री पर किसी भी तरह का डे्रस कोड लादना या उसकी जीवन शैली की आलोचना करना एक ऐसा फासीवादी नजरिया है जो स्त्री को पुनः अन्धकार युग की ओर ले जाने वाला है। यह कैसी विडम्बना है कि एक तरफ के लोग स्त्री देह को जितना पर्दे में ढ़ककर, उसे दूसरों की नजरों से बचाकर रखना चाहते हैं तो दूसरी तरफ के उसे उतना ही अनावृत उद्घाटित करने की वकालत करते हैं। दोनों ही स्त्री के हित में इस तरह की दलीलें देते हैं। पर स्त्री वास्तव में क्या चाहती हैं, इस पर वे ध्यान नहीं देना चाहते। आखिर उसे अपनी समझ-विवेक के अनुसार जीने की स्वतंत्रता दिलाना ही तो स्त्री मुक्ति की एकमात्रऔर अनिवार्य शर्त है और यही स्वतंत्रता उसे किसी न किसी बहाने नहीं दी जा रही है। देह प्रदर्शन या यौन मुक्ति ही यदि उसकी स्वतंत्रता की काम्य मंजिल है तो यह मांग किसी के लिए आपत्तिजनक क्यों होनी चाहिए। पर उसे यह तो देखना ही होगा कि इस तरह वह कहीं अपने स्वत्त्व को ही तो जोखिम में नहीं डाल रही है।


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नारीवाद की विचार-भूमि  

Posted by डा. फीरोज़ अहमद in

- मधुरेश
किसी भी देश और समाज में स्त्री प्रायः सब कहीं एक दूसरे दर्जे की नागरिक है। पिछली शताब्दी के मध्य में जब यूरोप में स्त्री-स्वाधीनता का आन्दोलन जोर पकड़ रहा था, भारत में ऐसा मानने और समझने वालों की कमी नहीं थी कि ऐसी कोई सक्रियता, भारतीय समाज एवं संस्कृति के साथ, स्वयं स्त्री की अपनी प्रकृति के मेल में नहीं है। लेकिन धीरे-धीरे यूरोप की हवा भारतीय वायुमंडल में भी बहती अनुभव की जाने लगी।
एलिस र्श्वेजर के साथ अपनी एक संवाद-श्रृंखला में सिमोन द बोउआर ने स्वीकार किया है कि सन्‌ १९४९ में जब उनकी 'दि सेकिंड सेक्स' प्रकाशित हुई, पहले उनकी तीखी आलोचना और फिर जल्दी ही यूरोप में उसे नारीवादी आन्दोलन की बाइबिल समझे जाने के बावजूद, वे नारीवादी नहीं थीं। इसके कारण का उल्लेख करते हुए वे कहती हैं, 'क्योंकि उस समय मेरा ये विश्वास था कि औरतों की समस्यायें समाजवाद की प्रस्थापना और विकास के साथ हल हो जायेंगी। 'नारीवादी' होने से मेरा तात्पर्य यह है कि कुछ खास स्त्री मुद्दों पर वर्ग-संघर्ष से हटकर स्वतंत्र रूप से संघर्ष करना। मैं आज भी अपने इसी विचार पर कायम हूँ। मेरी परिभाषा के अनुसार 'स्त्रियाँ और वे पुरुष भी नारीवादी हैं जो पितृसत्तात्मक व्यवस्था में औरतों की स्थिति में परिवर्तन के लिए संघर्षरत हैं। यह सच है कि पूरे समाज की मुक्ति के बग़ैर स्त्रियों की पूर्ण मुक्ति संभव नहीं है, लेकिन फिर भी नारीवाद इस लक्ष्य के लिए आज और अभी से संघर्षरत हैं। इस अर्थ में मैं नारीवादी हूँ, क्योंकि मुझे लगता है कि औरत की मुक्ति के लिए हमें आज और अभी संघर्ष करना चाहिए, इससे पहले कि समाजवाद का हमारा स्वप्न पूरा हो...' (स्त्री के पास खोने के लिए कुछ नहीं है, पृ. ३९) सन्‌ ७२ में पेरिस में दिए गए अपने इस साक्षात्कार में सिमोन फ्रेंच वामपंथियों और सोवियत रूस के अपने अनुभवों को भी, 'दि सेकिंड सेक्स' लिखे जाने के तेइस वर्ष बाद अपने को नारीवादी घोषित करने के मूल कारक के रूप में स्वीकार करती हैं। अपने अनुभव के आधार पर वे इसका उल्लेख करने में कोई संकोच नहीं बरततीं कि वामपंथियों में भी, स्त्री -मुक्ति के सवाल पर, कुछेक अपवादों को छोड़कर, आम रवैया 'काफी विरोधी, आक्रामक और शत्रुतापूर्ण है।' जब पहली बार बेंसान्न में नारीवादी सभा हुई तो कुछ वामपंथी अपने कमरों में चिल्लाए-'सत्ता लिंग पर खड़ी हुई है।' लेकिन बाद में धीरे-धीरे यह मानसिकता बदली। लेकिन इसका कारण भी स्त्रियों का स्वतंत्र रूप से जुझारू और सशस्त्र संघर्ष शुरू कर देना था।
सोवियत संघ के अपने अनुभवों का उल्लेख करते हुए सिमोन ने बताया कि वहाँ प्रायः सभी स्त्रियाँ कामकाजी हैं और उच्च अधिकारियों एवं अन्य महत्त्वपूर्ण लोगों की पत्नियाँ जो काम नहीं करती, अन्य लोग उन्हें अवमानना की दृष्टि से देखते हैं। वहाँ औरतों को इस बात पर गर्व भी है कि वे कामकाजी हैं। सिमोन कहती हैं, 'राजनीतिक एवं सामाजिक दृष्टि से भी वहाँ की स्त्रियाँ महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारियों का निर्वाह करती हैं। लेकिन इन सबके बावजूद यदि आप केन्द्रीय समितियों और पीपुल्स असेंबली, जिनके पास वास्तव में कुछ अधिकार एवं सत्ता है, का जायजा लें तो पायेंगे कि वहाँ पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की संख्या बहुत कम है। व्यावसायिक क्षेत्रों में भी स्थिति कमोवेश ऐसी ही है। सर्वाधिक अरुचिकर और गैर-महत्त्वपूर्ण काम स्त्रियों द्वारा किए जाते हैं। सोवियत संघ में लगभग सभी डॉक्टर स्त्रियाँ हैं क्योंकि वहाँ चिकित्सा-सेवा मुफ्त है। राज्य इस काम का पर्याप्त वेतन एवं सुविधाएँ नहीं देता और डॉक्टरी का पेशा असामान्य रूप से कठिन और क्लांतिकर है...'(वही, पृ. ३७) शिक्षा और चिकित्सा के अतिरिक्त जो सही मायने में महत्त्वपूर्ण कार्य क्षेत्र हैं जैसे विज्ञान या इंजीनियरिंग वहाँ स्त्रियों की पहुँच बहुत कम है। फिर वहाँ स्त्रियों की सामान्य दशा पर टिप्पणी करते हुए वे कहती हैं, 'एक तो व्यावसायिक क्षेत्र में स्त्रियाँ पुरुषों के बराबर नहीं हैं और दूसरी ओर घरेलू श्रम के क्षेत्र में घोर अपमानजनक और निंद्य स्थितियाँ बरकरार हैं जैसी कि सारी दुनिया में हैं और जिसके खिलाफ आज स्त्री-आन्दोलन तीव्र संघर्ष कर रहे हैं। घरेलू काम और बच्चों की देखभाल, सोवियत सोशलिस्ट प्रजातंत्र संघ में भी स्त्रियों के लिए ही संरक्षित हैं...(वही) इस टिप्पणी के अंत में ध्वनित व्यंग्य ही वस्तुतः सिमोन द बोउआर के अंततः नारीवादी होने का तर्क तैयार करता है।
अपनी पुस्तक 'दि सेकिंड सेक्स' में सिमोन प्रायः दुनिया में सब कहीं स्त्री के प्रति अपनाए गए दोहरे मानदण्डों की भर्त्सना करती हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि स्त्री की मुक्ति का मार्ग स्त्री के अपने संघर्ष से ही निकलेगा। यह अकारण नहीं है कि सिमोन स्त्री की स्थिति की तुलना नीग्रो की स्थिति से करती हैं। वे नीग्रो और एक स्त्री की स्थिति में गहरी समानता देखती हैं। वे लिखती हैं, 'दोनों ही जातियाँ आज पितृसत्ता से मुक्त हो रही हैं और इनके भूतपूर्व स्वामी इन्हें पुरानी जगह रखना चाहते हैं। उन्हीं जगहों में जिनका चुनाव मालिक वर्ग ने किया था। दोनों ही क्षेत्रों में मालिक यथास्थिति के प्रशंसक हैं।'(स्त्री : उपेक्षिता, पृ. २९) सिमोन मानती हैं कि स्त्री और उसके अंतर्संसार के बारे में स्त्री ही अच्छी तरह से जान सकती है। इसका कारण भी स्पष्ट है - क्योंकि उसकी अपनी जड़ें भी नहीं हैं। अन्य मानव प्राणियों की भाँति स्त्री भी एक स्वतंत्र और स्वायत्त जीव है लेकिन सदियों से पुरुष अपनी जरूरतों और स्वार्थों के अनुकूल उसे गढ़ता रहा है। सिमोन की प्रसिद्ध उक्ति है - स्त्री पैदा नहीं होती, बनाई जाती है। स्त्री के स्वायत्त और स्वतंत्र जीवन के पक्ष में खड़े होकर भी वे पुरुष के विरोध में नहीं जाती। एलिस र्श्वेजर को ही दिए गए अपने एक साक्षात्कार में वे बताती हैं कि सार्त्र से उनके संबंधों के कारण नारीवादी आन्दोलन की अनेक अग्रणी नेत्रियाँ उन्हें नारीवादी आन्दोलन में शामिल नहीं करती थीं। अपने इस संबंध की वजह से उन्हें प्रायः ही शंका और अविश्वास से देखा जाता था।
एक संस्था के रूप में सिमोन 'विवाह' का विरोध करती हैं। शुरू में उनका मानना था, 'विवाह जहाँ स्त्री को पुरुष का गुलाम बनाता है वहीं उसके फर की साम्राज्ञी भी...'(वही, पृ. १७९) किंचित्‌ व्यंग्य के साथ वे लिखती हैं कि विवाह अन्य सब कैरियरों से अधिक आकर्षक, आसान और सुविधाजनक है। विवाह के प्रसंग में वे फ्रॉयड को उद्धृत करते हुए कहती हैं, 'पति प्रेमी पुरुष का एक पूरक तो हो सकता है, किन्तु वह प्रेमी नहीं हो सकता।' उनके अनुसार विवाह की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि वह 'सुख' के विषय में किसी प्रकार का आश्वासन नहीं देता। विवाह में स्त्री की विषम और दीन परिस्थिति पर उनकी टिप्पणी है, 'यह तो विवाह प्रणाली ही है जो स्त्री को प्रार्थी का रूप देती है और यह प्रणाली उसे जोंक की तरह रक्त पिपासु जीव बनाती है...(वही, पृ. २११) वे अंत तक विवाह के विरुद्ध रहीं क्योंकि एक शादीशुदा स्त्री के रूप में समाज के साथ स्त्री के वैसे ही संबंध नहीं रह जाते जैसे कि एक गैर शादीशुदा स्त्री के होते हैं। जहाँ भी अवसर मिलता है विवाह को वे औरतों के लिए 'बहुत खतरनाक' बताती और घोषित करती हैं। स्त्री-मुक्ति के प्रसंग में, स्वयं अपने पर टिप्पणी करते हुए वे कहती हैं, 'मेरे पास स्त्री का शरीर है लेकिन फिर भी मैं काफी खुश किस्मत रही हूँ। मैं ऐसी चीजों से मुक्त रही, जो औरत को गुलाम बनाती हैं, जैसे पत्नी और मातृत्व की परम्परागत भूमिकाएँ।' (स्त्री के पास खोने को कुछ नहीं है, पृ. ४४) इसी तरह वे 'परिवार' नामक संस्था के भी विरुद्ध हैं और उसके स्थान पर 'कम्यून' या उसी प्रकार के किसी दूसरे ढांचे की सिफारिश करती हैं जिससे स्त्री समानता के साथ रह सके।
स्त्री की मुक्ति कैसे उसका अपना निजी उद्यम है, इसका उदाहरण वे अपने जीवन से देती हैं। सार्त्र से उनके अंतरंग संबंधों के कारण जब नारीवादी आन्दोलन में उन्हें शंका और संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा था तब भी वे अपना स्वतंत्र और स्वायत्त जीवन जी रही थीं। साथ रहने की समझ और आपसी क़रार के बीच भी वे वस्तुतः उस रूप में कभी एक साथ नहीं रहे जिसे स्थायी रूप में एक छत के नीचे रहना कहा जाता है। बाहर जाने पर भी होटल में वे प्रायः ही अलग कमरों में रहते थे - अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए। आर्थिक दृष्टि से ऐसे अवसर भी आए जब सिमोन ने सार्त्र से आर्थिक सहायता स्वीकार की। लेकिन ऐसा ख़ासतौर से तभी हुआ जब अपनी अध्यापकी की नौकरी छोड़कर उन्होंने अपना लेखन किया। आर्थिक दृष्टि से वे कभी सार्त्र पर निर्भर नहीं रहीं। अनेक बार, ऐसे ही स्थिति में, उन्होंने सार्त्र की भी आर्थिक सहायता की। यात्राओं और होटलों का खर्च वे समान रूप से उठाते थे और प्रायः ही यह हिसाब नहीं रखते थे कि किसका कम या ज्यादा खर्च हुआ। इसी सोच के आधार पर सार्त्र को स्वतंत्रता देकर वे अपनी स्वतंत्रता बनाए रख सकीं। अपने अमेरिकी प्रेमी नेल्सन एल्ग्रेन के प्रति अपनी गहरी आसक्ति और लगाव की स्वीकृति में उन्हें कहीं कोई असुविधा नहीं होती। सार्त्र के अनेक प्रेम-संबंधों को भी इसी तरह उन्होंने बहुत खुले मन से झेला-एकाध उस अपवाद को छोड़कर जब उन्हें उसके एकाधिकारवाद में दूसरे संबंधों के प्रति गहरी उपेक्षा या तानाशाही दिखाई दी। घरेलू पत्नियों के अलगाव और नौकरी पेशा स्त्रियों के अकेलेपन में वे एक बुनियादी अंतर देखती हैं। मानती हैं कि उसे अंततः इन दो में से एक का चुनाव करना ही होगा। आर्थिक दृष्टि से स्त्री की आत्मनिर्भरता पर उसकी टिप्पणी है, 'नौकरी कोई रामबाण नहीं है, लेकिन बावजूद इसके मुक्ति की बुनियादी शर्त है'...(वही, पृ. ५१)
पिछले दो दशक हिन्दी में नारी-विमर्श से अधिक उसकी चर्चा के वर्ष रहे हैं। सिमोन द बोवुआर, केट मिलेट, जर्मेन ग्रेयर आदि लेखिकाओं जैसे गंभीर और व्यवस्थित काम हिन्दी में लगभग नहीं हुए। हिन्दी में नारीवाद की वैचारिकी का मूल स्रोत वस्तुतः में ही लेखिकाएँ हैं। हिन्दी में प्रभा खेतान की पुस्तकों को छोड़कर नारीवाद की अधिकतर चर्चा छिटपुट टिप्पणियों, वक्तव्यों और पत्रकारी लेखों के रूप में ही हुई है। इन लेखिकाओं में प्रभा खेतान, मैत्रेयी पुष्पा, पुष्पलता शर्मा, मृणाल पाण्डे, नासिरा शर्मा, अनामिका, कात्यायनी, मनीषा आदि का उल्लेख सहज ही किया जा सकता है।
जैसा कि कहा गया, इनमें प्रभा खेतान का काम सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने सिमोन द बोवुआर की 'दि सेकिंड सेक्स' का अनुवाद तो किया है। सार्त्र पर अपने अध्ययन और शोध की प्रक्रिया में उन्होंने यूरोप के अस्तित्ववादी दर्शन और नारीवादी आन्दोलन का भी गंभीर अध्ययन किया है। इस संबंध में उनकी दो पुस्तकें 'उपनिवेश में स्त्री' और 'बाजार के बीच : बाजार के खिलाफ़' ख़ासतौर से ध्यान आकृष्ट करती हैं। जब वे किसी राजनीतिक उपनिवेश के रूपक में ढालकर स्त्री को देखती और परिभाषित करती हैं, स्पष्ट है वे सिमोन के स्त्री-पुरुष के संबंध की गोरे और काले के संबंधों वाली व्याख्या से अप्रभावित नहीं हैं। अपनी स्वतंत्रता के लिए स्त्री का संघर्ष वस्तुतः एक राष्ट्रवादी क्रांति के लिए किए जाने वाले संघर्ष से बहुत भिन्न नहीं है। इस संघर्ष में उसे अनेक स्थापित सामाजिक संस्थाओं और वर्चस्वशील विचार सरणियों से टकराना होता है। पितृसत्ता, यौन शुचिता, परिवार और आर्थिक आत्मनिर्भरता के पुराने मिथक उसने तोड़े और नए गढ़े हैं। इन स्थापित सामाजिक, सांस्कृतिक संस्थाओं को स्त्री-विरोधी प्रकृति पर टिप्पणी करते हुए वे लिखती हैं, 'मगर पितृसत्तात्मक समाज की स्त्री विरोधी परम्पराओं का आयाम पूरी तरह विशिष्ट है। ये परम्परायें स्त्री को घर सौंपती हैं, बच्चों का भरण-पोषण सौंपती हैं। मानवता के नाम पर वृद्ध और बीमारों के लिए उससे निःशुल्क सेवा लेती हैं और बदले में उसके द्वारा की गई सेवाओं का महिमा-मंडनकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेती हैं। स्त्री भूखी है या मर रही है इसकी चिन्ता किसी को नहीं होती'...(उपनिवेश में स्त्री, पृ. १४) इस स्थिति में निहित सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक-हर क्षेत्र में निर्णय के अधिकार से उसे वंचित करके उस पर तरह-तरह की जिम्मेदारी लादकर उस दायित्व को निभाने की अपेक्षा की जाती है।
प्रभा खेतान मानती हैं कि भू-मंडलीकरण ने स्त्री को जितना लाभ पहुँचाया है, उससे अधिक हानि पहुँचाई है। उसने स्त्री को सब कहीं एक आकर्षक उत्पाद में बदला है। भ्रूण-हत्या और बालिका-शिशु की उपेक्षा का अनुपात तेजी से बढ़ा है। भारत जैसे समाज में स्त्री की आर्थिक स्वतंत्रता ही काफी नहीं है। आर्थिक परिवर्तन के संदर्भ में राजनीतिक और
सामाजिक आन्दोलन की जरूरत है। वे स्पष्ट लिखती हैं, 'अमानवीय विकास के प्रतिमानों को खारिज करता और जनोन्मुख नजरिए को विकसित करना नारीवाद का पहला उद्देश्य होना चाहिए।'(वही, पृ. ३५) स्त्री के संदर्भ में पूर्ववादी दृष्टि से उसके महिमा-मंडन को वे जितना गलत समझती हैं, पश्चिम के पुरुष चिन्तकों की स्त्री-विरोधी दृष्टि की भी वे वैसी ही स्पष्ट आलोचना करती हैं। वेद-वेदान्त से लेकर कार्ल मार्क्स की स्त्री-चिन्ता तक सब कहीं वे दुराग्रहों की टोह लेती हैं। इस स्त्री विरोधी परिप्रेक्ष्य में वे लेखिकाओं की निष्क्रियता पर भी हैरत जताती हैं। पुरुष-संस्कृति के विकल्प में नारीवाद को वे एक निरन्तर और विकासमान प्रक्रिया के रूप में देखती और स्थापित करती हैं। मारक प्रभावों के बीच में उसकी अनिवार्यता की बात करती हैं। स्त्री के संदर्भ में संस्कृति के भू-मंडलीय प्रभाव को आँकने के लिए वे एक इंटर कांटिनेंटल होटल के रूपक की सिफ़ारिश करती हैं। सासकिया सासेन एक नए अंतर्राष्ट्रीय समाज के प्रकटीकरण पर जोर देती हुई एक ऐसे भूमंडलीय समाज की बात करती हैं। जिसमें बेहिसाब धन बहता है और उस समाज में वे स्त्री की भूमिका का सवाल उठाती हैं। इस समाज में पूँजी का तेज बहाव देखने को मिलता है जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महानगरों को वित्तीय राजधानी में बदल रहा है। इस भूमंडलीय संस्कृति की अच्छाई-बुराई पर प्रभा खेतान पर्याप्त वस्तुनिष्ठ टिप्पणी करती हैं, ÷इस टकराहट का लाभकारी पक्ष है पर्यटन और व्यापार को बढ़ावा मिलता है, मगर खराब पक्ष है कि इससे समाज में यौन-पर्यटन भ्रष्टाचार तथा अन्य बुराईयाँ फैलती हैं...'(बाजार के बीच : बाजार के खिलाफ, पृ. १५) किसी भी देश के हर महानगर में पाँच सितारा होटलों में संस्कृति का संजाल फैला हुआ है जिसमें बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की होटल-श्रृंखला होटलों में यात्रियों को घर जैसे आराम का आश्वासन देती है। देश संस्कृति की भिन्नता विरोधी यह भूमंडलीय एकल संस्कृति है - मोनो कल्चर। इसमें सब कहीं एक रूपीकरण पर जोर होता है। एक से उत्पाद-फ़ास्ट फूड से लेकर परिधान और जूतों तक। प्रभा खेतान भूमंडलीकरण को सिरे से नकारती नहीं हैं, वे भरसक उसके वस्तुनिष्ठ आंकलन की कोशिश करती हैं। वे उसे एक ऐसी बिजली की संज्ञा देती हैं जो घर को रोशन करती है और उसमें आग भी लगा सकती है। इस खुली अर्थव्यवस्था में वे इस ओर से उदासीन नहीं हैं कि विकास अनिवार्य रूप से कल्याणकारी योजनाओं से सम्बद्ध है और भूमंडलीकरण के नाम पर जिस तरह से दक्षता और प्रतियोगिता की माँग होती है तथा विकास के नए मानक तैयार किए जाते हैं, उससे गरीबी, बेरोजगारी और बढ़ती है।
एशियाई संस्कृति के संदर्भ में प्रभा खेतान 'परिवार' नामक संस्था पर पुनर्विचार करते हुए स्त्री की कीमत पर उसके बने रहने की सच्चाई तक पहुँचती हैं। देह-व्यापार का व्यापक संजाल इस ओर संकेत करता है कि अधिकांश एशियाई पुरुष पत्नी के प्रति सेक्स-संबंधों में निष्ठावान नहीं होते। इस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए वे लिखती हैं, 'सेक्स एक ऐसा मनोरंजन है जिसका लुत्फ़ पुरुष और सिर्फ पुरुष ही दाम्पत्य जीवन की सीमाओं से बाहर जाकर उठा सकता है। अनेक एशियाई समाजों में पत्नियों द्वारा इसे नजरअंदाज किया जाता है क्योंकि पत्नी एक तो आर्थिक रूप से पूरी तरह पुरुष पर निर्भर होती है और अधिकांश एशियाई औरतों के विचार में सेक्स संबंध ही विवाह नहीं है। वे इसे एक संस्कार मानती हैं और धूर्त्त पुरुष इसका फ़ायदा उठाते हैं...'(वही, पृ. १३४-१३५) प्रभा खेतान देह-व्यापार के अनेक रूपों की चर्चा करती हैं जो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से इस भूमंडलीकरण की देन हैं। नव धनाढ्यता की तजॅ पर वे नव दरिद्रीकरण और बाल-वेश्यावृत्ति को इसके अनिवार्य परिणाम के रूप में रेखांकित करती हैं। लेकिन सिर्फ निर्धनता को ही वे इसका कारण नहीं मानतीं। वे इसे सामाजिक विषमता और असुरक्षा से जोड़कर देखती हैं। इस प्रसंग में मानवीय गरिमा का सवाल उठाते हुए वे लिखती हैं, 'मूल प्रश्न मानवीय गरिमा और सम्मान का है एवं सभी के लिए यह चिन्ता का विषय होना चाहिए कि क्या स्त्री की पहचान उसकी योनि पर चिपकी कीमत से ही होती है?' (वहीं, पृ. १६९)
प्रभा खेतान नारीवादी आन्दोलन की सीमाओं को भी संकेत करती हैं। वे इस आन्दोलन में बढ़ते हुए वर्ग-भेद और कैरिमरिज्म के प्रति अपनी चिन्ता व्यक्त करती हैं। अपने ही घर में घरेलू नौकरानियों का शोषण करते हुए स्त्रियों का ध्यान नारीवाद की ओर प्रायः नहीं जाता।
भारत में आज भी मुख्यधारा में स्त्रियों की संख्या नगण्य है। वे अब नारीवाद के शत्रु के रूप में पुरुष या पितृसत्तात्मक व्यवस्था को उतना महत्त्व नहीं देतीं क्योंकि इसका सामना करना नारीवाद को आ गया है। वे कारपोरेट पूँजी को आज एक बड़ी समस्या के रूप में देखती और आँकती हैं क्योंकि नारीवादी स्त्रियाँ उसे सही परिप्रेक्ष्य में समझ नहीं सकी हैं। आज पुरुष इस आन्दोलन में वैसे विरोधी के रूप में नहीं देखा जाता जैसा वह पिछली शताब्दी में कभी सत्ता के दशक में देखा जाता था। उपभोक्तावाद स्त्री को जींस में बदल देगा। इस ओर उसे सचेत रहना है। अपने लिए वह कैसा जीवन चाहती है, यह अंततः उसे ही तय करना है। एक निष्क्रिय उपभोक्ता या सृजनशील व्यक्ति के बीच का चुनाव ही उसके साथ पूरे नारीवादी आन्दोलन का भविष्य तय करेगा। वे देहवाद के बढ़ते आकर्षण और माँग की ओर भी संकेत करती हैं जो मछली के चारे की तरह दुनिया के बाजार में फेंका जा रहा है। वे संजीदगी से सवाल करती हैं - इससे स्त्री को क्या हासिल होगा?
प्रभा खेतान पूँजी को उपभोग की संस्कृति से जोड़कर देखती हैं। उपभोक्ता संस्कृति और स्थानीय संस्कृति के बीच बढ़ते टकराव को रोक पाना मुश्किल है। उपभोक्ता संस्कृति से बचाव की प्रक्रिया में ही अपनी जड़ों की ओर वापसी की प्रवृत्ति जोर पकड़ती है। इससे समाज में रूढ़िवादी ताक़तों को बल मिलता है। विभिन्न देशों और समाजों में वे ताकतें हिन्दुत्त्व, इस्लाम तथा ईसाइयत के रूप में सामने आती हैं। इस प्रक्रिया में सब कहीं अल्पसंख्यकों के प्रति अनुदारता बढ़ती है। इससे सामसिकता और सहिष्णुता प्रभावित होती है। एक बहुलतावादी रणनीति बताकर ही नारीवादी आन्दोलन को सही दिशा दी जा सकती है।
मैत्रेयी पुष्पा पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री और पुरुष के बीच के संबंध को, बोवुआर और केट मिलेट की तरह ही, काले और गोरे या फिर सेवक और स्वामी के रूप में परिभाषित करती हैं। श्लील-अश्लील की बहस में वे ÷श्लील' को जीवन के सामने रखकर देखती हैं। पुरुष के वर्चस्व वाले समाज पर टिप्पणी करते हुए वे लिखती हैं, 'जब कोई वर्चस्व इतना शक्तिशाली हो जाता है कि व्यक्ति की आकाक्षाएँ, सपने, जिन्दगी पिसने लगे तो फिर राजनीति के बंधन अपना अर्थ खोने लगते हैं। श्लीलता की रक्षा के लिए मैं जिन्दगी को तबाह कर दूँ, ऐसा दबाव मानने से इंकार करती हूँ। अपने लेखन में मेरी सबसे पहली अपेक्षा रहती है जीवन के पक्ष में खड़े होना, जीवन जो गतिशीलता के साथ रहे...'(सुनो मालिक सुनो, भूमिका, पृ. ५) स्वतंत्र और स्वाधीन स्त्री के पक्ष में खड़े होने का एक ओर यदि वे 'मनुस्मृति' को खारिज करती हैं, वहीं अनेक पौराणिक एवं मिथकीय पात्रों की नई व्याख्या का प्रयास भी करती हैं। सीता, द्रौपदी आदि के प्रचलित मिथकीय स्वरूप से भिन्न एक स्वाधीन और विवेकपूर्ण स्त्री की दृष्टि से, वे उसके निर्णयों की समीक्षा करती हैं। अपने साहित्य की तरह अपनी वैचारिकी में भी वे सब कहीं स्त्री और प्रेम के पक्ष में खड़े होकर उसकी लड़ाई लड़ती हैं। इसी आधार पर वे तसलीमा नसरीन का बचाव भी करती हैं।
धर्म, संस्कृति, समाज, साहित्य, राजनीति, फ़िल्म और मीडिया आदि के व्यापक परिप्रेक्ष्य में वे बदलती हुई स्त्री का आंकलन करती हैं। 'सुनो मालिक सुनो' में, जो 'खुली खिड़कियाँ' की अपेक्षा अधिक व्यवस्थित ढंग से लिखी पुस्तक है, वे कन्या, परिणीता आदि के साथ अन्य रूपों में भी स्त्री के अस्तित्व और प्रकृति को समझने का प्रयास करती हैं। पुरुष के वर्चस्व वाली सामाजिक संरचना स्त्री को योनि मात्र के रूप में देखती है। अपनी निरंकुशता से स्त्री को व्यभिचार के हशिए पर डालकर उसके साथ वह कैसा सुलूक करती है, इसका खुलासा भी वे विस्तार पूर्वक करती हैं। कुछ महत्त्वपूर्ण रचनाओं का 'वे स्त्री-दृष्टि से पुनर्पाठ भी करती हैं।'
मैत्रेयी पुष्प जब 'कन्या' के रूप में स्त्री की स्थिति पर विचार करती हैं, वे दहेज नहीं पिता की सम्पत्ति में उसके हिस्से का समर्थन करती हैं। 'मनुस्मृति' के उस श्लोक को वे अमान्य करती हैं जिसके अनुसार स्त्री कभी स्वाधीन नहीं होती - बचपन, युवा और वृद्धावस्था तक वह क्रमशः पिता, पति और पुत्र के अधीन ही रखी जाती है। स्त्री के संरक्षण और सुरक्षा से अधिक वे हक़' की बात करती हैं। अपनी जिन्दगी के बारे में अपने फै+सले का हक़ पाकर ही वह एक विवेकी और स्वाधीन जीव हो सकती हैं। निर्धन, अनाथ और बदनाम-पेशा लड़कियों के सरकारी-गैर सरकारी सामूहिक विवाहों की हक़ीकत वे समझती हैं और सवाल उठाती है, 'इंसाफ़ की बात कहिए और बताइए, क्या विवाह से लड़की को आर्थिक आत्म-निर्भरता मिल जाती है?' (वही, पृ. ३५) इन अनाथ और बेसहारा लड़कियों के आत्मनिर्भर हो पाने की दृष्टि से वे विवाह के बदले नौकरी दिए जाने पर बल देती हैं। आत्मनिर्भर हो जाने पर विवाह तो वे स्वयं कर लेती और अपने विवेक से शायद बेहतर ही करतीं। इस प्रसंग में उनकी निष्कर्षात्मक टिप्पणी है, 'मेरी राय में सम्मान जनक जीवन शादी से नहीं सार्थक भ्रम से मिलता है।' (वही, पृ. ३६) परिणीता के रूप में स्त्री के स्वाधीन जीवन को नकारकर उसे सिर्फ देह में रेड्यूस कर दिए जाने का वे तीव्र विरोध करती हैं, जिसमें गर्भधारण से लेकर गर्भपात तक किसी में उसकी अपनी इच्छा का कोई महत्त्व नहीं होता। जो समाज स्त्री को 'योनि मात्र' समझकर उसके साथ अभद्र और अश्लील व्यवहार करता है उसके लिए जागृत स्त्री-शक्ति के रूप में वे नागपुर की स्त्रियों द्वारा अक्कू यादव की सामूहिक प्रतिरोध की घटना को याद करती हैं। इसी से वे इस निष्कर्ष तक पहुँचती हैं अपनी रक्षा स्त्री स्वयं ही कर सकती है।
तेज-तर्रार और दामन में दाग़ वाली औरतों को प्रायः ही समाज 'मर्दमार' और 'साली आवारा औरतें' वाली छवि में पेश करता है जो खुली और छुट्टा घूमती हैं और औरतों को बिगाड़ती हैं। वे स्वयं ही देह को सर्वस्व मानकर उनका मूल्यांकन करते हैं और फिर स्वयं ही उन पर निर्णय का अधिकार घोषित करते हैं।
स्त्री-चिन्तन में स्त्री को प्रायः दलित के सामने रखकर उसकी व्याख्या की जाती है, लेकिन दलित-स्त्री के संदर्भ में मैत्रेयी पुष्पा का आंकलन दलित आन्दोलन के अंतर्विरोधों पर एक तीखी टिप्पणी की तरह पढ़ा जा सकता है। वे लिखती हैं, 'वे दलित स्त्रियों को लूटे जाने, बलात्कृत होने पर तो ज्वालामुखी से फटते हैं, उनके अशिक्षित और चेतनाविहीन रखे जाने पर गुरेज तक नहीं करते। वे रास्तों में पहरेदारी का इंतजाम कर सकते हैं, अपने टोले से ज्यादा से ज्यादा लड़कियों को स्कूल भेजने की मुहिम नहीं चलाते। हिन्दू धर्म से घृणा करते हैं, जायज लगते हैं, 'मनुस्मृति' को जला डालना चाहते हैं, गुस्सा वाजिब है, लेकिन अपनी स्त्रियों के लिए पतिव्रत-धर्म लागू करते हैं और तब उनका सारा आन्दोलन हास्यास्पद हो जाता है। हद तो तब होती है जब वे अपनी औरतों की इच्छा तक नहीं जानना चाहते। नए जमाने के दलित हैं ये, उसी परिपाटी के अनुयायी, जिसकी धज्जियाँ उड़ाई थीं। वह सुरक्षा कवच देना चाहते हैं जो दासों को स्वामियों से मिला था कि उनको कोई दूसरा न ले जाए...(वही, पृ. १३६) मैत्रेयी पुष्पा के लिए पुरुष सत्ता ईश्वरीय सत्ता की तरह सर्व व्यापी है। ग्राम-पंचायतों में स्त्री के नाम पर उनके पतियों के कब्जे का सच भी उनसे छिपा नहीं है। पंचायती स्त्रियों का दिल्ली-मेला और उसमें अंग्रेजी का वर्चस्व उन्हें आहत करता है और अपने क्षोभ को वे छिपाती भी नहीं हैं। संघर्ष की राह कठिन और लम्बी भले ही हो लेकिन वे शायद उस चीनी कहावत में विश्वास करती हैं जिसके अनुसार हजार मील का सफ़र भी पहले क़दम से शुरू होता है।
स्त्री-चिन्ता के फैलते हुए क्षितिज पर टिप्पणी करते हुए लता शर्मा लिखती हैं, 'आज स्त्रियों को हर चीज से काम है। अग्नि-सर्प जैसे प्रक्षेपण-शस्त्र से लेकर मानव-क्लोन तक, गुजरात के दंगों से लेकर कन्या-भ्रूण हत्या तक। स्त्री हर गतिविधि का केन्द्र भी है, माध्यम भी और लक्ष्य भी। भला वह कैसे तटस्थ रह सकती है? सुन्दर दिखने और स्वादिष्ट पकवान बनाने का युग गया सार्थक हस्तक्षेप का युग आ गया'...(औरत : अपने लिए, पृ. २५) लता शर्मा एक ओर यदि मानती हैं कि दमित, अतीत और कुंठित वर्तमान पर सुखद भविष्य का भवन खड़ा नहीं हो सकता, वहीं वे स्त्री की देशज चिन्ता को पर्याप्त महत्त्व देती हैं। उनकी स्त्री-चिन्ता में सांती और सांवरी जैसी वे किशोरियाँ भी हैं जो सातवीं में आते-आते अचानक स्कूल आना बंद कर देती हैं। भाई की तुलना में बहुत जहीन होने पर भी या तो उन्हें माँ की मदद के नाम पर, घर-गृहस्थी के काम में झौंक दिया जाता है या फिर पैंतालीस वर्ष के किसी दुहाजू को ब्याह दिया जाता है - बाप द्वारा लिए गए पचास हजार रुपये के ऐवज में। मन न लगने पर जब वह ससुराल से भाग आती है तो पति लठैतों के साथ आकर जबर्दस्ती उसे वापस ले जाता है। जाहिर है कि विकास के सारे उपलब्ध और प्रचलित आँकड़ों के बीच ऐसी लड़कियों के लिए दिल्ली अभी दूर है। पिछड़े क्षेत्रों में ही नहीं शहरों में खाते-पीते परिवारों में भी, लड़की और लड़के बीच भारी अंतर का प्रभाव लड़कियों पर पड़े बिना नहीं रह सकता। गाँवों में शिक्षा का अभाव है। अक्षय तृतीया पर बड़े पैमाने पर बाल विवाहों का आयोजन होता है। इन सामाजिक बुराइयों के प्रति चेतना जगाकर, आत्मरक्षा और स्वावलम्बन पर बल देकर लता शर्मा अपनी चिन्ता को स्थानीय और देशज मुद्दों पर केन्द्रित करती हैं। चूँकि वे गुजरात से हैं, २००२ के दंगों में अल्पसंख्यक समाज की औरतों के साथ बरती गई नृशंसता की वे सब कहीं तीखी भर्त्सना करती हैं। इसमें हिन्दुत्त्ववादी संगठनों की स्त्रियों की भूमिका को वे एक नई परिघटना के रूप में रेखांकित करती हैं। एक तरह से वे अपनी चिन्ता में वे उस हिन्दुत्त्व का प्रतिपक्ष सामने रखती हैं, जिसके एक प्रतिनिधि के रूप में प्रवीण तोगड़िया अल्पसंख्यकों-मुस्लिम और इसाई को 'राहु' और 'केतु' घोषित कर चुके थे। इस तरह लता शर्मा संघ-परिवार के एजेण्डे के अंतर्गत लिखित, कुसुम केड़िया और रामेश्वर प्रसाद मिश्र की संयुक्त रूप से लिखित 'स्त्रीत्व : धारणाएँ एवं यथार्थ' की हिन्दुत्ववादी अवधारणाओं के विरुद्ध एक तर्क तैयार करती हैं। पौराणिक मिथकों को गौरवगान के विरुद्ध वे वर्तमान के यथार्थ का खुलासा करती हैं। वे उस गुजरात के साम्प्रदायिक सच को तीखेपन से उठाती हैं - जहाँ गाय का माँस खाना भले ही बुरी बात हो, औरत का माँस खाने में कोई आपत्ति नहीं है। बारह साल की नर्गिस और सद्यः विवाहिता नसीमा इसके करूण उदाहरण हैं।
विकास की सारी योजनाओं, प्रचार और आँकड़ों के बीच वे नेताओं पर गहरा अविश्वास जताती हैं। नेता हो जाने पर स्त्री का भी कोई लिंग नहीं होता - इसीलिए गुजरात में आयोजित स्त्री सशक्तिकरण की रैली में सुषमा स्वराज, उमा भारती और जयंती बेन पटेल की उपस्थिति को वे सब कहीं शंका और संदेह से देखती हैं। हिन्दुत्व के नाम पर सती-लक्ष्मी की उपस्थिति वस्तुतः एक वर्ग की सामाजिक स्वीकार्यता का ही उदाहरण है। दमित और उत्पीड़ित स्त्री को 'भोग्या' से 'पूज्या' बनाए जाने की विडम्बना पर लेखिका की टिप्पणी है, 'शोकाकुल युवती हो या अधेड़ स्त्री, इससे पहले कि वह कुछ सोच-समझ सके, स्थिर बुद्धि से कोई निर्णय ले सके, घर वाले घोषणा कर देते हैं कि उनकी बहू ÷सती' हो रही है। एक क्षण में दुनिया बदल जाती है। जिस स्त्री को कभी किसी ने 'भोग्या' से अधिक नहीं समझा, वही स्त्री 'देवी' बन जाती है। पूजा-पाठ शुरू हो जाता है। ६६ के ६६ गाँव वाले नारियल-अगरबत्ती लेकर आ जुटते हैं। उम्र का भेद-भाव भुला चरणों की धूल लेने लगते हैं। इस आकस्मिक गौरव का नशा भाँग-धतूरे के नशे से कहीं अधिक गहरा होता है। गौरव,जिसका स्वाद उसने जीवन में पहली बार जाना है।...(वही, पृ. ९२) सामन्तवादी पुरुष और उपभोक्तावादी संस्कृति की लपटों में घिरी 'सती-लक्ष्मी' के रूप में प्रचारित-प्रताड़ित स्त्री हमारे समय की एक दुखद सच्चाई है। समृद्ध परिवार की पढ़ी-लिखी युवती नताशा सिंह और उसकी सखी-ननद रितु सिंह की आत्महत्या का विकल्प लता शर्मा 'मरने की फुर्सत कहाँ!' शीर्षक टिप्पणी में बड़े और व्यापक स्त्री समाज से जुड़ाव में देखती हैं। पश्चिम से हम बहुत कुछ ग़लत सीखते हैं लेकिन उस समाज-सेवा और व्यक्तिगत निष्ठा जैसी चीजों की उपेक्षा करते हैं जिनसे जुड़कर वहाँ का युवा वर्ग अपने को सक्रिय और व्यस्त रखता है, कुछ रचनात्मक करने के सन्तोष के साथ।
बहुत पहले कभी बर्जीनिया वुल्फ ने स्त्री को स्त्री की तरह लिखने की सलाह दी थी। तब उनका आशय यही था कि स्त्री जीवन के जिन कोमल और अलक्षित पक्षों को स्त्री जितनी प्रामाणिकता से उद्घाटित कर सकती है, स्त्री के प्रति सारी सहानुभूति एवं हार्दिकता के बावजूद कोई पुरुष-लेखक नहीं कर सकता। लेकिन इसे आधार बनाकर 'जिन्दगीनामा' और 'महाभोज' जैसी रचनाओं का अवमूल्य नहीं किया जा सकता, सिर्फ यही सीखा जा सकता है कि बड़े फलक और जटिल अंतर्वस्तु वाली रचनाओं में भी स्त्री के संवेदन-तंत्र के लिए कैसे जगह बनाई जा सकती है। आज नारीवाद के प्रसंग में इसे नए सिरे से उठाने वाली मैत्रेयी पुष्पा की अपनी नायिकाएँ प्रेम और देह के स्तर पर पर्याप्त स्वतंत्र होने पर भी कहीं सामाजिक संदर्भों की उपेक्षा नहीं करतीं। सामाजिक जड़ता के बीच वे अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते हुए अपने विवेक से निर्णय लेती हैं। लेकिन उनके कुछेक वक्तव्यों और व्यवहार ने अनेक लेखिकाओं को जब-तब उत्तेजित किया है। प्रतिक्रिया में, ऐसी लेखिकाओं की एक बड़ी संख्या है जो घोषित करती हैं कि वे नारीवादी नहीं हैं। अपने एक लेख में अनामिका भले ही इस प्रसंग में पद्मा सचदेव और कृष्णा सोबती का ही उल्लेख किया हो, मृणाल पाण्डे, ममता कालिया, नासिरा शर्मा, सुधा अरोड़ा आदि इसी अर्थ में अपने को नारीवादी आन्दोलन से अलग और बाहर रखे जाने पर जोर देती हैं।
मृणाल पाण्डे और नासिरा शर्मा स्त्री पर, नारीवादी आन्दोलन की सीमाओं से बाहर रहकर, वृहत्तर सामाजिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में विचार करती हैं। 'उब्बीरी' में मृणाल पाण्डे यदि स्त्री के स्वास्थ्य के विभिन्न पक्षों पर विचार करती हैं तो 'द सब्जेक्ट इज वूमन' में स्त्री-जीवन की विभिन्न समस्याओं और मुद्दों को उठाती हैं। 'जहाँ औरतें गढ़ी जाती हैं' में भी वे एक बड़े फलक पर भारतीय समाज में स्त्री की चिंता करती दिखाई देती हैं। पारसी थियेटर और आरम्भिक भारतीय फिल्मों में, जब पुरुष ही स्त्रियों की भूमिकाएँ करते थे, भारतीय स्त्री का रोल-मॉडल तैयार किए जाने पर विशेष जोर दिया जाता था। समाज उन्हें आदर्श रूप में देखना चाहता था। लेकिन वे स्त्रियाँ अंदर कहीं कैसी उपेक्षित और बंधनों में जकड़ी जिन्दग़ी जीने को अभिशप्त थीं, मृणाल पाण्डे इसके कुछ बहुत करूण और विडम्बनापूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। 'गौहरजान, माधुरी, जुबैदा, बनमाला, नाडिया आदि अभिनेत्रियाँ इस दोहरी और घुटनभरी जिन्दगी के सिर्फ चंद उदाहरण हैं। नाडिया का आजाद ख्याल मुँहफट-पन कभी नारीवादी छवि का एक आकर्षक तत्त्व था। वह चंद निर्देशकों या पटकथा लेखकों की सृष्टि नहीं थी। वह एक बदलते सामाजिक यथार्थ की छवि थी। लेकिन बाहरी तौर पर निडर और उत्पीड़ितों की त्राता के रूप में दीखने वाली ये अभिनेत्रियाँ अपने निजी जीवन में कितनी कमजोर, अकेली और उत्पीड़ित थीं - मृणाल पाण्डे ने विस्तार से इसकी चर्चा की है। शान्ता आप्टे, मीना कुमारी, परवीन बॉबी, प्रिया राजवंश आदि इसी अकेलेपन और असुरक्षा की शिकार अभिनेत्रियाँ थीं। दबंग और त्राता छवि के बावजूद वे पुरुष वर्चस्व की शिकार अंदर कहीं बेहद अकेली, दुखी और निरीह स्त्रियाँ थीं।
मृणाल पाण्डे महिला पत्रकारों से लेकर पंचायती राज में स्त्री की भूमिका प्रजातंत्रा में 'सती' की उपस्थिति, स्त्री
संदर्भ में सामाजिक जड़ता के रूपों आदि पर पर्याप्त बेधक और व्यंग्यपूर्ण शैली में लिखती हैं। औरत होने का यह सच
उनसे छिपा नहीं है। जिसमें गाय-बकरी की तरह दहेज से मढ़कर लड़की को 'स्वीकार्य' बनाया जाता है। इस व्यापक समाज में, सारी नारीवादी सक्रियता के बीच, इस मुद्दे पर किसी आन्दोलन की अनुपस्थिति उन्हें हताश करती है। नेताओं के भव्य समारोह, लालू, जयललिता आदि के परिवारों में हुए राजसी विवाह और इस प्रसंग में मीडिया की ठस और प्रतिगामी भूमिका में उनमें खीझ पैदा करती है। पिछले दिनों अभिषेक-ऐश्वर्य के विवाह संबंधी खबरों का कवरेज इसी प्रवृत्ति के विस्तार का उदाहरण है। युवा वर्ग में 'सादगी पूर्ण गरिमा' के संदेश और आचार के लिए जैसे कहीं कोई चिंता ही नहीं बची है।
मृणाल पाण्डे की दृष्टि से नारीवादी आन्दोलन की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि सारे शोर-शराबे के बीच स्त्री उत्पाद में ढल और बदल रही है। सौन्दर्य प्रतियोगिताओं का देह-प्रदर्शन और उन्मुक्त निर्बाध भोगवाद स्त्री को सामाजिक सरोकारों एवं दायित्वों से काट रहा है। वे लिखती है, 'हमारे 'उदित भारत' का मध्यवर्गीय समाज और उसकी महिलाएँ आत्म केन्द्रित और वृहत्तर सामाजिक सच्चाइयों की ओर जिस तेजी से लापरवाह होती जा रही हैं। वह स्वस्थ नहीं है। आपकी प्रौढ़ हो चली महिला नारीवादियों ने जब स्त्रियों को अपनी देह और अपने जीवन पर अधिकार दिलाने के लिए आंदोलन किया या तो इस इच्छा से नहीं कि उस आजादी का विलय 'कांटा लगा' गले की आक्रामक उच्छृंखलता और 'सैंयादिल में आना रे' की हंटर वाली के पुरुषों के प्रति हिकारत भरे स्वाभित्व भाव में हो जाए' (जहाँ औरतें गढ़ी जाती हैं, पृ , ६२) स्त्री चिंता को कैसे बड़ा सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य देती है इसे उनकी माँ-कथा लेखिका शिवानी- पर लिखे दो आलेखों से समझा जा सकता है। माँ से अधिक वे उनके लिए परम्परा की स्वीकार्यता का सवाल बनकर सामने आतीं है।
नासिरा शर्मा ने न सिर्फ अपने साहित्य में अनेक कद्दावर औरतें गढ़ी हैं, विभिन्न देशों और समाजों की स्त्रियों एवं उनकी समस्याओं को उन्होंने निकट से देखने समझने की कोशिश की है। ईरान की पृष्ठभूमि पर उन्होंने अनेक उल्लेखनीय रचनायें लिखी हैं - 'सात नदियाँ एक समन्दर' जैसे उपन्यास से लेकर 'शामी-कागज' और 'संगसार' जैसी कहानियों तक। लेकिन जब वे खुद को नारीवादी न माने जाने पर जोर देती है तो इसके कुछ वाजिब कारण है। एक साक्षात्कार में वे कहती हैं - मैं आंधी नहीं पूरी दुनिया के बारे में लिखती हूँ। पश्चिम में नारी मुक्ति की विफलता पर टिप्पणी करते हुए वे कहती हैं, ' यह नारी मुक्ति की सफलता तब विफलता में बदलती है जब उस उदार समाज की नारी अवैध बच्चे को जन्म देती है यह समाज उस बच्चे का उत्तरदायित्व अपने कंधों पर नहीं लेता, इसलिए ऐसे बच्चों के लिए उचित संस्थाओं की व्यवस्था है मगर उस नारी को वह स्वतंत्रता उस समाज ने प्रदान नहीं की कि वह उस अवैध बच्चे के साथ जी सके और आवश्यकता के हर जरूरी फॉर्म पर पिता के नाम का स्थान खाली न हो बल्कि वास्तव में छपे ही नहीं, तब हुई सही सेक्स क्रांति मगर ऐसा वहाँ भी नहीं हुआ'... (औरत के लिए औरत पृ , १२५) पूर्व में औरत देवी के रूप में पत्थर है। तो पश्चिम में लोहा- व्यवस्था के बड़े यंत्रा के एक पुर्जे के रूप में। इसी के विरुद्ध वे वस्तुतः एक लेखक के रूप में, हाड़-मांस की सजग और संवेदनशील स्त्री के निर्माण एवं विकास पर जोर देती है। हिंदी में देह की मुक्ति को ही नारीवाद का मूल और एक मात्र सूत्र माने जाने का विरोध और अनेक लेखिकाओं की तरह वे भी कहती हैं। लेकिन तब थोड़ा आश्चर्य होता है। जब वे प्रभा खेतान के छिन्नमस्ता' के विरुद्ध टिप्पणी करते हुए कहती है, 'जिन्हें स्त्री से हमदर्दी है, उन्हें 'छिन्नमस्ता' को पसंद नहीं करना चाहिए। आखिरकार स्त्री समाज का नैतिक प्रतीक होती हैं मॉरल होती हैं।' (वहीं पृ ,१९२) वस्तुतः यहाँ से वे नारीवाद के विरुद्ध अपना तर्क बुनती हैं। यहीं वे नारीवाद को पुरुष के विरुद्ध लड़ी जाने वाली लड़ाई के रूप में परिभाषित करने लगती हैं जबकि हरेक ने और हमेशा यह कहा है कि यह लड़ाई पुरुष के नहीं, पुरुष सत्ता के वर्चस्व के विरुद्ध है। वह सदियों से स्त्री के उत्पीड़न का मुख्य कारक रही है। वे कथित रूप से फैशनेबुल और सजावटी नारीवाद पर हमला करती हैं जो सिर्फ चर्चा में बने रहने का एक शगल है। सम्मान और पुरस्कार के लिए वे लेखिकाओं के जोड़-तोड़ का उल्लेख भी करती हैं। वे समाज में ऐसे कानूनों के बनाए जाने और उन पर अमल के पक्ष में हैं जो स्त्री हितों की रक्षा करते हों। इराक में स्त्रियों के बीच सद्दाम हुसैन की बेहिसाब लोकप्रियता के कारणों की ओर संकेत करते हुए वे बताती हैं कि उन्होंने जो कानून बनाए उनमें तलाक के बाद घर औरत नहीं आदमी छोड़ेगा और घर की कोई चीज वह अपने साथ नहीं ले जायेगा। छोटे बच्चों वाली औरतें सिर्फ आधा दिन नौकरी करके पूरा वेतन पाती थीं ताकि बचा हुआ समय वे अपने घर और बच्चों की जरूरतों को दे सके। औरत का तबादला नहीं किया जायेगा। जहाँ उसका पति होगा। इन कानूनों से इराक में तलाक का प्रतिशत स्वाभाविक रूप में कम हुआ। 'क्योंकि तनाव की स्थिति बनाने वाले पारिवारिक सामाजिक एवं कार्य क्षेत्र के वातावरण को सहज बनाने में सरकार की सकारात्मक भूमिका रही है' (वहीं, पृ ,१३५) नारीवादी आंदोलन की 'वन-पैरेंट' परिणति या फिर घर-परिवार जैसी संस्थाओं का विघटन उन्हें सोचने को मजबूर करता है। इसीलिए वे हिंदी की उन लेखिकाओं का उल्लेख किंचित विदू्रप की भाषा में करती हैं जो घर- परिवार, बच्चों और पति की सारी सुविधाएँ उठाते हुए नारीवाद का परचम लहराती हैं- वह भी पितृसत्ता के विरोध के नाम पर।
नासिरा शर्मा का मानना हैं कि नारी-जागृति नारी की मानसिकता में ही निहित है। पिछले पाँच हजार सालों में मर्द का व्यक्तित्व उतना नहीं बदला है जितना औरत का। यह बदलाव ही वस्तुतः सामाजिक चेतना को प्रेरित करता है। मर्द और औरत समाज की दो इकाइयाँ हैं- दोनों शोषित हैं, मर्द कुछ कम औरत कुछ ज्यादा। प्रेम जीवन का स्रोत तो हो सकता है केंद्र नहीं होता। आज औरत की मंजिल केवल मर्द नहीं है। पश्चिम में औरत आगे बढ़ी है लेकिन उसका लक्ष्य 'मर्द' बनना हो गया है। पश्चिम में भी अब उसी पीढ़ी के साए में एक नया औरत वर्ग उभर रहा है। जो जागृति, आत्मविश्वास, स्वालंबन और दान-बलिदान की राह पर चलने लगा है। हमारी पुरानी पौराणिक-ऐतिहासिक स्त्रियों की महत्त्वाकाक्षाएं मुख्यतः पति और पुत्र परिवार और निजी इच्छाओं पर केंद्रित थी। आज की सचेत और जागरूक औरत परिवार से जुड़कर समाज के लिए कुछ रचनात्मक करना चाहती है। यदि किसी औरत का साथी उसकी इच्छा के विरुद्ध घर तोड़ता है तो उसमें इतना आत्मविश्वास होना चाहिए कि घर टूटने को वह व्यक्तित्व के टूटने के रूप में लेने से बच सके। बलात्कार और दहेज के प्रसंग में समाज की मानसिकता को बदलने की जरूरत है। इन खतरनाक स्थितियों के विरुद्ध हस्तक्षेप के रूप में उन समझदार मर्दों का सहयोग लिया जाना चाहिए जो स्वंय मर्दों की इन सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध हैं। प्रतिक्रिया और प्रतिहिंसा से कोई बड़ा निर्माण नहीं होता। पुरुष-सत्ता के विरोध के नाम पर स्त्री में बदले की प्रवृत्ति को उसी तरह गलत मानती हैं जैसे हिंदुत्व वही इतिहास का बदला लेकर आज की सामाजिक समरसता को भंग करते हैं या फिर दलित आंदोलन की उग्रता में पिछली यंत्राणा और उत्पीड़न से मुक्ति तलाशी जाती है।
अनामिका भी मानती हैं कि 'विमेंस लिव' पुरुष के नहीं पितृसत्ता के विरुद्ध है। वे भी उन लेखिकाओं में हैं जो घर परिवार के बीच पितृसत्ता का विरोध करती हैं और सिमोन द बोउआर की तरह विवाह और परिवार का विरोध न करने पर भी 'कम्यून व्यवस्था का समर्थन करती हैं। मिथकीय पात्रों-सीता, सावित्री, शूर्पनखा, लक्ष्मण आदि की परिवर्तित युगानुकूल व्याख्या करके बहुत कुछ नवनीता सेन गु्रप की सीता से शुरू की तर्ज पर वे परम्परा के षड्यन्त्रों का खुलासा करती हैं। स्त्री के ÷चुप सहने' की नीति को वे मैकाले की रक्षा-नीति से जोड़कर देखती हैं - ऐसा कुछ करने की नीति जो तेज को कुंठित करने में सफल होती है।
अनामिका पोस्ट फेमेनिज्म के बहाने नारीवाद को विस्तार देती हैं। जर्मन ग्रीयर और एंड्रीज रिच अपनी भौगोलिक सीमाओं से बाहर निकलकर अब तीसरी दुनिया की जमीनी संघर्ष करती स्त्री की ओर मुड़ती हैं। 'अफ्रीकी वुमनिज्म' से लेकर,अपने अधिकारों और संघर्ष के प्रति सजग भारतीय आदिवासी स्त्री तक इसमें शामिल है। पूरी दुनिया की स्त्रिायाँ, मार्क्स के मजदूरों वाले आह्नान की तरह, अब बहनापे और आपसी समझदारी के सूत्र से जुड़ने लगी हैं। 'पुअर लिजा कॉम्प्लेक्स' से मुक्त होकर अब पूरी दुनिया इसमें समा गई है। तीसरी के आगे जैसे यह चौथी दुनिया है- अपने अस्तित्व को प्रमाणित करती है। दुनिया भर में स्त्री और स्त्री के बीच विकसित इस सद्भाव और बहुत कुछ साझा समस्यओं की दृष्टि से अनामिका कैनेडियन कवयित्री भासी रेंडन की एक कविता प्रस्तुत करती हैं: ईसा मसीह औरत नहीं थे,/वरना मासिक धर्म/बारह बरस की उमर से/उनकों मंदिर से बाहर रखता,/बेथलहेम और येरूशलम के/बीच के कठिन सफर में उनके/हो जाते कई तो बलात्कार/और उनके दुध मुँहे बच्चे/चालीस दिन और चालीस रातें/भूख से बिलबिलाकर/ मरते हुए कहते जब/उनको तो फुर्सत मिलती ही नहीं/सूली पर चढ़ जाने की भी। (मन मांझने की जरूरत, पृ , ४२)
नारीवाद को विस्तार देने की प्रक्रिया में अनामिका यदि एक ओर मिथकीय पात्रों की नई व्याख्या करती हैं वहीं वे लोक-साहित्य में निहित और पल्लवित आशयों के नारीवादी उपयोग की संभावनाएँ भी तलाशती हैं। भिखारी ठाकुर के एक नाटक 'गबर-फिचोड़' में बुढ़िया द्वारा पड़ौसी की छत पर पौड़ गई लौकी वाले उदाहरण को वे एक कसौटी की तरह सामने रखती हैं।
स्त्री आंदोलन को परिभाषित करते हुए वे लिखती हैं, 'जो जहाँ भी परितप्त है, स्त्री आंदोलन से जुड़ जाता है।' (वही पृ ,१०९) ' राबिया फकीर और सूफी गायकी' नामक अपनी टिप्पणी में वे इस विस्तार को रेखांकित करती हैं। यह स्त्री मुक्ति की आकांक्षा से अधिक कुछ है, जिसमें दलित, उपेक्षित, अनाथ, बूढे'-विकलांग, अश्वेत, अल्पसंख्यक पर्यावरण और सांप्रदायिक सद्भाव की चिंता तक सबकुछ समा जाता है। 'काली फार वीमेन' की हैदराबाद में आयोजित कार्यशाला के बाद हवाई अड्डे पर इत्रा के बड़े और खोखले मर्तबान के साथ, जो अजीत कौर ने अपनी चित्राकार बेटी अपर्णा के लिए खरीदा था, बम के गोले जैसी कुछ खतरनाक चीज समझी जाकर, हवाई अड्डे के अधिकारियों का जो सुलूक था अनामिका उसमें निहित हिकारत और अज्ञान को स्त्री साहित्य और आंदोलन के प्रति बरती जाने वाली बेअदबी और उपेक्षा से जोड़कर देखती हैं। 'कविता में औरत' में अपनी टिप्पणियों के साथ वे औरत की वेदना और स्थिति को सामने लाती हैं। इनमें वह कविता भी शामिल है। जिसमें छाता बनाने वाले की पत्नी पति से शिकायत के रूप में उलाहना देती है कि उसका पति उसे उतना महत्त्व भी नहीं देता जितना अपने बनाए छाते को देता है। अनामिका नारीवाद को इसी सर्वव्यापी और सार्वभौम पीड़ा से जोड़कर देखती हैं। जिसमें स्त्री की मुक्ति की आकांक्षा सब कहीं नियोजक सूत्रा और कारक है।
सामायिक टिप्पणियों और बहुत कुछ तात्कालिक रणनीति के तहत प्रस्तुत स्त्री-चिंता की यह वैचारिकी वस्तुतः स्त्री की नियति और उसकी मुक्ति की आकांक्षा को पूरी तरह समझ पाने में आक्षम है। यह मुख्यतः उन लेखिकाओं द्वारा ही प्रस्तुत है जो रचनात्मक लेखन में भी सक्रिय हैं। नारीवाद की मूल प्रकृति और स्त्री-मुक्ति की उनकी आकांक्षा को उनके अपने साहित्य को छोड़कर नहीं समझा जा सकता। इसमें उन कारणों की अनदेखी भी नहीं की जा सकती कि आखिर महिला लेखकों का एक बड़ा और गंभीर वर्ग क्यों अपने को नारीवाद से अलग और बाहर रखे जाने पर जोर देता है।
साहित्य में प्रायोजित मूल्यांकन और उपभोग की राजनीति के इस दौर में यह चिंता भी नारीवाद के ही दायरें में आती है कि आखिर क्यों मन्नू भण्डारी की 'एक कहानी यह भी' विधिवत्‌ रिलीज होने के पूर्व ही 'हंस' में प्रायोजित मूल्यांकन का एक उदाहरण बनती है और स्त्रियाँ ही स्त्री के लंबे और क्रूर उत्पीड़न की चिंता किए बिना संपादक के पक्ष में खड़ी होती हैं। भंगिनीवाद की दुहाई के बावजूद, पुरुष वर्चस्व और पितृसत्ता द्वारा अपने मनचाहे इस्तेमाल की छूट देने वाला यह नारीवाद कहाँ जायेगा- इस पर गंभीरता से विचार किए जाने की जरूरत है। तीसरी और चौथी दुनिया से जुड़ने की बात करके अपनी नाक के नीचे होने वाले उत्पीड़न और आयाम की अनदेखी करके या फिर अन्यायी और उत्पीड़क के पक्ष में खड़े होकर, हम आखिर किस नारीवाद के विकास की बात करते हैं? ऐसे उदाहरण ही वस्तुतः अनेक लेखिकाओं के नारीवाद से अलगाव वाले तर्क को बल देते हैं।
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